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Hindi News ›   Chandigarh ›   Haryana Assembly Elections 2019, Bhupinder Singh Hooda Efforts to Complete Mission 46

हरियाणा विस चुनावः कांग्रेस के 'मिशन 46' की राह में अपने ही बने रोड़ा, पर हुड्डा ने झोंकी ताकत

Sat, 19 Oct 2019 10:12 AM IST
खुशबू गोयल यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Sat, 19 Oct 2019 10:12 AM IST
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Haryana Assembly Elections 2019, Bhupinder Singh Hooda Efforts to Complete Mission 46
भूपेंद्र हुड्डा, शैलजा कुमारी - फोटो : सोशल मीडिया
हरियाणा की सियासत का दंगल अंतिम घड़ियों में पहुंच चुका है। सत्ता पाने के लिए भाजपा, कांग्रेस, जजपा और इनेलो के साथ ही सभी छोटे दल भी जोर आजमाइश कर रहे हैं। सरकार बनाने का दावा तो सब कर रहे हैं, मगर अंतिम फैसला जनता-जनार्दन को करना है। मतदाता सबको अपने तराजू में तोल रहा है, जिसकी नीतियां और चेहरा उसे भा गया, उसकी बल्ले-बल्ले तय है। भाजपा जहां दोबारा सरकार बनाने का भरोसा जता रही है, वहीं कांग्रेस को उम्मीद है कि जनता इस बार उसका साथ देगी।
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सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय मुद्दों को उछालने के साथ ही अपने पांच साल के कामों को गिना रहा है तो कांग्रेस का जोर स्थानीय मुद्दे उठाने के साथ ही भाजपा की कमियां निकालने पर है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती मिशन-46 को पूरा करने के लिए अंदरखाने चल रहे शह और मात के खेल से निपटना भी है। अनेक सीटों पर कांग्रेसी एक-दूसरे को ही निपटाने में लगे हुए हैं। मुख्य विपक्षी दल के लिए सबसे बड़ा खतरा भाजपा से ज्यादा भितरघात बना हुआ है। इस स्थिति में कांग्रेस को जीत दिलाना पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
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हुड्डा नाराज नेताओं की मान-मनौव्वल करने के साथ ही अधिक से अधिक उम्मीदवार जिताने के लिए भी पसीना बहा रहे हैं। उन्होंने उत्तर, दक्षिण के साथ मध्य हरियाणा पर विशेष फोकस किया हुआ है। हुड्डा का पूरा ध्यान भाजपा के 75 पार के नारे को फिफ्टी-फिफ्टी करने पर है। साथ ही वह भाजपा के नए गढ़ों उत्तर व दक्षिण हरियाणा में सेंधमारी में लगे हैं। इन दोनों एरिया में भाजपा ने पिछली बार 56 में से 37 सीटें जीती थी, जिससे उसके लिए सत्ता का मार्ग प्रशस्त हुआ। हुड्डा की रणनीति इस बार भाजपा को दोनों गढ़ों में मात देने की है।
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21 अक्टूबर को मतदान और 24 अक्टूबर को मतगणना के बाद साफ हो जाएगा कि जनता ने अगले पांच साल के लिए किस पर भरोसा जताया है।

तंवर समर्थक सोशल मीडिया पर सक्रिय

मतदान से ठीक पहले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर के समर्थक सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए हैं। व्हाट्सएप ग्रुप पर एक मैसेज बड़ी तेजी से वायरल किया जा रहा है। इसमें लिखा है कि अशोक तंवर के पिछले साढ़े पांच साल के संघर्ष को याद रखते हुए 21 अक्टूबर को मेहनती, संघर्षशील साथियों को वोट करें। प्रदेश में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म करने का मौका आपको मिला है।

अपने वोट की चोट से सरकार को सत्ता से बाहर करने का काम करें, जिन्होंने साढ़े पांच साल में तंवर के संघर्ष के रास्ते में अड़चनें पैदा करने का काम किया और दिल्ली केभैरव मंदिर पर उन पर जो हमला हुआ उसे याद करें। प्रदेश में व्याप्त राजनीतिक गंदगी को साफ करने का इससे अच्छा मौका फिर नहीं मिलेगा। इसलिए अच्छे साथियों को ही वोट करें।

हुड्डा को छोड़ सब दिग्गज घर में उलझे
हरियाणा में कांग्रेस की नैया पार लगाने का पूरा दारोमदार भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर ही है। हुड्डा ही अकेले ऐसे प्रत्याशी हैं जो अपनी सीट संभालने के साथ कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए पूरे प्रदेश में जाकर प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस के बाकी दिग्गज अपनी-अपनी सीट बचाने में जुटे हैं। पूर्व सीएलपी लीडर किरण चौधरी तोशाम से बाहर नहीं निकल पाईं, एआईसीसी मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला कैथल में ही सिमट कर रह गए हैं, दोनों बाहर प्रचार के लिए लिए ज्यादा समय नहीं निकाल पा रहे।

