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महंत काजल मंगलमुखी बोलीं- ‘ट्रांसजेंडरों को भीख नहीं, नौकरी दें ताकि मुख्य धारा में आ सकें’
Mon, 02 Mar 2020 02:06 PM IST
खुशबू गोयल
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Mon, 02 Mar 2020 02:06 PM IST
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काजल मंगलमुखी
- फोटो : फाइल फोटो
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किन्नर केवल तालियां बजाकर बधाई मांगने वाले ही नहीं हैं। यदि समाज की सोच बदल जाए तो किन्नर भी मुख्य धारा में शामिल होकर बेहतर जीवन जी सकते हैं। आईपीएस, आईएएस अफसर ही नहीं आर्मी में भी भर्ती होकर देश की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दे सकते हैं। बस जरूरत है मौके की। यह कहना है किन्नर काजल मंगलमुखी का।
काजल मंगलमुखी ट्रांसजेंडर वेलफेयर सोसाइटी मनीमाजरा की महंत हैं। मूलरूप से मैसूर की रहने वाली काजल मंगलमुखी बताती हैं कि 14 वर्ष की उम्र में वह नौवीं कक्षा में पढ़ती थीं। स्कूल में उनका नाम राजू था। बाद में वह मुंबई पहुंचीं और बिंदु बन गईं। और अब काजल मंगलमुखी हैं।
अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहती हैं कि पिता और भाई ने मुझे किन्नर होने के चलते आधी रात को घर से निकाल दिया। होटलों में एक वर्ष तक प्लेट धोकर गुजारा किया। बाद में मुंबई के रेड लाइट एरिया में भी रही। बहुत जलालत की जिंदगी को जिया। वहां से फिर चंडीगढ़ आ गई।
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अब उन्होंने अपना पूरा जीवन ट्रांसजेंडरों की भलाई को समर्पित कर दिया है। उनके पास एमए, पीएचडी करने वाले ट्रांसजेंडर भी हैं, जिनकी पढ़ाई का खर्च वह खुद जुटाकर देती हैं। करीब 20 लोगों को पढ़ाई का खर्च उपलब्ध कराने का जिम्मा उन्होंने ले रखा है। पेश है काजल मंगलमुखी से बातचीत के अंश।
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काजल मंगलमुखी ट्रांसजेंडर वेलफेयर सोसाइटी मनीमाजरा की महंत हैं। मूलरूप से मैसूर की रहने वाली काजल मंगलमुखी बताती हैं कि 14 वर्ष की उम्र में वह नौवीं कक्षा में पढ़ती थीं। स्कूल में उनका नाम राजू था। बाद में वह मुंबई पहुंचीं और बिंदु बन गईं। और अब काजल मंगलमुखी हैं।
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अपने संघर्ष की कहानी बताते हुए कहती हैं कि पिता और भाई ने मुझे किन्नर होने के चलते आधी रात को घर से निकाल दिया। होटलों में एक वर्ष तक प्लेट धोकर गुजारा किया। बाद में मुंबई के रेड लाइट एरिया में भी रही। बहुत जलालत की जिंदगी को जिया। वहां से फिर चंडीगढ़ आ गई।
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अब उन्होंने अपना पूरा जीवन ट्रांसजेंडरों की भलाई को समर्पित कर दिया है। उनके पास एमए, पीएचडी करने वाले ट्रांसजेंडर भी हैं, जिनकी पढ़ाई का खर्च वह खुद जुटाकर देती हैं। करीब 20 लोगों को पढ़ाई का खर्च उपलब्ध कराने का जिम्मा उन्होंने ले रखा है। पेश है काजल मंगलमुखी से बातचीत के अंश।
सवाल : जीवन में कितना संघर्ष किया और यहां तक कैसे पहुंचे?
जवाब : मैं काफी कठिन परिस्थितियों से गुजरी हूं। जन्म के काफी समय बाद मुझे पता चला कि मैं ट्रांसजेंडर हूं। लड़कियों के बीच खेलने पर पिता और भाई डांटते थे। कहते कि तुम लड़कों के बीच खेलो लेकिन जब लड़कों के बीच खेलने जाती तो मुझे छेड़ा जाता। घर में मुझे मारा-पीटा जाता। एक दिन मेरे पिता और भाई ने आधी रात को मुझे घर से निकाल दिया। मुझे एक किन्नर के साथ मुंबई आना पड़ा। वहां पर रेड लाइट एरिया में रही। जहां पर मेरा नाम बिंदु रखा गया। बाद में जब चंडीगढ़ आई तो मेरा नाम काजल पड़ा। मुझे हर जगह धोखा मिला।
सवाल : ट्रांसजेंडर्स को पढ़ाने का आइडिया कैसे आया?
