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कुछ कर गुजरने की जिद में डॉक्टर्स ने कर दिखाया वो, जानकर सब हैरान
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 13 Aug 2016 09:57 PM IST
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कुछ कर गुजरने की जिद हो तो इंसान मुश्किल से मुश्किल मुकाम हासिल का सकता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया जीएमसीएच 32 के डॉक्टर्स ने। चंडीगढ़ जीएमसीएच-32 में एक महिला मरीज के दिल के चार सेंटीमीटर के छेद को बिना ओपन हार्ट सर्जरी बंद किया गया। ऐसा पहली बार है, जब इस अस्पताल में इतने बड़े छेद को बिना चीड़-फाड़ बंद किया गया हो। छेद बंद करने के लिए परक्यूटेनियस डिवाइस क्लोजर विधि का इस्तेमाल किया गया।
इसमें साधारण सुई के जरिए दिल की दाहिनी नस को पहले पंक्चर किया गया। उसके बाद सुई को बाहर निकालकर उसमें एक शीट लगाकर छाते के आकार की डिवाइस को छेद में फिट कर दिया गया। मरीज को तीन दिन बाद छुट्टी भी दे दी गई। चार सेंटीमीटर की डिवाइस डालने की उपलब्धि हासिल करने वाले कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जीत राम कश्यप ने बताया कि जीएमसीएच-32 में आने से पहले मरीज ने कई जगह डॉक्टरों को दिखाया तो हर जगह उसे ऑपरेशन की सलाह दी गई।
ऑपरेशन की दी थी सलाह
जब मरीज यहां पहुंची तो डॉ. कश्यप ने भी उसे ऑपरेशन का ही विकल्प सुझाया, लेकिन महिला ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं थी। उसने इलाज का कोई दूसरा रास्ता निकालने की गुजारिश की। डॉक्टर ने उसे समझाया कि यह काम काफी मुश्किल है, लेकिन मरीज की जिद ने उन्हें कुछ नया करने पर मजबूर किया।
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चुनौती भरा था यह काम
डॉ. जीत राम कश्यप के मुताबिक डिवाइस तो पहले भी डाली गई थी। करीब 2.8 सेंटीमीटर या फिर ज्यादा से ज्यादा तीन सेंटीमीटर की, लेकिन चार सेंटीमीटर की डिवाइस पहले कभी नहीं डाली गई। यह काम काफी मुश्किल और चुनौती भरा था, लेकिन टीम और तकनीक की मदद से इस काम को अंजाम दे दिया गया। देश के कुछ चुनिंदा अस्पतालों में ही चार सेमी की डिवाइस डाली जाती है। अब उस श्रेणी में चंडीगढ़ का जीएमसीएच-32 भी शामिल हो गया है।
वरना करनी पड़ती ओपन हार्ट सर्जरी
यदि डिवाइस नहीं डाली जाती तो छेद को बंद करने के लिए ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ती। इसमें दोनों तरफ सर्जरी कर पेच लगाना पड़ता। महिला के हार्ट वाले ऊपरी हिस्से में छेद था। छेद बंद नहीं होने से फेफड़ों की नालियों में दबाव बन रहा था। यदि समय पर इसका इलाज नहीं किया जाता तो मरीज की जान पर बन सकती थी।
महिला के दिल में जन्म से ही छेद था। आमतौर पर इतनी बड़ी डिवाइस डालने के लिए सर्जन मना कर देते हैं, लेकिन जीएमसीएच-32 की टीम ने यह सफलता भी हासिल कर ली है।
-डॉ. जीत राम कश्यप, एसोसिएट प्रोफेसर जीएमसीएच-32
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इसमें साधारण सुई के जरिए दिल की दाहिनी नस को पहले पंक्चर किया गया। उसके बाद सुई को बाहर निकालकर उसमें एक शीट लगाकर छाते के आकार की डिवाइस को छेद में फिट कर दिया गया। मरीज को तीन दिन बाद छुट्टी भी दे दी गई। चार सेंटीमीटर की डिवाइस डालने की उपलब्धि हासिल करने वाले कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जीत राम कश्यप ने बताया कि जीएमसीएच-32 में आने से पहले मरीज ने कई जगह डॉक्टरों को दिखाया तो हर जगह उसे ऑपरेशन की सलाह दी गई।
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ऑपरेशन की दी थी सलाह
जब मरीज यहां पहुंची तो डॉ. कश्यप ने भी उसे ऑपरेशन का ही विकल्प सुझाया, लेकिन महिला ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं थी। उसने इलाज का कोई दूसरा रास्ता निकालने की गुजारिश की। डॉक्टर ने उसे समझाया कि यह काम काफी मुश्किल है, लेकिन मरीज की जिद ने उन्हें कुछ नया करने पर मजबूर किया।
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चुनौती भरा था यह काम
डॉ. जीत राम कश्यप के मुताबिक डिवाइस तो पहले भी डाली गई थी। करीब 2.8 सेंटीमीटर या फिर ज्यादा से ज्यादा तीन सेंटीमीटर की, लेकिन चार सेंटीमीटर की डिवाइस पहले कभी नहीं डाली गई। यह काम काफी मुश्किल और चुनौती भरा था, लेकिन टीम और तकनीक की मदद से इस काम को अंजाम दे दिया गया। देश के कुछ चुनिंदा अस्पतालों में ही चार सेमी की डिवाइस डाली जाती है। अब उस श्रेणी में चंडीगढ़ का जीएमसीएच-32 भी शामिल हो गया है।
वरना करनी पड़ती ओपन हार्ट सर्जरी
यदि डिवाइस नहीं डाली जाती तो छेद को बंद करने के लिए ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ती। इसमें दोनों तरफ सर्जरी कर पेच लगाना पड़ता। महिला के हार्ट वाले ऊपरी हिस्से में छेद था। छेद बंद नहीं होने से फेफड़ों की नालियों में दबाव बन रहा था। यदि समय पर इसका इलाज नहीं किया जाता तो मरीज की जान पर बन सकती थी।
महिला के दिल में जन्म से ही छेद था। आमतौर पर इतनी बड़ी डिवाइस डालने के लिए सर्जन मना कर देते हैं, लेकिन जीएमसीएच-32 की टीम ने यह सफलता भी हासिल कर ली है।
-डॉ. जीत राम कश्यप, एसोसिएट प्रोफेसर जीएमसीएच-32