फिर हरा भरा होगा पेड़ों का कब्रिस्तान: गंदा पानी हटाया, मिट्टी बदली; जंगल को फिर से जीवन देने की कोशिश
वर्ष 2009 के बाद कांसल में बड़े स्तर पर निर्माण हुआ है। कई सोसाइटियां बस गई हैं लेकिन बिल्डर्स ने सीवरेज की उचित व्यवस्था नहीं की। न सरकार ने कोई एसटीपी बनाया। सीवरेज का पानी चंडीगढ़ के जंगल में जाने लगा। ये कई साल तक चलता रहा, जिसकी वजह से कई एकड़ में लगे पेड़ सूख गए,जो एक-एक करके गिर रहे थे।
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चंडीगढ़ में रॉक गार्डन के पीछे फैले उस जंगल को फिर से हरा-भरा बनाने की कोशिश शुरू हो गई है, जिसे वर्षों से पंजाब से आ रहे सीवरेज ने पेड़ों का कब्रिस्तान बना दिया था।
अमर उजाला ने 20 जनवरी के अंक में “पेड़ों का कब्रिस्तान” शीर्षक से इस गंभीर मुद्दे को उठाया था। तब से वहां लगातार काम हो रहा है। पहले नगर निगम ने नई सीवरेज लाइन डालकर पंप के जरिए गंदा पानी बाहर निकाला। अब मिट्टी बदली जा रही है और जंगल को फिर से जीवन देने की तैयारी जोरों पर है।
वर्षों से रॉक गार्डन के पीछे फैले जंगल में पंजाब के हिस्से से आने वाला गंदा सीवरेज का पानी जमा हो रहा था, जिससे कई पुराने पेड़ सूखकर मर गए। इस मामले को गंभीरता से उठाने के बाद यूटी प्रशासन के पर्यावरण विभाग ने पंजाब के अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित किया।
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समस्या के समाधान के लिए एक समग्र कार्य योजना बनाई गई। सबसे बड़ी काम वर्षों से खड़े सीवरेज और कैमिकल युक्त पानी को बाहर निकालना था। इसके लिए वन विभाग ने नगर निगम से संपर्क किया। निगम ने एक नई सीवरेज लाइन डाली और पंप लगाकर गंदा पानी बाहर निकाला गया, जिसे ट्रीटमेंट के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट(एसटीपी) में भेजा गया।
जंगल के अंदर जो थोड़ा पानी रहा गया था, उसे सुखाया गया। वहां की मिट्टी को भी बदला जा रहा है। चूंकि यह इलाका लो-लाइन में आता है, इसलिए वहां भराव करके जमीन को ऊंचा किया जा रहा है ताकि बारिश में दोबारा पानी जमा न हो।
18.5 केएलडी का एसटीपी बना रहा पंजाब
वर्ष 2009 के बाद कांसल में बड़े स्तर पर निर्माण हुआ है। सीवरेज का पानी चंडीगढ़ के जंगल में जाने लगा। प्रशासन ने गंभीर आपत्ति दर्ज कराई तो अब जंगल को बचाने के लिए पंजाब के कांसल क्षेत्र में 18.5 केएलडी क्षमता का एक आधुनिक एसटीपी बनाया जा रहा है, जिसकी समय सीमा फरवरी 2026 तय की गई है। इसका उद्देश्य है कि भविष्य में सीवरेज पानी जंगल तक न पहुंचे।
लगाए जाएंगे आम, जामुन, नीम, पीपल, बांस के पौधे
डेढ़ से 2 साल में जंगल को दोबारा से हरा भरा करने की कोशिश है। वहां पर आम, जामुन, नीम, पीपल, बांस आदि के कई पेड़ लगाए जाएंगे। इसके लिए विभाग ने योजना बनाई कि जैसे ही मिट्टी भरने का काम पूरा हो जाएगा वहां पर 7 से 8 फीट के पौधे लगाए जाएंगे, जो विभाग ने पहले ही तैयार कर लिए हैं। इसके अलावा आने वाले दिनों में जब बारिश होगी तो पंजाब का पानी दोबारा इस जंगल में न आए इसके लिए भी व्यवस्था की जा रही है।
मरे पेड़ भी कर सकते हैं वापसीः आईएफएस सौरभ कुमार
पर्यावरण विभाग के निदेशक आईएफएस सौरभ कुमार ने बताया कि पेड़ों में अद्भुत क्षमता होती है। यदि उन्हें सही मिट्टी, नमी और पोषण मिले तो वे दोबारा हरे-भरे हो सकते हैं। इसी उद्देश्य से वहां की मिट्टी को पोषक बनाया जा रहा है और पुराने पेड़ों की जड़ों को संजीवनी देने की कोशिश हो रही है। विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले तीन वर्षों में जंगल अपने पुराने स्वरूप में लौट आए। इस दिशा में बीते कई महीनों से युद्धस्तर पर काम हो रहा है। आने वाले मानसून में पौधों को प्राकृतिक सिंचाई भी मिलेगी, जिससे पुनरुद्धार की प्रक्रिया और तेज होगी।