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Chandigarh News: 58 हजार का चेक लेकर ही शव सौंपने के मामले में फोर्टिस को देना होगा चार लाख का मुआवजा
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चंडीगढ़। मोहाली के फोर्टिस अस्पताल की ओर से 58,931 रुपये का चेक लेने के बाद ही मरीज का शव सौंपने और बाद में चेक बाउंस होने पर मृतक के परिवार को इस रकम के लिए अदालती कार्रवाई में घसीटने के कृत्य पर राज्य उपभोक्ता आयोग ने कड़ा संज्ञान लिया है। आयोग ने अस्पताल को चार लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
आयोग ने मृतक के परिवार के अपील केस में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और तथ्यों को देखने के बाद कहा कि अस्पताल ने जिस रकम की मांग की, वह उसका हकदार नहीं था। शव को परिजनों को सौंपने के बजाय शवगृह में रखा गया और चेक देने के बाद ही शव सौंपा गया। वहीं, बाद में अस्पताल की ओर से अदालत में चेक बाउंस का केस दायर कर दिया गया जबकि वह इस रकम का हकदार भी नहीं था। यह जनता के लिए न सिर्फ गैरकानूनी बल्कि अनैतिक, असभ्य, अमानवीय, यातनापूर्ण और जघन्य है। अस्पताल को सेवा में कोताही बरतने और अनैतिक व्यापारिक गतिविधियों में शामिल होने का दोषी पाया गया।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने कहा कि इस मामले में जिला उपभोक्ता आयोग की ओर से एक लाख रुपये का मुआवजा देना कम था। ऐसे में उन आदेशों में बदलाव करते हुए फैसला दिया गया। आयोग ने अस्पताल को अपीलकर्ता पक्ष को हुई मानसिक पीड़ा, अपमान और शोषण के चलते चार लाख रुपये मुआवजा भरने का आदेश दिया है। वहीं अदालती खर्च के रूप में 10 हजार के बजाय 35 हजार रुपये भरने को कहा है। दूसरी ओर, जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले के खिलाफ अस्पताल की अपील को रद्द कर दिया गया है। यह आदेश जस्टिस राज शेखर अत्री ने जारी किए हैं। अस्पताल और उसके प्रबंध निदेशक व अन्य को प्रतिवादी बनाते हुए पिछले वर्ष यह अपील दायर की गई थी।
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इस मामले में सेक्टर 40सी की बीगो देवी और उनका बेटा राजिंदर सिंह रावत अपीलकर्ता थे। अपीलकर्ता बीगो देवी के पति सूरत सिंह की अस्पताल में तीन दिसंबर, 2017 को सर्जरी के दौरान मौत हो गई थी। वह सीजीएचएस के तहत लाभार्थी थे। सीजीएचएस के तहत उन्हें 24 नवंबर, 2017 को फोर्टिस अस्पताल रेफर किया गया था। इलाज का सारा खर्च सीजीएचएस को भरना था। अस्पताल ने इलाज का बिल 2,05,067 रुपये बनाया, जिसमें से मरीज को 58,931 रुपये भरने को कहा गया, जो महंगी एंटीबॉयोटिक दवा की कीमत थी।
अस्पताल बोला था-यह सीएबीजी पैकेज का हिस्सा नहीं था
शिकायतकर्ता पक्ष ने कहा कि 58,931 रुपये जमा न करवाने पर उनके पति का शव देने से अस्पताल ने इन्कार कर दिया था। लाचारी में इस रकम का चेक देकर शव परिवार को मिला। बाद में शिकायतकर्ता पक्ष को पता चला था कि फोर्टिस सीजीएचएस नियमों के तहत रकम चार्ज नहीं कर सकता था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने बैंक को रकम आगे देने से मना कर दिया और चेक रद्द हो गया। इस पर अस्पताल ने मोहाली अदालत में चेक बाउंस का केस दायर कर दिया। अदालती समन पर शिकायतकर्ता पक्ष पेश हुआ और रकम अस्पताल को देने के बाद अदालती मामला खत्म हो गया था। हालांकि, अस्पताल की ओर से ली गई रकम को गैर-कानूनी बताते हुए आयोग में शिकायत दायर की गई थी। वहीं, अस्पताल ने जवाब में कहा था कि सूरत सिंह को बाईपास सर्जरी के लिए उनके पास लाया गया था। इलाज के दौरान कैंसर सामने आया। यह पैकेज का हिस्सा नहीं था। यही यह रकम परिवार से मांगी गई थी।
