लोकायुक्त की टिप्पणी- 'सरहद पर देश के लिए लड़ने वालों से धोखाधड़ी पर चुप क्यों सरकार'
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एक कर्नल से हाउसिंग प्रोजेक्ट के तहत किए गए फर्जीवाड़े के मामले में हरियाणा लोकायुक्त ने कड़ी टिप्पणी करते हुए फैसला सुनाया है। अपने आदेश में हरियाणा लोकायुक्त ने कहा है कि सरहद पर देश के लिए लड़ने वाले जवान के साथ धोखाधड़ी हो जाती है और सरकारी मशीनरी इस पर कोई एक्शन ही नहीं लेती और न ही धोखाधड़ी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करती है।
लोकायुक्त ने फैसले में हरियाणा पुलिस और हरियाणा कॉपरेटिव सोसायटीज के इंस्पेक्टर की भूमिका पर भी बेहद हैरानी जताते हुए आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। हरियाणा लोकायुक्त ने अब यह आदेश दिया है कि पुलिस मार्च 2016 में दर्ज की गई एफआईआर पर दोबारा जांच करें और आरोपियों के खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई करें।
साथ ही रजिस्ट्रार कॉपरेटिव सोसायटी हरियाणा इस सोसायटी को रद्द कर उसका चार्ज खुद ले और संबंधित सोसायटी से पीड़ित कर्नल को हर्जाना व उसकी मूल राशि ब्याज समेत उसे वापस दिलवाए। साथ ही इस तरह की हाउसिंग सोसायटी के संदर्भ में गाइडलाइन जारी करें, ताकि अन्य लोग भी इस तरह झांसे में न आए। लोकायुक्त ने तीन महीने में एक्शन टेकन रिपोर्ट भी तलब की है।
यूं कर्नल के साथ हुई धोखधड़ी
-कर्नल चरणजीत (सीजे) सिंह ने सन 1992 में अंबाला की शांति निकेतन कोओपरेटिव हाउसिंग बिल्डिंग सोसायटी लिमिटेड के एक हाउसिंग प्रोजेक्ट में 62000 रुपये लगाए। सोसायटी के एक पदाधिकारी व उसके भाई ने उन्हें जीटी रोड अंबाला कैंट पर स्थित एक हाउसिंग प्रोजेक्ट का झांसा देकर एक प्लॉट देने की बात कही।
सोसायटी उस वक्त न तो संबंधित जमीन की मालिक थी और न ही उस जमीन पर प्लॉटिंग के लिए सीएलयू लिया था। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग हरियाणा से अनुमति भी नहीं थी। कर्नल को सोसायटी ने सादे कागज पर टाइप कर प्लॉट का अलॉटमेंट लेटर थमा दिया था। मगर उसे यह भी नहीं बताया गया कि उसका प्लॉट कहां है और उसकी रजिस्ट्री कब और कैसे होगी। अब तक न तो उन्हें प्लाट और न ही उसे निवेश की गई उनकी धनराशि वापस मिली।
पुलिस ने भी कर दी हद
-इस मामले में कर्नल ने रिटायर्ड होने के बाद हरियाणा पुलिस के महानिदेशक को भी शिकायत भेजी और अंबाला पुलिस को भी शिकायत दी। मगर कोई सुनवाई नहीं हुई। अंतत: जब कर्नल ने प्रधानमंत्री को शिकायत भेजी, तो उसके बाद अंबाला पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ 15 मार्च 2016 में एफआईआर दर्ज कर ली। लेकिन हद तो तब हो गई जब पुलिस ने इस एफआईआर में गंभीरता से जांच करने की बजाए 11 फरवरी 2017 को रद्द कर दिया। लोकायुक्त ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि जिस मामले में पुलिस को इलाका मजिस्ट्रेट के सामने चार्जशीट पेश करनी चाहिए, पुलिस ने उस केस को ही रद्द कर दिया।