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Chandigarh News: बीमा कंपनी को दावा खारिज करना पड़ा महंगा, देने होंगे 12 लाख
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चंडीगढ़। बीमा के दावे को खारिज करना एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को भारी पड़ गया। उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के खिलाफ आदेश दिया है कि मृतक की पत्नी को 12 लाख रुपये 6 प्रतिशत ब्याज के साथ अदा करे। इसके साथ 10 हजार रुपये मुआवजे देने का आदेश दिया है।
सुनीता शर्मा निवासी जीरकपुर ने आयोग को बताया कि उनके पति प्रदीप कुमार शर्मा ने एसबीआई लाइफ स्मार्ट इलीट प्लैन गोल्ड कवर जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। वह पॉलिसी पांच साल के लिए थी। इसका 1.50 लाख रुपये वार्षिक प्रीमियम था। उन्होंने 2016 और 2017 में प्रीमियम राशि का भुगतान किया था। पॉलिसी लेते समय उनके पति ने अपनी बीमारियों और चिकित्सा रिकॉर्ड को बीमा कंपनी को सही-सही जानकारी दी थी। उनके पति का एक अगस्त 2018 को निधन हो गया। इस पर उन्होंने बीमा कंपनी से क्लेम के लिए दावा किया। इस पर बीमा कंपनी ने 3 दिसंबर 2018 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बीमाधारक ने अपनी बीमारी के बारे में जानकारी छिपाई थी। हालांकि, बीमा कंपनी ने तीन लाख रुपये की राशि उनके खाते में ट्रांसफर कर दी थी लेकिन यह राशि 15 लाख रुपये बनती थी। बीमा कंपनी ने अपने जवाब में माना कि उसने पॉलिसी जारी की थी और दावा खारिज किया था लेकिन बीमा कंपनी का कहना था कि बीमाधारक ने अपनी बीमारी के बारे में जानकारी छिपाई थी।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग ने सेवा में कमी पाते हुए बीमा कंपनी के खिलाफ फैसला सुनाया। वहीं कंपनी को आदेश दिया कि उपभोक्ता को बकाया बीमा की राशि छह प्रतिशत ब्याज और मुआवजे के साथ लौटाए।
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सुनीता शर्मा निवासी जीरकपुर ने आयोग को बताया कि उनके पति प्रदीप कुमार शर्मा ने एसबीआई लाइफ स्मार्ट इलीट प्लैन गोल्ड कवर जीवन बीमा पॉलिसी ली थी। वह पॉलिसी पांच साल के लिए थी। इसका 1.50 लाख रुपये वार्षिक प्रीमियम था। उन्होंने 2016 और 2017 में प्रीमियम राशि का भुगतान किया था। पॉलिसी लेते समय उनके पति ने अपनी बीमारियों और चिकित्सा रिकॉर्ड को बीमा कंपनी को सही-सही जानकारी दी थी। उनके पति का एक अगस्त 2018 को निधन हो गया। इस पर उन्होंने बीमा कंपनी से क्लेम के लिए दावा किया। इस पर बीमा कंपनी ने 3 दिसंबर 2018 को यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि बीमाधारक ने अपनी बीमारी के बारे में जानकारी छिपाई थी। हालांकि, बीमा कंपनी ने तीन लाख रुपये की राशि उनके खाते में ट्रांसफर कर दी थी लेकिन यह राशि 15 लाख रुपये बनती थी। बीमा कंपनी ने अपने जवाब में माना कि उसने पॉलिसी जारी की थी और दावा खारिज किया था लेकिन बीमा कंपनी का कहना था कि बीमाधारक ने अपनी बीमारी के बारे में जानकारी छिपाई थी।
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दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग ने सेवा में कमी पाते हुए बीमा कंपनी के खिलाफ फैसला सुनाया। वहीं कंपनी को आदेश दिया कि उपभोक्ता को बकाया बीमा की राशि छह प्रतिशत ब्याज और मुआवजे के साथ लौटाए।
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