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पंजाब यूनिवर्सिटी चुनाव में एबीवीपी ने छोड़ी छाप, वोट ग्राफ पहुंचा दो हजार के पार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ
Updated Sat, 08 Sep 2018 03:39 PM IST
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पंजाब विश्वविद्यालय छात्र काउंसिल चुनाव में एसएफएस की तरह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का वोटों का ग्राफ हर साल बढ़ रहा है। इस चुनाव में एबीवीपी ने फर्स्ट रनरअप रहते हुए एसएफएस को टक्कर दी है। साल 2014 में एबीवीपी के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को मात्र 360 वोट पड़े थे। जबकि उस समय एनएसयूआई का अध्यक्ष बना था, लेकिन उसके बाद एबीवीपी के नेताओं ने काफी मेहनत की।
उसके बाद वोट का ग्राफ बढ़ता चला गया हालांकि साल 2014 में ही केंद्र में मोदी सरकार बनी थी। जब से छात्र काउंसिल के चुनाव हो रहे है तब से लेकर अब तक कभी भी एबीवीपी का अध्यक्ष नहीं बना है। इस साल के चुनाव में पहली बार हुआ है जब एबीवीपी दूसरे नंबर पर रही है ऐसे में एसएफएस की नजर भी आगे एबीवीपी के वोट बैंक पर रहेगी और एबीवीपी भी आगे की रणनीति ऐसी बनाएगी कि जिससे एसएफएस के वोट बैंक पर सेंधमारी की जा सके।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को पिछले के चुनाव में 1522 वोट अध्यक्ष पद पर पड़े थे। जबकि साल 2015 और 2016 में एबीवीपी ने गठबंधन करते हुए उपाध्यक्ष और सचिव के पद पर चुनाव लड़ा। लेकिन सीट जीत नहीं पाए, लेकिन साल 2015 से एबीवीपी ने यह एजेंडा तय किया है कि अब वह अध्यक्ष पद पर ही हमेशा चुनाव लड़ेंगे और वही दल उनके साथ गठबंधन करे जो नीचे के पद पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो।
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इस साल के चुनाव में एबीवीपी ने एसओई के समक्ष गठबंधन का आफर रखा था लेकिन एसओआई अध्यक्ष पद एबीवीपी को देने के लिए राजी नहीं थी। एसओआई अकाली दल का स्टूडेंट विंग है। अगर इन दोनों का गठबंधन हो जाता तो चुनाव परिणाम कुछ और ही होता।
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उसके बाद वोट का ग्राफ बढ़ता चला गया हालांकि साल 2014 में ही केंद्र में मोदी सरकार बनी थी। जब से छात्र काउंसिल के चुनाव हो रहे है तब से लेकर अब तक कभी भी एबीवीपी का अध्यक्ष नहीं बना है। इस साल के चुनाव में पहली बार हुआ है जब एबीवीपी दूसरे नंबर पर रही है ऐसे में एसएफएस की नजर भी आगे एबीवीपी के वोट बैंक पर रहेगी और एबीवीपी भी आगे की रणनीति ऐसी बनाएगी कि जिससे एसएफएस के वोट बैंक पर सेंधमारी की जा सके।
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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को पिछले के चुनाव में 1522 वोट अध्यक्ष पद पर पड़े थे। जबकि साल 2015 और 2016 में एबीवीपी ने गठबंधन करते हुए उपाध्यक्ष और सचिव के पद पर चुनाव लड़ा। लेकिन सीट जीत नहीं पाए, लेकिन साल 2015 से एबीवीपी ने यह एजेंडा तय किया है कि अब वह अध्यक्ष पद पर ही हमेशा चुनाव लड़ेंगे और वही दल उनके साथ गठबंधन करे जो नीचे के पद पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो।
