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मिसाल: चंडीगढ़ के गांव की कहानी... जहां हिंदुओं के घर बनता है इफ्तार, शाम को सब मिलकर खोलते हैं रोजा

Fri, 07 Apr 2023 04:42 PM IST
निवेदिता वर्मा नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
नीरज कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Fri, 07 Apr 2023 04:42 PM IST
सार

बेला झुग्गियां निवासी राम करण कहते हैं कि हम सब एक साथ मिलकर एक दूसरे का त्योहार मनाते हैं। एक दूसरे के दुख-सुख में शरीक होते हैं। सभी दस घर के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं। कौन हिंदू है, कौन मुस्लिम यह तो हमारे जेहन में भी नहीं होता।

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Iftar of Muslim families observing Roza Bela slums of village Cambwala of Chandigarh made in house of Hindus
कैंबवाला में साथ इफ्तार करते हिंदू मुसलमान - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

यहां न कोई हिंदू है न मुसलमान/इस बस्ती में रहते हैं केवल इंसान... अगर कहें कि यह शेर चंडीगढ़ के गांव कैंबवाला के बेला झुग्गियां के लिए ही लिखा गया है तो कोई हैरत नहीं होनी चाहिए। इस्लामिक कैलेंडर के पवित्र माह रमजान में यहां हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग भाईचारे की मिसाल पेश कर रहे हैं। इस टोले में रोजा रखने वाले मुस्लिम परिवारों का इफ्तार हिंदुओं के घर में बनता है। शाम को सूरज डूबने के बाद तय समय पर सभी मिलकर एक साथ रोजा खोलते हैं।

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यहां दोनों समुदाय के लोग एक साथ मिलकर एक-दूसरे का त्योहार मनाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि देश के बंटवारे के समय इस टोले के 50 से अधिक मुस्लिम परिवार पाकिस्तान चले गए थे। चंडीगढ़ के निर्माण के दौरान जब कैलड़ गांव को हटाया जा रहा था तो वहां से वर्ष 1951 में एक हिंदू और एक मुस्लिम परिवार को बेला झुग्गिगयां में लाकर बसाया गया। तभी से दोनों समुदाय के लोग सभी त्योहारों को धूमधाम से मनाते आ रहे हैं। अब यहां कुल दस घर हैं और दोनों समुदायों का परिवार फल-फूल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यहां तो पता ही नहीं चलता कि कौन मुस्लिम और कौन हिंदू है। दिवाली और ईद पर गांव में एक जैसा माहौल रहता है।
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मिलकर मनाते हैं त्योहार
बेला झुग्गियां निवासी राम करण कहते हैं कि हम सब एक साथ मिलकर एक दूसरे का त्योहार मनाते हैं। एक दूसरे के दुख-सुख में शरीक होते हैं। सभी दस घर के लोग एक परिवार की तरह रहते हैं। कौन हिंदू है, कौन मुस्लिम यह तो हमारे जेहन में भी नहीं होता। उन्होंने बताया कि मुस्लिम भाइयों के लिए इफ्तार में हम लोग खजूर, फल, पकौड़ियां, सेवई, चावल, दाल, रोटी, सब्जी आदि बनाते हैं।


राम करण ने बताया कि उनके दादा का नाम सुंदर था। चंडीगढ़ प्रशासन ने उन्हें लाकर वर्ष 1951 में यहां बसाया था। पहले वह गांव कैलड़ में रहते थे। कैलड़ गांव अब सेक्टर-24 बन चुका है। प्राचीन शिव मंदिर और बासंती देवी का प्रसिद्ध मंदिर अभी भी सेक्टर-24 में है। वहीं, मुस्लिम समुदाय के बाबा खान बताते हैं कि उनके दादा नबाव अली बेला झुग्गियां में सबसे पहले आए थे, अब उनका परिवार बढ़ गया है। रामकरण और बाबा खान ने बताया कि प्रशासन ने उनके परिवार को यहां बसाते समय 16 एकड़ का रकबा गांव के लिए रखा था। इसमें एक तालाब, श्मशान घाट, कब्रिस्तान और हड्डारोड़ी के लिए भी जगह निश्चित है।

युनूस के बेटों का नाम राकेश और राजकुमार
इस टोले में रहने वाले युनूस के दो बेटे हैं। एक का नाम राकेश तो दूसरे का राजकुमार है। युनूस कहते हैं कि हमारे बुजुर्गों ने जो नाम सुझा देते हैं, वही रख लेते हैं। बाबा खान के बेटे का नाम संजय खान है।

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