विस चुनावः ये है अमित शाह का मुख्य एजेंडा
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हरियाणा विधानसभा की सियासी जंग के लिए विभिन्न राजनीतिक दलों के ‘महारथी’ चुनाव मैदान में उतरने लगे हैं। सियासत के महारथियों के लिए इस बार चुनावी जंग का मैदान भी बदला-बदला सा है। इस बार आमने-सामने के चुनावी संघर्ष के लिए दलों के साथ ही रथी व महारथी भी बदल चुके हैं।
लोकसभा चुनाव से ही भाजपा यहां की सियासत में दमदार मौजूदगी दर्ज करा रही है। उत्तर प्रदेश में अपनी कामयाबी का परचम लहराने वाले भाजपा के नए अध्यक्ष अमित शाह के एजेंडे में अब हरियाणा फतेह सबसे ऊपर है। इसीलिए भाजपा से लेकर पूरा संघ परिवार यहां सक्रिय हो गया है।
पांच साल पहले ऐसा नहीं था। उधर, कांग्रेस अब एंटी इनकंबेसी फैक्टर से ही जूझ रही है। दूसरी तरफ विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल इनेलो अब भी असरदार है, लेकिन उसे चुनाव मैदान में ओम प्रकाश चौटाला का सीधा नेतृत्व नहीं मिल पाने की कमी महसूस हो रही है।
चौथे नंबर पर थी, अब बन चुकी है सबसे बड़ी
हाल के लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 10 में से सात सीटें जीतने के बाद भाजपा अब एक बड़ी ताकत बनकर मैदान में है। चुनाव में 34.70 फीसदी वोट पाकर भाजपा ने कांग्रेस को भी दूसरे स्थान पर धकेल दिया।
प्रदेश विधानसभा की 90 में से 53 विधानसभा सीटों पर भाजपा को बढ़त मिली थी। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को मात्र 9.05 फीसदी वोट मिले और उसकी झोली में मात्र चार सीटें आईं थीं। जबकि हरियाणा जनहित कांग्रेस 7.41 फीसदी वोट के साथ छह सीटें पाने में सफल रही थी।
यह अलग बात है कि हजकां के ज्यादातर विधायक बाद में कांग्रेस के पाले में चले गए। खास बात यह है कि उसके बाद भाजपा-हजकां गठबंधन करके पीछे-पीछे चलने को तैयार थी, लेकिन अब वह हजकां को पीछे-पीछे चलने को कह रही है।
बदल गये सियासत के खिलाड़ी
मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ही अकेले ऐसे नेता हैं जो चुनाव में कांग्रेस की कमान थाम रहे हैं, जबकि भाजपा की चुनावी रणनीति को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह खुद संभाल रहे है। इधर, चौधरी बीरेंद्र सिंह के भाजपा में आ जाने से समुदाय विशेष पर पार्टी की पकड़ बढ़ी है।
उधर, इनेलो की चुनावी कमान भी ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के बजाय अभय चौटाला के हाथ है। बीते विधानसभा चुनाव में हजकां की कमान पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी भजनलाल के हाथ में थीं।
इस बार कुलदीप विश्नोई हजकां की कमान थामकर चुनावी मैदान में दमदार मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। बीते लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद हरियाणा जनहित कांग्रेस पहले जैसी दमदार नहीं दिख रही है।
राज्य गठन के समय थीं मात्र 81 सीटें
पंजाब से अलग होने के बाद गठित विधानसभा में मात्र 81 सीटें थी। इनमें से 15 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थीं। 21 फीसदी मतदाता बढ़े हैं। 1967 में तक विधानसभा में कांग्रेस के 48 और भारतीय जनसंघ के 12 विधायक थे। जनसंघ तक सदन में प्रमुख विपक्षी पार्टी थीं।
2009 के विधानसभा चुनाव में दलों की स्थिति
पार्टी---------सीटें जीतीं------वोट(फीसदी)-----लोकसभा चुनाव 2014 में वोट
कांग्रेस----------40-----------35.11-------------22.90
इनेलो-----------31----------25.81--------------24.40
हजकां----------06-----------7.81---------------6.10
भाजपा----------04-----------9.05--------------34.70