Haryana Assembly Election: बिना सीएम चेहरे और संगठन के रण में उतरेगी कांग्रेस, एंटी इन्कंबेंसी से आस
हरियाणा में एक अक्तूबर को मतदान होगा। चार अक्तूबर को परिणाम आएगा। चुनाव आयोग के एलान के बाद से प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है।
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हरियाणा में विधानसभा के आम चुनाव का एलान हो चुका है। पिछली बार की तरह इस बार भी कांग्रेस हरियाणा में बिना सीएम चेहरे और बिना संगठन के चुनावी रण में उतरेगी।
हरियाणा कांग्रेस ने बिना संगठन के ही चुनावी तैयारियां शुरू भी कर दी हैं। अब साफ हो गया है कि कांग्रेस जिला अध्यक्षों और ब्लाक अध्यक्षों की कोई सूची नहीं आएगी। कांग्रेस हाईकमान ने भी इस पर मुहर लगा दी है। वहीं, दस साल से सत्ता से बेदखल कांग्रेस से भाजपा की एंटी इनकंबेंसी से आस है। खासकर लोकसभा चुनावों में पांच सीटें जीतने के बाद से कांग्रेस जमीनी स्तर पर भी पूरी ताकत झोंके हुए है।
सीएम चेहरे को लेकर है विवाद
हरियाणा कांग्रेस में सीएम चेहरे को लेकर विवाद है। पिछले दस साल से कांग्रेस हरियाणा में सत्ता से बेदखल है और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा विधायक दल के नेता हैं। एक खेमा हुड्डा को भावी सीएम के तौर पर प्रोजेक्ट कर रहा है, जबकि दूसरा खेमा कुमारी सैलजा के लिए जोर लगा रहा है। दोनों ही खेमे समय-समय पर सार्वजनिक मंचों के साथ पार्टी हाईकमान के सामने सीएम पद के लिए दावेदारी पेश कर चुके हैं। लेकिन हाईकमान दोनों ही चेहरों में किसी को भी सीएम फेस घोषित नहीं कर रहा।
पिछले दिनों दिल्ली में हुई राष्ट्रीय स्तर की बैठक में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी इस पर स्थिति साफ कर चुके हैं। बैठक में कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष चौधरी उदयभान और कुमारी सैलजा मौजूद रहे थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने साफ कर दिया है कि सीएम का फैसला चुनाव के बाद विधायकों और पार्टी हाईकमान पर निर्भर करेगा। इसी प्रकार हाईकमान ने संगठन की सूची जारी करने से इन्कार कर सीधे चुनाव में उतरने के लिए बोल दिया है। इस बारे में हरियाणा प्रभारी दीपक बावरिया का कहना है कि सीएम का फैसला हाईकमान और विधायक करते हैं।
दस साल से नहीं बन पाया संगठन
हरियाणा कांग्रेस में पिछले दस साल से संगठन नहीं बन पाया है। पहले अशोक तंवर, कुमारी सैलजा भी प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन दोनों ही गुटबाजी के चलते संगठन नहीं बना पाए। अब पिछले दो साल से अधिक से कमान चौधरी उदयभान के पास हैं। पिछले डेढ़ साल से जिलाध्यक्षों और ब्लाक अध्यक्षों की सूची तैयार करके हाईकमान को भेजी जा चुकी है, लेकिन यहां पर भी गुटबाजी हावि होने के चलते सूची जारी नहीं हो पाई है। हुड्डा खेमा और विरोधी खेमा अपने अपने समर्थकों को जिम्मेदारी देने की वकालत कर रहे हैं, इसलिए मामला सिरे नहीं चढ़ रहा है।
इसलिए संगठन और सीएम चेहरा नहीं
कांग्रेस की परंपरा रही है कि वह अक्सर सीएम का चेहरा चुनाव से पहले घोषित नहीं करती है। हिमाचल प्रदेश समेत अन्य राज्य इसके उदाहरण हैं। इसलिए किसी एक नेता को मुख्य कमान देने की से दूसरे धड़े नाराज होते हैं और प्रदेश में एकतरफा एक गुट हावी हो जाता है। चुनाव से पहले कांग्रेस गुटबाजी को कम करने की कोशिश में है। दूसरा, संगठन भी इसलिए ही घोषित नहीं किया, क्योंकि चुनाव से ऐन वक्त पर ऐसा करने से गुटबाजी और आपसी विरोध बढ़ने की आशंका है।
ये हैं चुनौती
कांग्रेस की गुटबाजी ही सबसे बड़ा मुद्दा है
सीएम का चेहरा घोषित नहीं, अलग अलग धड़े कर रहे दावा
कांग्रेस के पास दस साल से संगठन नहीं है, भाजपा के पास जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता
ये है उम्मीद
दस साल से सत्तासीन भाजपा के खिलाफ एंटी इंकमबेंसी
किसान आंदोलन और कर्मचारी आंदोलन से कांग्रेस को लाभ की उम्मीद
लोकसभा के परिणामों से उत्साहित कांग्रेसी नेता जमीनी स्तर पर कर रहे काम