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चंडीगढ़: खेल-खेल में बेटे ने पापा का खाता कर दिया खाली, आप भी ऐसे रहें सचेत

Mon, 06 Jul 2020 12:55 PM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: पंचकुला ब्‍यूरो Updated Mon, 06 Jul 2020 12:55 PM IST
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In the game, the son made the father's account empty, you stay alert
PUBG MOBILE (सांकेतिक) - फोटो : PUBG

मोबाइल की लत तो बच्चों को पहले ही लगी हुई थी लेकिन लॉकडाउन ने इसमें और इजाफा कर दिया। बच्चे घरों में कैद हो गए। दोस्तों से मिलना-जुलना और खेलना बंद। इसलिए न चाहते हुए भी बच्चों के हाथों में अभिभावकों ने मोबाइल पकड़ा दिए और बच्चे लगे पबजी समेत अन्य गेम खेलने।

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मोहाली के खरड़ में जो घटना घटी है, वह हर उस अभिभावक के लिए सबक है, जिनके बच्चे किशोर हैं। पबजी खेलते खेलते अपने पिता के खाते से 16 लाख रुपये उड़ा देने वाला बच्चा भी कच्ची उम्र का ही है। बच्चों को इस दलदल से कैसे बाहर निकालें इसी बारे में पीजीआई के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. अभिषेक घोस से अमर उजाला की विशेष बातचीत।
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अभिभावक कैसे पहचानें कि उनके बेटे में पबजी की लत पड़ गई है। इंटरनेट पर गेम खेलने की लत को इंटरनेट गेमिंग डिस्आर्डर कहते हैं। यह लत एक दिन में नहीं पड़ती। पहले बच्चा मोबाइल पर एक घंटा बिताता है। फिर दो घंटे और उसके बाद छह घंटे। यह सब धीरे-धीरे होता है और अभिभावकों की नजरों के सामने।

इसके साथ ही उसकी दूसरी एक्टिविटीज कम हो जाएगी। जैसे कि ड्राइंग करता था तो कम करने लगेगा। पेरेंट्स से बातचीत पहले से कम करेगा। बच्चे से मोबाइल लेने या छीनने से उसका स्वभाव आक्रामक और गुस्सेल हो जाएगा। कई बार देखा गया है कि गेम खेलने से रोकने पर वह हिंसक भी हो जाता है।

बेटा गेमिंग डिस्आर्डर में फंस रहा है तो अभिभावक को क्या करना चाहिए?

यदि बच्चा लगातार इंटरनेट पर चार से पांच घंटे गेम्स खेलता है तो समझ लीजिए कि स्थिति ठीक नहीं है। पहले तो उसे फिजिकल एक्टिविटीज से संबंधित गेम का विकल्प दें। उसके साथ समाय बिताएं। यदि फिर भी गेम से पीछा नहीं छूट रहा है तो तुरंत किसी अच्छे मनोचिकित्सक से दिखाएं। कई बच्चे गेमिंग डिस्आर्डर से बाहर भी निकलना चाहतेे हैं, लेकिन निकल नहीं पाते और वह तनाव में आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में मनोचिकित्सक से मिलना होगा।

क्या आप बता सकते हैं कि किस तरह के बच्चे गेमिंग डिस्आर्डर का शिकार होते हैं
दो तरह के बच्चे होते हैं। पहला, वे जिनमें सोशल फोबिया या सोशल एंजाइटी के शिकार होते हैं। इस तरह के बच्चों के दोस्त नहीं होते। ज्यादातर वक्त घर पर अकेले में बिताते हैं। दूसरा वे, जो अटेंशन डेफिसिट हाइपर एक्टिविटी डिस्ऑर्डर (एडीएचडी) से ग्रसित होते हैं। ये बच्चे अपना ध्यान में पढ़ाई में नहीं लगा पाते। किसी काम में ज्यादा अटेंशन नहीं दे पाते। यदि इन्हें इंटरनेट पर गेम मिल जाए तो ज्यादा एक्टिव होते हैं। दोनों ही बीमारियों का इलाज है।

इंटरनेट गेमिंग डिस्आर्डर से स्वास्थ्य पर कोई अन्य असर
बिलकुल असर पड़ता है। नींद न आना। किसी काम में मन न लगना। सिरदर्द और माइग्रेन की समस्या हो सकती है। दिमाग असली और काल्पनिक में भ्रमित हो सकता है। आंखों पर असर पड़ता है। गर्दन या मसल्स में सूजन आ सकती है।

चाइनीज एप पर प्रतिबंध तो पबजी पर क्यों नहीं
दरअसल पबजी को दक्षिण कोरिया की वीडियो गेम कंपनी ब्लूहोल की सब्सिडियरी कंपनी ने बनाया है। इसमें थोड़ा-सा हिस्सा चीन का है। दुनिया की सबसे बड़ी गेम कंपनियों में से एक टेंसेंट गेम्स ने इसे चीन में लांच करने का आफर दिया और कुछ हिस्सेदारी भी खरीदी। हालांकि पबजी को चीन में बैन कर दिया। मोबाइल वाला वर्जन टेंशेंट ने ही बनाया है।

मिक्स हिस्सेदारी होने की वजह से इसे बैन नहीं किया गया है। इस गेम को अब तक दस करोड़ से ज्यादा लोग डाउनलोड कर चुके हैं। इसे डाउनलोड करने पर कोई पैसा नहीं लगता। हालांकि गेम के अंदर जरूर सुविधाओं के लिए पैसे खर्च करने होते हैं। एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2019 में कंपनी को गेम्स से 950 करोड़ की कमाई हुई थी।

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