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जस्टिस ढींगरा बोले, जांच में क्यों शामिल नहीं किया IAS खेमका को?

Thu, 01 Sep 2016 03:46 PM IST
प्रवीण पाण्डेय/अमर उजाला, चंडीगढ़
प्रवीण पाण्डेय/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Thu, 01 Sep 2016 03:46 PM IST
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ias ashok khemka not included in dlf vadra land deal enquiry, justice dhingra told reason
डीएलएफ वाड्रा लैंड डील पर जस्टिस ढींगरा की रिपोर्ट - फोटो : अमर उजाला
वाड्रा डीएलएफ लैंड डील की जांच में जस्टिस ढींगरा ने आईएएस खेमका को शामिल नहीं किया। इसके पीछे का कारण भी उन्होंने बताया। जस्टिस एसएन ढींगरा आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपने के साथ स्पष्ट कर दिया है कि उन्होंने जांच में आईएएस अशोक खेमका को शामिल करना उचित नहीं समझा।
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जस्टिस ढींगरा ने पत्रकारवार्ता में साफ किया है कि मुझे आवश्यक लगता तो मैं खेमका को बुलाता। मैंने अपनी जांच को पूरा करने के लिए जिसको जरूरी समझा उसे बुला लिया।
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खेमका ने रिपोर्ट आने के बाद भले ही चुप्पी साध ली है, लेकिन अंदरखाते हकीकत यह है कि खेमका को भी रिपोर्ट के सार्वजनिक  होने का इंतजार है। रिपोर्ट के बाद मीडिया में खेमका की कोई भी टिप्पणी नहीं आई है।
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समय-समय पर ट्वीट करते रहने वाले खेमका ने कोई ताजा ट्वीट भी नहीं किया है। रिपोर्ट के सौंपे जाने के साथ वह बुकलेट जरूर सुर्खियों में आ गई है, जिसे भाजपा ने चुनाव के मैदान में प्रयोग किया था। दामादश्री के नाम से जारी इस बुकलेट में वाड्रा से इस लैंड डील को लेकर कई सवाल किए गए हैं।

ये सवाल शामिल हैं या नहीं यह रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद साफ होगा। सूत्रों के मुताबिक सरकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से पहले आलाकमान से सलाह करेगी। प्रकाश सिंह कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने के बाद सरकार को सही टाइमिंग का इंतजार है।

क्या था पूरा मामला

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रॉबर्ट वाड्रा, अशोक खेमका और मनोहर लाल खट्टर - फोटो : फाइल फोटो
हरियाणा में पूर्व हुड्डा सरकार के कार्यकाल के दौरान वर्ष 2008 में सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा की कंपनी ने गुड़गांव में एक कंपनी से साढे़ तीन एकड़ जमीन साढ़े सात करोड़ में खरीदी थी। सरकार ने कुछ समय बाद ही वाड्रा की कंपनी को कालोनी बनाने का लाइसेंस जारी कर दिया।

वाड्रा की कंपनी ने खुद कालोनी बनाने की बजाय इस जमीन को करीब 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ कंपनी को बेच दी। यह मामला तब सुर्खियों में आया जब चकबंदी विभाग के निदेशक पद पर तैनात आईएएस अशोक खेमका ने इस सौदे पर सवाल खडे़ किए।

--यह मुद्दा वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में गर्माया
--भाजपा ने चुनावी मुद्दा बना सत्ता में आने के बाद जांच का एलान किया था
--सत्ता में आने के बाद जांच के लिए जस्टिस ढींगरा आयोग का गठन हुआ
--7 मई 2015 को ढींगरा आयोग का गठन किया गया था।
--आयोग का पहला कार्यकाल 8 दिसंबर 2015 को समाप्त हुआ था
--सरकार ने आयोग की मांग पर आयोग को एक्सटेंशन दे दी
--आयोग के कार्यकाल में पहले 7 जून 2016 और बाद में 30 जून 2016 को वृद्धि की गई
--आयोग को दी गई समयावधि 31 अगस्त को समाप्त हो रही
--आयोग ने इस डील से संबंधित करीब 250 फाइलों की जांच की
-- दो दर्जन से अधिक अधिकारियों से पूछताछ करते हुए उनके बयान कलमबद्ध किए

रिपोर्ट के साथ सधे जवाब दे गए जस्टिस ढींगरा

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CM Khattar - फोटो : Amar Ujala
वाड्रा डीएलएफ लैंड डील की जांच रिपोर्ट के साथ मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर से मिलने पहुंचे जस्टिस ढींगरा ने 10 मिनट की पत्रकारवार्ता में मीडिया के सामने इस प्रकरण की अनियमितताओं की बात तो उजागर कर दी, लेकिन अनियमितताओं को उजागर करने से परहेज किया। वजह साफ है कि तय दिशा-निर्देशों के कारण जस्टिस ढींगरा ने ज्यादा कुछ बोलना उचित नहीं समझा।

तकरीबन आठ मिनट की पत्रकारवार्ता में उन्होंने उन्हीं सवालों के उत्तर दिए जो जरूरी समझे। उत्तर भी सधे हुए शब्दों में थे। जस्टिस ढींगरा का कार्यक्रम पहले मुख्यमंत्री आवास पर जाने का था, लेकिन बदलाव के चलते वे सचिवालय के चौथे तल पर पहुंचे। उनके आने के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने उनके साथ दस मिनट की मुलाकात की और रिपोर्ट ली।

मीडिया से मुखातिब होने के दौरान पहले सवाल के जवाब में ही जस्टिस ढींगरा ने साफ कर दिया कि वे अधिक कुछ बताने के मूड में नहीं हैं। हां, उनकी रिपोर्ट को चुनौती देने संबंधी एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा कि कोई भी आर्डर जो पूरी तरह से विधिसम्मत तरीके से तैयार किया गया हो, वह चैलेंज हो सकता है। हरियाणा सरकार की ओर से लाभ लेने संबंधी आरोपाें पर उन्होंने कहा कि इस तरह के आरोपों का कोई वजूद नहीं होता। आरोप लगते रहते हैं।
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