Haryana Election: बांगर की धरती देगी सत्ता की चाबी... कांग्रेस को बड़े चेहरों, भाजपा को संगठन और बागियों से आस
हरियाणा की बांगर की धरती की खासियत यह है कि वो दोहरी नाव में सवार नहीं होते, जिसके साथ होते हैं तो उसका खुलकर साथ देते हैं और जिसके खिलाफ होते हैं, उसकी मुखालफत खुलेआम करते हैं। शुरू से ही बांगर में सत्ता का नारा चलता रहा है, ये बात अलग है कि अब तक बांगर की धरती से कभी हरियाणा का मुख्यमंत्री नहीं बना। बावजूद इसके हरियाणा के इस बार के विधानसभा चुनाव में बांगर बेल्ट का फैसला काफी अहम रहेगा।
विस्तार
1966 में जन्मे हरियाणा में जब भी कोई सरकार बनी है, उसके लिए सत्ता की राह हमेशा बांगर की धरती से होकर गुजरी है। अपनी अलग बोली और मुखर अंदाज के चलते इस धरती के मतदाताओं ने जिस भी नेता को पकड़ा, उसको कभी छोड़ा नहीं।
कांग्रेस का बड़े चेहरों पर दारोमदार
राजनीतिक समझ यहां के आम व खास व्यक्ति की नस-नस में बसी है। इस बार इस बेल्ट में कांग्रेस का अपने बड़े चेहरों पर दारोमदार है तो भाजपा को अपने संगठन और बागियों से आस है। इस क्षेत्र में जजपा से टूटकर तीन विधायक भाजपा में आ चुके हैं और एक आने की तैयारी में है।
बांगर बेल्ट में भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जिसका पूरी बेल्ट में प्रभाव हो। पिछली बार मजबूत स्थिति में रही जजपा की इस बार सियासती जमीन खिसकी हुई है। वहीं, इनेलो को बसपा के सहारे पुराने गढ़ में दोबारा वापसी की कोशिश में है।
बांगर में 13 विधानसभा सीटें
क्षेत्र के हिसाब से बांगर में विधानसभा की 13 सीटें हैं। इनमें जींद जिले की 5, कैथल की 4 और फतेहाबाद जिले की टोहाना और हिसार की उकलाना सीटें आती हैं। इनमें सबसे अधिक सीटें 8 सीटें जजपा और 3 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस और निर्दलीय 1-1 विधायक है। कांग्रेस के पास यहां पर पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह, रणदीप सुरजेवाला और जेपी के रूप में बड़े चेहरे हैं। भाजपा जींद के विधायक कृष्ण मिढ्डा, कैथल विधायक लीला राम और पूर्व मंत्री कमलेश ढांडा के ही भरोसे है। कांग्रेस के पास संगठन नहीं है, जबकि भाजपा का जमीनी स्तर पर मजबूत कैडर है। भाजपा चेहरों की बजाय संगठन के दम पर इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की जुगत में है।
बांगर में यू खिसक गई जजपा की जमीन
पिछले विधानसभा चुनाव में बांगर की धरती पर जजपा पार्टी सबसे मजबूत पार्टी के रूप में उभरी थी। पूर्व डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला ने खुद उचाना से ताल ठोकी और आसपास के क्षेत्रों में उनका असर दिखा और पार्टी ने इस क्षेत्र में 8 सीटें जीतीं, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन कर सत्ता में रहने और बाद में टूटने के बाद यहां के समीकरण बदल गए हैं।
जजपा के विधायक पार्टी छोड़कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। जजपा के रामनिवास सुरजाखेड़ा, जोगीराम सिहाग, अनूप धानक भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं, रामकुमार गौतम भी भाजपा में जा सकते हैं। वहीं, विधायक ईश्वर सिंह कांग्रेस में जा चुके हैं। इसलिए जजपा के पास इस बार अपना गढ़ बचाना बड़ी चुनौती है। भाजपा के साथ गठबंधन करने से यहां के मतदाता जजपा से खासे नाराज हैं।
