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अनियमित कर्मी नियमित के जैसे समान वेतन के हकदार : हाईकोर्ट

Tue, 10 Sep 2024 05:23 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 10 Sep 2024 05:23 AM IST
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Irregular workers are entitled to the same salary as regular workers: High Court
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि दैनिक वेतनभोगी, संविदा कर्मचारी और तदर्थ आधार पर सेवारत कर्मचारी नियमित कर्मचारियों के समान वेतन पाने के हकदार हैं, बशर्ते वे समान कार्य करें। जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस सुदीप्ति शर्मा की पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की चंडीगढ़ पीठ के आदेशों को बरकरार रखा, जिसमें चंडीगढ़ प्रशासन को यूटी के विभिन्न सरकारी काॅलेजों में संविदा के आधार पर नियुक्त कई व्याख्याताओं की सेवाओं को नियमित करने का निर्देश दिया गया था। पीठ ने कैट के आदेश को चुनौती देने वाली चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से दायर 38 याचिकाओं को खारिज भी कर दिया। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों के किए जाने वाले कार्य की प्रकृति शैक्षिक संस्थाओं के कामकाज के लिए महत्वपूर्ण और अभिन्न थी। कोर्ट ने कहा कि किसी पद को केवल संविदा के रूप में लेबल करने से किए जा रहे कार्य का महत्व कम नहीं हो जाता। अदालत ने रोजगार प्रथाओं, विशेष रूप से सार्वजनिक सेवा में गैर-भेदभाव की आवश्यकता को दोहराया। पीठ ने जोर देकर कहा कि यह सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है कि समान कार्य करने वाले कर्मचारियों के साथ उनकी नियुक्ति के तरीके के आधार पर अनुचित व्यवहार न किया जाए। कोर्ट ने चंडीगढ़ प्रशासन को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर कैट के आदेशों को लागू करने का निर्देश दिया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रभावित कर्मचारियों को बिना किसी देरी के वे लाभ मिलें जिनके वे हकदार हैं।
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प्रशासन का दृष्टिकोण निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं : हाईकोर्ट ने इन व्याख्याताओं की सेवाओं को नियमित करने में अनिच्छा के लिए चंडीगढ़ प्रशासन की आलोचना की जबकि वे शैक्षणिक संस्थानों में लंबे समय से सेवाएं दे रहे हैं। पीठ ने कहा कि प्रशासन का दृष्टिकोण निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उसे यह खेदजनक लगता है कि शैक्षणिक संस्थानों में इन व्याख्याताओं के लंबे समय से और मूल्यवान योगदान के बावजूद चंडीगढ़ प्रशासन ने उनकी सेवाओं को नियमित करने में अनिच्छा दिखाई है। यह दृष्टिकोण निष्पक्षता और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है क्योंकि यह उनके काम की मूल प्रकृति और समान व्यवहार की आवश्यकता की अवहेलना करता है। कोर्ट ने कहा कि व्याख्याताओं सहित प्रतिवादी-कर्मचारी, उस श्रेणी के न्यूनतम वेतनमान के हकदार थे, जिससे वे संबंधित थे।
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