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परिवार से दूर होते फैमिली डाक्टर, लेकिन इनके फायदे दवाओं से ज्यादा असरदार

आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 23 Oct 2018 05:34 PM IST
सांकेतिक तस्वीर
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क्या आपको पुरानी फिल्म का वो दृश्य याद है, जिसमें फोन करते ही एक डाक्टर बैग लेकर घर पहुंच जाता था। स्टेथोस्कोप से मरीज की जांच करता और पर्ची में कुछ दवाइयां लिखकर चला जाता था। उसके बाद मरीज ठीक भी हो जाता था। वह उस परिवार का फैमिली डॉक्टर होता था। 80-90 के दशक में हर गांव या शहर में एक परिवार का फैमिली डॉक्टर हुआ करता था।
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और यही फैमिली डॉक्टर परिवार के हर सदस्य की बीमारी का इलाज करता था। समय बदलता गया और हर बीमारी के लिए एक अलग डॉक्टर आ गए। स्पेशलिस्ट डॉक्टरों के आने के बाद से फैमिली डॉक्टर धीरे-धीरे परिवारों से दूर होते गए। चंडीगढ़ में तो फैमिली डॉक्टर का कांसेप्ट खत्म ही हो चुका है।

लोग सीधे पीजीआई या मेडिकल कालेज के डाक्टर के पास जाते हैं। इससे इन अस्पतालों में भीड़ भी काफी रहती है। अधिक भीड़ के कारण सभी मरीजों को संतुष्टि भरा इलाज भी नहीं मिल पाता। दरअसल, उन्हें पता नहीं होता कि किस डिपार्टमेंट में जाना है। सही मार्गदर्शन नहीं मिलने पर मरीज इधर-उधर धक्के खाते रहते हैं। करीब डेढ़ दशक पहले चंडीगढ़ में 28 से ज्यादा नर्सिंग होम होते थे, लेकिन अब मात्र 13 ही बचे हैं। यही हाल छोटे क्लीनिक भी हैं।
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इसलिए खत्म हुआ फैमिली डाक्टर का कांसेप्ट

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