विकास को तरसता इलाका
हर बार में सत्ता में भागीदारी के बावजूद बांगर का इलाका विकास के लिए तरस रहा है। न तो यहां कोई बड़ा उद्योग है और न ही कोई बड़ा संस्थान। बेरोजगारी यहां बड़ा मुद्दा है। खेतों के लिए नहरी पानी शुरू से बड़ी समस्या है। यहां की जमीन कम उपजाऊ है। शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए भी लोगों को दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता है। एक्सप्रेस-वे बनने से जरूर शहरों की तस्वीर बदली है और आसपास की जमीनें काफी महंगी हो गई हैं।
13 में से आठ सीटों पर जीती थी जजपा
विधानसभा क्षेत्र पार्टीजींद भाजपा
कैथल भाजपा
कलायत भाजपा
उचाना जजपा
नरवाना जजपा
गुहला चीका जजपा
टोहाना जजपा
उकलाना जजपा
जुलाना जजपा
बरवाला जजपा
नारनौद जजपा
सफीदों कांग्रेस
पुंडरी निर्दलीय
कोई स्थानीय नेता नहीं बन पाया सीएम
बांगर को प्रदेश की राजनीतिक राजधानी कहा जाता है। इसलिए सभी दलों का इस बेल्ट पर फोकस रहा है। ताऊ देवीलाल, ओपी चौटाला, भजनलाल, भूपेंद्र सिंह हुड्डा भी यहां राजनीतिक संघर्ष शुरू कर सत्ता तक पहुंचे हैं। अधिकतर सरकारों में बांगर की हिस्सेदारी रही, लेकिन हरियाणा के अलग प्रदेश बनने के 58 साल बाद भी यहां के किसी स्थानीय नेता को सीएम बनने का सौभाग्य नहीं मिला है। ओमप्रकाश चौटाला नरवाना से विधायक होते हुए सीएम बने थे, लेकिन उनका मुख्य क्षेत्र सिरसा रहा है। चौधरी बीरेंद्र सिंह और रणदीप सुरजेवाला सीएम पद की दौड़ में रहे, लेकिन यह दौड़ आज भी जारी है।
अधिकतर सीटों पर जाट वर्ग प्रभावशाली
बांगर बेल्ट जाट बहुल है। अधिकतर सीटों पर जाट समाज निर्णायक भूमिका में है। इनके साथ ही ओबीसी, अनुसूचित जाति समाज का भी खासा वोट बैंक है। अलग-अलग सीटों पर रोड़, गुर्जर, ब्राह्मण, सैनी और वैश्य बिरादरी के भी अधिक मतदाता हैं। इस बार भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है, जबकि जजपा और इनेलो दलित मतदाताओं को साधने की कोशिश में है।
पुराने गढ़ में लौटने की कोशिश में इनेलो
कभी बांगर की धरती इनेलो का गढ़ रहा है। इसी गढ़ को देखते हुए दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बनाते ही इस धरती को अपनी कर्मस्थली चुना। इस बार इनेलो इस बेल्ट पर खासा फोकस कर रही है। खुद अभय चौटाला या उनका बेटा अर्जुन चौटाला उचाना से ताल ठोक सकते हैं। इनके अलावा पूर्व सीपीएस रामपाल माजरा कलायत में मजबूत चेहरा हैं। वह इस समय पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं और इनेलो के पुराने नेता हैं। पिछली बार वह इनेलो छोड़कर भाजपा में चले गए थे।
आप को भी इसी बेल्ट से आस
आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सुशील गुप्ता और अनुराग ढांडा भी बांगर बेल्ट में सक्रिय हैं। खुद अरविंद केजरीवाल जींद में दो बड़ी रैली कर चुके हैं। डॉ. सुशील गुप्ता का मूल गांव शामलों कलां जींद में पड़ता है और वे जींद शहर से चुनाव लड़ने की मंशा रखते हैं। यहां पर वैश्य समाज के पहले भी कई विधायक रहे हैं। इसी को देखते वह सुशील गुप्ता जींद में सक्रिय हैं, जबकि अनुराग ढांडा कैथल के किठाना गांव से आते हैं।