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हरियाणा में कांग्रेस में हजकां के विलय होने के क्या होंगे मायने, देखिए
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक।
Updated Thu, 28 Apr 2016 11:23 AM IST
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कुलदीप, रेणुका विश्नोई, राहुल गांधी
- फोटो : Bureau
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कांग्रेस में विलय से जहां हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) की घर वापसी होगी, वहीं कांग्रेस ने भी अपने पुराने साथी के सहारे जनाधार बढ़ाने की कोशिश की है। हजकां के कांग्रेस में विलय से जहां उसके कार्यकर्ताओं को हिसार से बाहर पहचान मिलेगी, वहीं कांग्रेस उसके आधार पर अपने जनाधार का विस्तार कर सकेगी।
सियासी गलियारे में चर्चा है कि दोनों दलों ने अपने-अपने कद को बढ़ाने के लिए यह दांव चला है। ऐसा करना दोनों के लिए इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि हजकां का दायरा जहां लगातार सिमटता जा रहा था, वहीं कांग्रेस के लिए भी पिछले विधानसभा चुनाव और बाद में पंचायत चुनाव बेहतर नतीजे देने वाले नहीं रहे। हालांकि हजकां का कांग्रेस में विलय का दोनों को क्या फायदा होगा यह आने वाला वक्त बताएगा।
हरियाणा में वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में भजनलाल की अगुवाई में 67 सीटें जीतने के बाद भी कांग्रेस ने जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सीएम बना दिया तो उनका गुस्सा साफ दिखा। वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में हजकां के 6 विधायक बने, लेकिन वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी केवल हिसार तक सिमटकर रह गई। पार्टी के अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई ने आदमपुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की तो उनकी पत्नी रेणुका विश्नोई हांसी से जीतीं। दूसरी ओर, वर्ष 2005 में 67 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2009 में 40 सीटों पर ही सिमट गई।
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जबकि साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से ही बाहर हो गई और केवल 15 सीट ही जीत सकी। हुड्डा के गढ़ रोहतक, सोनीपत व झज्जर ने कांग्रेस की लाज को बचाया। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गई। मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में इनेलो आ गया। इसके बाद पंचायत चुनाव भी कांग्रेस के लिए परेशान करने वाले रहे। जिला परिषद प्रधान के लिए जोर लगाने के बावजूद एक भी जिले में चेयरमैनी कांग्रेस को नहीं मिल सकी। राजनीतिक जानकारों के अनुसार एक तरह से प्रदेश में कांग्रेस और हजकां अपने वजूद को पाने के लिए जंग लड़ रही हैं। यही वजह है कि दोनों ने एकजुट होना बेहतर समझा। अब एक-दूसरे के सहारे पुराने दौर में लौटने की रणनीति बनाई जा सकती है।
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सियासी गलियारे में चर्चा है कि दोनों दलों ने अपने-अपने कद को बढ़ाने के लिए यह दांव चला है। ऐसा करना दोनों के लिए इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि हजकां का दायरा जहां लगातार सिमटता जा रहा था, वहीं कांग्रेस के लिए भी पिछले विधानसभा चुनाव और बाद में पंचायत चुनाव बेहतर नतीजे देने वाले नहीं रहे। हालांकि हजकां का कांग्रेस में विलय का दोनों को क्या फायदा होगा यह आने वाला वक्त बताएगा।
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हरियाणा में वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में भजनलाल की अगुवाई में 67 सीटें जीतने के बाद भी कांग्रेस ने जब भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सीएम बना दिया तो उनका गुस्सा साफ दिखा। वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में हजकां के 6 विधायक बने, लेकिन वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी केवल हिसार तक सिमटकर रह गई। पार्टी के अध्यक्ष कुलदीप विश्नोई ने आदमपुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की तो उनकी पत्नी रेणुका विश्नोई हांसी से जीतीं। दूसरी ओर, वर्ष 2005 में 67 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2009 में 40 सीटों पर ही सिमट गई।
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जबकि साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से ही बाहर हो गई और केवल 15 सीट ही जीत सकी। हुड्डा के गढ़ रोहतक, सोनीपत व झज्जर ने कांग्रेस की लाज को बचाया। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गई। मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में इनेलो आ गया। इसके बाद पंचायत चुनाव भी कांग्रेस के लिए परेशान करने वाले रहे। जिला परिषद प्रधान के लिए जोर लगाने के बावजूद एक भी जिले में चेयरमैनी कांग्रेस को नहीं मिल सकी। राजनीतिक जानकारों के अनुसार एक तरह से प्रदेश में कांग्रेस और हजकां अपने वजूद को पाने के लिए जंग लड़ रही हैं। यही वजह है कि दोनों ने एकजुट होना बेहतर समझा। अब एक-दूसरे के सहारे पुराने दौर में लौटने की रणनीति बनाई जा सकती है।