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Chandigarh News: रेयर डिजीज से बच्चे को बचाने के लिए गर्भावस्था के दौरान कराए जेनेटिक टेस्ट

Thu, 29 Feb 2024 03:05 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 29 Feb 2024 03:05 AM IST
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Get genetic tests done during pregnancy to protect your child from rare diseases.
चंडीगढ़। रेयर डिजीज के अंतर्गत होने वाली बीमारियों से ग्रस्त मरीज का पूरा जीवन प्रभावित हो जाता है। इसमें कई बीमारियां ऐसी हैं जिसमें लक्षणों के सामने न आने से उसके बचाव संबंधी उपाय भी नहीं हो पाते। अब तक यह बात सामने आई है कि ज्यादातर रेयर डिजीज आनुवांशिक होती है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ट्रांसफर होती रहती है। ऐसी स्थिति में जिनके परिवार में रेयर डिजीज के मरीज हो, उसमें महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान विशेष रूप से सचेत रहने की जरूरत है। क्योंकि सावधानी न बरतने के कारण उनका बच्चा भी किसी गंभीर रेयर डिजीज का शिकार हो सकता है। इन सब के बीच राहत की बात यह है कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति के कारण मौजूदा समय में ऐसे कई महत्वपूर्ण जांच उपलब्ध है, जिसके बल पर गर्भ में पल रहे बच्चे में रेयर डिजीज की आशंका को पहले से जाना जा सकता है। रेयर डिजीज से बच्चे को बचाने के लिए गर्भावस्था के दौरान जेनेटिक टेस्ट कराना चाहिए। इससे बच्चे का जीवन सुरक्षित किया जा सकता है। यह कहना है मेडिकल जेनेटिक्स विशेषज्ञ डॉ. साक्षी का। उन्होंने रेयर डिजीज डे पर इससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा कीं।
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डॉ. साक्षी ने बताया कि हर साल फरवरी के लास्ट डेट को रेयर डिजीज डे के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने का उद्देश्य लोगों को दुर्लभ बीमारियों के प्रति जागरूक करना है। रेयर डिजीज डे की स्थापना साल 2008 में यूरोपीय संघ द्वारा की गई थी। दुर्लभ रोगों की असल वजह आनुवांशिक मानी जाती है। वहीं, कुछ मामलों में बैक्टीरिया, वायरस, इंफेक्शन और एलर्जी इसके कारणों में से एक हैं। हालांकि आंकड़ों की मानें तो 50 प्रतिशत दुर्लभ रोग के मामले बच्चों में देखे गए हैं।
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डॉ. साक्षी ने का कहना है कि हर व्यक्ति को एक जैसे लक्षण नजर नहीं आते। यही कारण होता है कि इन रोगों का पता लगाने में देर हो जाती है और बाद में इलाज करवाने में दिक्कत महसूस होती है। रेयर डिजीज व्यक्ति का पूरा जीवन प्रभावित कर सकते हैं। ये रोग न केवल व्यक्ति की क्षमता को खत्म कर सकते हैं बल्कि उसके लिए जानलेवा भी साबित हो सकते है। दुर्लभ रोगों के उदाहरण की बात की जाए तो सिस्टिक फाइब्रोसिस एक ऐसी बीमारी है जो सांस या पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकती है। इससे अलग अन्य बीमारियों में मस्कुलर डिस्ट्रॉफी आदि शामिल हैं।
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7,000 से अधिक बीमारियां
रेयर डिजीज में विभिन्न प्रकार के दुर्लभ और आनुवंशिक रोग हैं। इसने कैंसर और एड्स से अधिक लोगों को प्रभावित किया है और इनमें से अधिकतर का प्रसार तेज होता है, इनसे जीवन को भी खतरा होता। इन दुर्लभ बीमारियों में से 80 प्रतिशत में आनुवंशिक उत्पत्ति होती है। 7000 दुर्लभ बीमारियों में से केवल 5 प्रतिशत का ही उपचार संभव है।
सरकारी मदद का इंतजार
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित रोगियों को दो तरह की सेवा दी जा रही है। एक राष्ट्रीय नीति 2021 के तहत इन्हें 20 लाख रुपये तक की मदद की जा रही है और दूसरी सेवा क्राउडफंडिंग से जुड़ी है जिसके लिए मंत्रालय के अधीन एक ऑनलाइन प्लेटफार्म बीते वर्ष शुरू किया था। इसी के तहत देश के 10 अलग-अलग अस्पतालों में पंजीकृत कुल 429 दुर्लभ बीमारियों से ग्रस्त बच्चों के उपचार में 80 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होना है। अब तक 250 दाताओं की ओर से कुल 213,008 रुपये की राशि एकत्रित हुई है। हालांकि आंकड़े देखें जाएं तो प्राप्त राशि अस्पतालों से दिए गए कुल खर्च की तुलना में एक मरीज की उपचार राशि के बराबर भी नहीं है।

दुर्लभ बीमारियों की विशेषताएं
आधे से अधिक दुर्लभ बीमारियां बच्चों में होती हैं
कई दुर्लभ बीमारियां जानलेवा होती हैं
ऐसी बीमारियों का निदान और उपचार बहुत दुर्लभ है
अधिकांश दुर्लभ बीमारियां घातक होती हैं, विशेषकर बच्चों में।

ये हैं मुख्य बीमारियां
सबसे आम बीमारियों में हेमोफिलिया, थैलेसीमिया, सिकल-सेल एनीमिया और बच्चों में प्राइमरी इम्यूनो डेफिशिएंसी, ऑटो-इम्यून रोग और लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर शामिल हैं। दुर्लभ बीमारियों की व्यापकता को देखते हुए कि उनके उपचार पर शोध जारी है। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि हर मां प्रारंभिक अवस्था में आनुवांशिक जांच से गुजरे। बच्चे के जन्म के बाद किसी भी आनुवांशिक विश्लेषण को अब गर्भावस्था के शुरुआती तिमाही में भ्रूण में ही किया जा सकता है।

ये हैं मुख्य जांच
कुछ प्रमुख तकनीकों में अल्ट्रासोनोग्राफी और मैटरनल सीरम स्क्रीनय सेलेक्ट ट्राइसॉमी या नॉन इनवेसिव प्रीनेटल परीक्षण और एनआईपीटी के लिए रक्त परीक्षण शामिल हैं। एनआईपीटी पहले से ही एक अत्यधिक लोकप्रिय तकनीक के रूप में उभर रहा है क्योंकि यह अधिक सुरक्षित, तेज और साथ ही अधिक विश्वसनीय भी है। देश में प्रमुख आईवीएफ केंद्रों में प्री. इम्प्लांट जेनेटिक डायग्नोसिस, पीजीडी जैसे अन्य नॉन इनवेसिव प्रीनेटल परीक्षण विधियों को भी शामिल किया गया है। वे आईवीएफ से पहले मानव भ्रूण से कोशिकाओं के नमूने लेने में मदद करती हैं। एक और परीक्षण जो कि चर्चा में है, उसे अल्ट्रासाउंड डिटेक्शन कहा जाता है। गर्भावस्था के पहले और दूसरे चरण में यह विधि डाउन सिंड्रोम के उच्च जोखिमों की पहचान करने में मदद करती है। कपल कॅरिअर स्क्रीनिंग से भी इसकी जानकारी प्राप्त हो सकती है।
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