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आयोग ने मृतक के परिवार के अपील केस में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और तथ्यों को देखने के बाद कहा कि अस्पताल ने जिस रकम की मांग की, वह उसका हकदार नहीं था। शव को परिजनों को सौंपने के बजाय शवगृह में रखा गया और चेक देने के बाद ही शव सौंपा गया। वहीं, बाद में अस्पताल की ओर से अदालत में चेक बाउंस का केस दायर कर दिया गया जबकि वह इस रकम का हकदार भी नहीं था। यह जनता के लिए न सिर्फ गैरकानूनी बल्कि अनैतिक, असभ्य, अमानवीय, यातनापूर्ण और जघन्य है। अस्पताल को सेवा में कोताही बरतने और अनैतिक व्यापारिक गतिविधियों में शामिल होने का दोषी पाया गया।
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राज्य उपभोक्ता आयोग ने कहा कि इस मामले में जिला उपभोक्ता आयोग की ओर से एक लाख रुपये का मुआवजा देना कम था। ऐसे में उन आदेशों में बदलाव करते हुए फैसला दिया गया। आयोग ने अस्पताल को अपीलकर्ता पक्ष को हुई मानसिक पीड़ा, अपमान और शोषण के चलते चार लाख रुपये मुआवजा भरने का आदेश दिया है। वहीं अदालती खर्च के रूप में 10 हजार के बजाय 35 हजार रुपये भरने को कहा है। दूसरी ओर, जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले के खिलाफ अस्पताल की अपील को रद्द कर दिया गया है। यह आदेश जस्टिस राज शेखर अत्री ने जारी किए हैं। अस्पताल और उसके प्रबंध निदेशक व अन्य को प्रतिवादी बनाते हुए पिछले वर्ष यह अपील दायर की गई थी।
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इस मामले में सेक्टर 40सी की बीगो देवी और उनका बेटा राजिंदर सिंह रावत अपीलकर्ता थे। अपीलकर्ता बीगो देवी के पति सूरत सिंह की अस्पताल में तीन दिसंबर, 2017 को सर्जरी के दौरान मौत हो गई थी। वह सीजीएचएस के तहत लाभार्थी थे। सीजीएचएस के तहत उन्हें 24 नवंबर, 2017 को फोर्टिस अस्पताल रेफर किया गया था। इलाज का सारा खर्च सीजीएचएस को भरना था। अस्पताल ने इलाज का बिल 2,05,067 रुपये बनाया, जिसमें से मरीज को 58,931 रुपये भरने को कहा गया, जो महंगी एंटीबॉयोटिक दवा की कीमत थी।
अस्पताल बोला था-यह सीएबीजी पैकेज का हिस्सा नहीं था
शिकायतकर्ता पक्ष ने कहा कि 58,931 रुपये जमा न करवाने पर उनके पति का शव देने से अस्पताल ने इन्कार कर दिया था। लाचारी में इस रकम का चेक देकर शव परिवार को मिला। बाद में शिकायतकर्ता पक्ष को पता चला था कि फोर्टिस सीजीएचएस नियमों के तहत रकम चार्ज नहीं कर सकता था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने बैंक को रकम आगे देने से मना कर दिया और चेक रद्द हो गया। इस पर अस्पताल ने मोहाली अदालत में चेक बाउंस का केस दायर कर दिया। अदालती समन पर शिकायतकर्ता पक्ष पेश हुआ और रकम अस्पताल को देने के बाद अदालती मामला खत्म हो गया था। हालांकि, अस्पताल की ओर से ली गई रकम को गैर-कानूनी बताते हुए आयोग में शिकायत दायर की गई थी। वहीं, अस्पताल ने जवाब में कहा था कि सूरत सिंह को बाईपास सर्जरी के लिए उनके पास लाया गया था। इलाज के दौरान कैंसर सामने आया। यह पैकेज का हिस्सा नहीं था। यही यह रकम परिवार से मांगी गई थी।