PGI Chandigarh: संभलकर पीजीआई में कराएं इलाज, दलाल निकाल रहे खून
पीजीआई में रोजाना 10-12 हजार मरीज ओपीडी में इलाज कराने आते हैं। उन मरीजों में से ज्यादातर को कई चीजों की जानकारी ही नहीं होती। खून देने वाले एक मरीज से जब पूछा गया कि किसने कहने पर नमूने दे रहे हैं तो उसने झट से एक डॉक्टर का हवाला दे दिया।
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स्थान- पीजीआई न्यू ओपीडी की पार्किंग, दिन- सोमवार और समय- दोपहर 12:10 बजे का। एक पेड़ के नीचे कुछ लोग मरीजों के खून का नमूना ले रहे थे। उनके पास ही खड़ी एक कार में पैथालॉजी से जुड़े उपकरण रखे थे। दो व्यक्ति एक के बाद एक मरीज के खून का नमूना लेने में लगे थे। तीसरा व्यक्ति फोन पर बात कर रहा था। खुले में मरीजों के खून निकालने के बारे में पूछने जाने पर बताया कि पीजीआई प्रशासन ने अनुमति दी है।
एक डॉक्टर के कहने पर मरीजों का खून ले रहे हैं। पीजीआई ने बकायदा उन्हें टेंडर दिया है। नमूना लेने के बाद वे मरीजों से भारी भरकम जांच फीस भी ले रहे थे। बता दें कि पीजीआई परिसर में कुछ दिनों पहले पुलिस फर्जी लैब के दो कर्मचारियों को पकड़ चुकी है। उधर, पीजीआई प्रशासन का कहना है कि मामले की जानकारी लेकर उचित कदम उठाए जाएंगे।
ज्यादातर मरीजों को कई जानकारियां नहीं
पीजीआई में रोजाना 10-12 हजार मरीज ओपीडी में इलाज कराने आते हैं। उन मरीजों में से ज्यादातर को कई चीजों की जानकारी ही नहीं होती। खून देने वाले एक मरीज से जब पूछा गया कि किसने कहने पर नमूने दे रहे हैं तो उसने झट से एक डॉक्टर का हवाला दे दिया।
यूनियन ने कहा- स्थिति स्पष्ट करें निदेशक
पीजीआई कर्मचारी संघ गैर संकाय के महासचिव अश्वनी कुमार मुंजाल ने कहा कि इस बारे में निदेशक प्रो. विवेक लाल से स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। नमूना लेने वालों का दावा है कि उन्हें पीजीआई प्रशासन ने अनुमति दी है। इससे पहले भी पीजीआई प्रशासन को चेताया जा चुका है। इसके बाद ही पुलिस ने परिसर में फर्जी लैब के दो कर्मचारियों को पकड़ा था। पीजीआई प्रशासन को इस पर गंभीरता दिखानी चाहिए।
फर्जी लैब वाले अब भी जेल में
पीजीआई में 10 जून को पकड़े गए फर्जी लैब के दो कर्मचारी अभी भी जेल में हैं। एक हफ्ते पहले उनके खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है। उनकी जमानत याचिका खारिज हो चुकी है। बता दें कि अमर उजाला में 6 जून के अंक में पीजीआई ओपीडी में दलालों का कब्जा, सीबीआई व विजिलेंस से जांच की मांग शीर्षक से खबर प्रकाशित हुई थी। इसके बाद प्रबंधन हरकत में आया और न्यू ओपीडी में एमआर के आने पर रोक लगा दी। यह खबर भी अमर उजाला ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। इसके बाद पुलिस ने गतिविधि बढ़ाई और कार्रवाई की।
चौंकाने वाले खुलासे हुए थे
पुलिस पूछताछ में आरोपियों ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए थे। आरोपियों ने पीजीआई के स्टाफ को अपना सहयोगी बताया था। आरोपियों ने बताया कि पिछले 10 साल से फर्जी रिपोर्ट बना रहे थे। पुलिस के मुताबिक रबर स्टैंप और ब्लड रिपोर्ट जिस लैब की थी, वह अस्तित्व में ही नहीं थी। दस्तावेज भी फर्जी थे।
आरोपियों की पहचान मुल्लांपुर स्थित न्यू चंडीगढ़ के सेक्टर-6 निवासी नेमी चंद उर्फ राहुल (32) और नयागांव के दशमेश नगर निवासी सुनील कुमार (40) के रूप में हुई थी। पुलिस के अनुसार आरोपी गाड़ी लेकर पीजीआई परिसर के आसपास घूमते रहते थे। आरोपियों ने बताया कि पीजीआई का स्टाफ उन्हें अंदर बुला लेता था। इसके बाद मरीजों का नमूना लेकर आरोपी उन्हें फर्जी रिपोर्ट बनाकर दे देते थे। इसमें काफी महंगी जांचें होती थीं। इसके एवज में आरोपी पीजीआई के स्टाफ को कमीशन भी देते थे।
स्थिति अजीब हो चुकी है। किस पर भरोसा किया जाए यह समझ नहीं आ रहा। आखिर डॉक्टर मरीजों को दलालों के पास क्यों भेज रहे हैं। इस मामले में पीजीआई प्रशासन को कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। -विमल कुमार, बहलाना
एक के बाद एक ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। उसके बावजूद पीजीआई प्रशासन क्यों अनदेखी कर रहा है, यह बड़ा सवाल है। अगर यही हाल रहा तो पीजीआई जैसे संस्थान से भी मरीजों का भरोसा उठ जाएगा। - धनंजय पांडेय, रायपुर खुर्द
पीजीआई परिसर में किसी बाहरी व्यक्ति के खून का नमूना लेने के मामले की जानकारी लेकर उचित कदम उठाया जाएगा। -कुमार गौरव, डीडीए व प्रवक्ता पीजीआई