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इस साल के चुनाव में एबीवीपी ने एसओई के समक्ष गठबंधन का आफर रखा था लेकिन एसओआई अध्यक्ष पद एबीवीपी को देने के लिए राजी नहीं थी। एसओआई अकाली दल का स्टूडेंट विंग है। अगर इन दोनों का गठबंधन हो जाता तो चुनाव परिणाम कुछ और ही होता।
एनएसयूआई एबीवीपी पर भारी रहती रही है
NOTA in PU Election
- फोटो : अमर उजाला
राष्ट्रीय स्तर पर एबीवीपी का मुख्य मुकाबला कांग्रेस की स्टूडेंट विंग एनएसयूआई के साथ रहता है। पिछले साला का आंकड़ा देखे तो एनएसयूआई हमेशा ही एबीवीपी पर काफी हावी रही है। साल 2014 से लेकर अब तक एनएसयूआई तीन बार अपना अध्यक्ष भी बनवा चुकी है। लेकिन इस साल के चुनाव में पहली बार हुआ है जब एबीवीपी ने दूसरे नंबर पर रहकर एनएसयूआई को पछाड़ा है। इस चुनाव में एनएसयूआई का वोट बैंक का ग्राफ काफी गिरा है। अध्यक्ष पद पर एनएसयूआई चौथे नंबर पर रही है।
एबीवीपी के नेता यह भी मंथन कर रहे है कि अगर इस साल के चुनाव में एनएसयूआई की हालत इतनी ज्यादा खस्ता न होती और वह 400 वोट और ले जाती तो एबीवीपी की जीत तय थी। इस साल के चुनाव में पंजाब और चंडीगढ़ के संगठन मंत्री दिनेश कुमार ने एबीवीपी के नेताओं को प्रचार के टिप्स दिए।
मोदगिल भी रह चुके हैं काउंसिल के पदाधिकारी
इस समय नगर निगम के मेयर देवेश मोदगिल भी साल 2000 से पहले छात्र काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं। मोदगिल काउंसिल के सह सचिव रह चुके हैं। मोदगिल ने राजनीति की शुरुआत एबीवीपी से की है। मोदगिल का कहना है कि उन्हें खुशी है कि एबीवीपी ने इस चुनाव में काफी अच्छा प्रदर्शन किया।
यह एबीवीपी के हर कार्यकर्ता की मेहनत का नतीजा है जो हम यहां तक पहुंचे हैं। हम राष्ट्रवादी विचाराधारा को लेकर छात्रों के बीच गए और उनके कैंपस के मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर क्लास रूम से सड़क तक संघर्ष किया। कैंपस इस समय लाल जरूर हुआ है लेकिन फिर भी माओवाद और नक्सलवाद का ठिकाना नहीं बनने देंगे। राष्ट्रवादी विषयों पर कोई समझौता नहीं होगा और सारा साल काम करते हुए अगले साल एबीवीपी की जीत तय करेंगे। हरमन जोत सिंह गिल, सदस्य, सेंट्रल कमेटी, एबीवीपी
एबीवीपी के नेता यह भी मंथन कर रहे है कि अगर इस साल के चुनाव में एनएसयूआई की हालत इतनी ज्यादा खस्ता न होती और वह 400 वोट और ले जाती तो एबीवीपी की जीत तय थी। इस साल के चुनाव में पंजाब और चंडीगढ़ के संगठन मंत्री दिनेश कुमार ने एबीवीपी के नेताओं को प्रचार के टिप्स दिए।
मोदगिल भी रह चुके हैं काउंसिल के पदाधिकारी
इस समय नगर निगम के मेयर देवेश मोदगिल भी साल 2000 से पहले छात्र काउंसिल का चुनाव लड़ चुके हैं। मोदगिल काउंसिल के सह सचिव रह चुके हैं। मोदगिल ने राजनीति की शुरुआत एबीवीपी से की है। मोदगिल का कहना है कि उन्हें खुशी है कि एबीवीपी ने इस चुनाव में काफी अच्छा प्रदर्शन किया।
यह एबीवीपी के हर कार्यकर्ता की मेहनत का नतीजा है जो हम यहां तक पहुंचे हैं। हम राष्ट्रवादी विचाराधारा को लेकर छात्रों के बीच गए और उनके कैंपस के मुद्दों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर क्लास रूम से सड़क तक संघर्ष किया। कैंपस इस समय लाल जरूर हुआ है लेकिन फिर भी माओवाद और नक्सलवाद का ठिकाना नहीं बनने देंगे। राष्ट्रवादी विषयों पर कोई समझौता नहीं होगा और सारा साल काम करते हुए अगले साल एबीवीपी की जीत तय करेंगे। हरमन जोत सिंह गिल, सदस्य, सेंट्रल कमेटी, एबीवीपी