कैप्टन अजय यादव का भी पूरा ध्यान रेवाड़ी में बेटे चिरंजीव राव पर लगा हुआ है। चूंकि, चिरंजीव का चुनावी रणनीति में यह पहला कदम है। कुलदीप बिश्नोई भी आदमपुर में ही डटे हुए हैं, क्योंकि उनका मुकाबला टिकटॉक गर्ल सोनाली फौगाट से है। इनेलो से कांग्रेस में आए अशोक अरोड़ा ने भी पूरा फोकस अपनी सीट पर ही किया हुआ है।

जीटी रोड, जाटलैंड, मेवात में कड़ी टक्कर में कांग्रेस

कांग्रेस सरकार बनाएगी या नहीं, यह भविष्य के गर्भ में है, लेकिन बीते चुनाव की तुलना कांग्रेस अनेक सीटों पर अच्छा प्रदर्शन करती दिख रही है। जीटी रोड़ बेल्ट, जाटलैंड और मेवात में कांग्रेस प्रत्याशी, भाजपा और जजपा उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। उम्मीदवारों की छवि और स्थानीय समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कराए गए कामों से भी जनता का समर्थन मिल रहा है। उधर, दीपेंद्र हुड्डा ने बागियों की घर वापसी और दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ लाने का जिम्मा अब भी संभाला हुआ है।

अंबाला लोकसभा में कांग्रेस अपने ही चक्रव्यूह में फंसी
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुमारी सैलजा के गृह लोकसभा क्षेत्र अंबाला में कांग्रेस अपने ही चक्रव्यूह में फंस गई है। अनेक सीटों पर कांग्रेस ने बाहर से आए नेताओं को उतारा है या फिर एक-दूसरे की रिश्तेदारी में ही टिकट दिए हैं। जिससे पार्टी का पुराना कैडर नाराज चल रहा है। पुराने लोग टिकट की आस लगाए बैठे थे, मगर मिल नए-नवेले लोगों को गई, जिससे भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। नाराज नेता फील्ड में तो दिख रहे हैं, लेकिन उनका समर्थन मतदान में कितना रहेगा, यह देखने लायक होगा। कुछ सीटों पर बेहद कमजोर प्रत्याशी भी उतारे गए हैं। यही कारण रहा कि पूर्व मंत्री निर्मल सिंह व उनकी बेटी चित्रा सरवारा निर्दलीय मैदान में हैं।

उत्तर-दक्षिण हरियाणा में जनता साथ तो ही लड़ाई में कांग्रेस
उत्तर-दक्षिण हरियाणा की 56 सीटों पर अगर जनता ने कांग्रेस का साथ दिया तो ही पार्टी सरकार बनाने की लड़ाई लड़ पाएगी। इन सीटों पर भाजपा ने अपनी अच्छी पकड़ बनाई हुई है। हालांकि, बीते विधानसभा व 2019 लोकसभा चुनाव की तुलना इस बार धरातल पर हालात कुछ भिन्न नजर आ रहे हैं। जजपा भी कांग्रेस के समीकरण कई सीटों पर बिगाड़ रही है। कांग्रेस 56 में से अधिकांश सीटें जीतकर ही सत्ता पर काबिज होने का सपना देख सकती है।

विरोधी निकालना चाह रहे रास्ते का कांटा

कांग्रेस के भीतर सत्ता में आने से ज्यादा अपने-अपने रास्ते के कांटे निकालने की भी कोशिश चल रही है। पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री बनने को लेकर एक अनार, सौ बीमार वाली स्थिति है। हुड्डा दो बार प्रदेश के सीएम रह चुके हैं, तीसरी बार का दावा भी मजबूत है। पार्टी ने सरकार बनाने के लिए इस बार भी उन पर ही भरोसा जताया है। हाईकमान का हुड्डा को तवज्जो देना अनेक कांग्रेसियों को रास नहीं आ रहा है। वे चाहते हैं कि हुड्डा का कांटा निकालकर भविष्य के लिए अपनी दावेदारी मजबूत कर लें।

पद पर रहे तो कांग्रेस अच्छी, पद से हटे तो खराब : शुक्ला
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला ने पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर पर चुटकी ली है। उन्होंने कहा कि जब तक पद पर रहे तो कांग्रेस अच्छी और पद से हट गए तो कांग्रेस खराब। जनता ऐसे लोगों से गुमराह न हो। यह कांग्रेस का कल्चर नहीं है। कांग्रेस की संस्कृति है कि पद पर रहते हुए भी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारियां निभाएं और पद से हटने के बाद भी।
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