जवाब : पढ़ाई बहुत जरूरी है। क्योंकि शिक्षा से ही सोच बदली जा सकती है। ट्रांसजेंडर्स को मौका मिलेगा तो वह भी एक सामान्य जीवन जी सकते हैं। आईएएस आईपीएस बन सकते हैं। हम किन्नरों में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं है। चंडीगढ़ मेें किन्नरों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हूं। वर्ष 2008 में तत्कालीन डीपीआई एसके सेतिया ने काफी मदद की। किन्नरों के अधिकारों के काम करने पर उन्होंने काफी मदद की। इस समय 20 बच्चों को पढ़ाई में मदद कर रही हूं।
जवाब : मैं काफी कठिन परिस्थितियों से गुजरी हूं। जन्म के काफी समय बाद मुझे पता चला कि मैं ट्रांसजेंडर हूं। लड़कियों के बीच खेलने पर पिता और भाई डांटते थे। कहते कि तुम लड़कों के बीच खेलो लेकिन जब लड़कों के बीच खेलने जाती तो मुझे छेड़ा जाता। घर में मुझे मारा-पीटा जाता। एक दिन मेरे पिता और भाई ने आधी रात को मुझे घर से निकाल दिया। मुझे एक किन्नर के साथ मुंबई आना पड़ा। वहां पर रेड लाइट एरिया में रही। जहां पर मेरा नाम बिंदु रखा गया। बाद में जब चंडीगढ़ आई तो मेरा नाम काजल पड़ा। मुझे हर जगह धोखा मिला।
सवाल : ट्रांसजेंडर्स को पढ़ाने का आइडिया कैसे आया?
जवाब : पढ़ाई बहुत जरूरी है। क्योंकि शिक्षा से ही सोच बदली जा सकती है। ट्रांसजेंडर्स को मौका मिलेगा तो वह भी एक सामान्य जीवन जी सकते हैं। आईएएस आईपीएस बन सकते हैं। हम किन्नरों में किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं है। चंडीगढ़ मेें किन्नरों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हूं। वर्ष 2008 में तत्कालीन डीपीआई एसके सेतिया ने काफी मदद की। किन्नरों के अधिकारों के काम करने पर उन्होंने काफी मदद की। इस समय 20 बच्चों को पढ़ाई में मदद कर रही हूं।
सवाल : किन्नरों की दशा में कितना सुधार आया है?
जवाब : किन्नरों की दशा में अब काफी सुधार हुआ है लेकिन जो पॉलिसी बनी है, उसे लागू कराने में लोग दिक्क्त कर रहे हैं। यह पॉलिसी अधिकारियों नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के बीच फंसकर रह गई है। इसके लिए संघर्ष करना होगा। हम इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। स्थिति में जितना सुधार होना चाहिए उतना नहीं हुआ है। हमारे लिए रिजर्वेशन है तो नौकरी क्यों नहीं मिलती। राजनीतिक पार्टियां हमें भी चुनाव लड़ने के लिए टिकट दें। हमें भी संसद में भेजें ताकि हम अपने अधिकारों के लिए और मजबूती से बात कर सकें।
सवाल : ट्रांसजेंडर के हितों के लिए काम करने में ट्रांसजेंडर बोर्ड कितना सक्रिय है?
जवाब : नाममात्र के काम हो रहे हैं। हमें पुलिस विभाग में भी नौकरी मिलनी चाहिए। ट्रांसजेंडरों के लिए भी आयोग का गठन हो। हमारे अधिकारों की रक्षा कौन करेगा। हर सरकारी विभाग में ट्रांसजेंडरों के लिए अधिकार मिले। इलाके में रेंट पर भी लोग नहीं रहने देते। हमें भीख मांगना या बधाई लेना या नाचना ठीक नहीं लगता। ट्रांसजेंडरों को भी होम शेल्टर मिले।
जवाब : किन्नरों की दशा में अब काफी सुधार हुआ है लेकिन जो पॉलिसी बनी है, उसे लागू कराने में लोग दिक्क्त कर रहे हैं। यह पॉलिसी अधिकारियों नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के बीच फंसकर रह गई है। इसके लिए संघर्ष करना होगा। हम इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। स्थिति में जितना सुधार होना चाहिए उतना नहीं हुआ है। हमारे लिए रिजर्वेशन है तो नौकरी क्यों नहीं मिलती। राजनीतिक पार्टियां हमें भी चुनाव लड़ने के लिए टिकट दें। हमें भी संसद में भेजें ताकि हम अपने अधिकारों के लिए और मजबूती से बात कर सकें।
सवाल : ट्रांसजेंडर के हितों के लिए काम करने में ट्रांसजेंडर बोर्ड कितना सक्रिय है?
जवाब : नाममात्र के काम हो रहे हैं। हमें पुलिस विभाग में भी नौकरी मिलनी चाहिए। ट्रांसजेंडरों के लिए भी आयोग का गठन हो। हमारे अधिकारों की रक्षा कौन करेगा। हर सरकारी विभाग में ट्रांसजेंडरों के लिए अधिकार मिले। इलाके में रेंट पर भी लोग नहीं रहने देते। हमें भीख मांगना या बधाई लेना या नाचना ठीक नहीं लगता। ट्रांसजेंडरों को भी होम शेल्टर मिले।