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दासी से बोलीं गांधारी- वो देखने में कैसे हैं...
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टैगोर थिएटर में नाटक शापित गंधार का मंचन करते कलाकार।
- फोटो : CHANDIGARH
चंडीगढ़। गांधारी को हस्तिनापुर लाया गया है। उनका विवाह धृतराष्ट्र से होना है। इसके बाद वह अपने होने वाले पति के बारे में दासी से पूछती है। वो देखने में कैसे हैं। इस पर दासी गांधारी से कहती है कि यदि साहस है तो सुनिए... इतने में शकुनि का आगमन होता है और बोलते हैं धृतराष्ट्र दृष्टिहीन हैं। यह सुनकर गांधारी अपने भाई को कहती हैं कि तुम सत्य बोल रहे हो न शकुनि। उत्तर मिलता है सत्य बोल रहा हूं। इसके बाद गांधारी दुपट्टे को फाड़कर आंखों पर पट्टी बांध लेती हैं।
यह संवाद महाभारत पर आधारित नाटक ‘अभिशप्त गांधार’ का है। इसका मंचन सेक्टर-18 के टैगोर थिएटर के मिनी ऑडिटोरियम में हुआ। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला के निदेशक फुरकान खान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। नाटक के लेखक डॉ. शंकर शेष हैं। इसके माध्यम से महिला सशक्तिकरण, सत्ता और राजनीति का दुरुपयोग करने जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
नाटक में शकुनि को गांधारी कहती है कि तुम गांधार कब लौटोगे। इस पर शकुनि कहते हैं कि मैं हजारों लोगों के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता। मुझे यहीं हस्तिनापुर में पड़े रहने दो। गांधारी का यह कहना कि तुम यहां हस्तिनापुर में रह कर करोगे क्या। शकुनि का जवाब कि तुम्हारे हितों की रक्षा। तुम्हारे होने वाले संतानों की पहरेदारी। आखिर कोई हो जो तुम्हारे लिए लड़ सके। इसके बाद गांधारी कहती है कि लोग यह सोचेंगे कि अपने भाई को गांधारी ने रोक लिया। इस पर कहते हैं कि लोगों को कहने दो।
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गांधारी ने कृष्ण को दिया पुत्र वियोग में तड़पने का श्राप
गांधारी के सौ के सौ पुत्र मृत्यु को वरण हो जाते हैं। अंत में जब कृष्ण गांधारी को मिलने आते हैं तो गांधारी कृष्ण से कहती है कि तुम इस युद्ध को रोक सकते थे। कृष्ण कहते हैं कि मैंने दुर्योधन को बहुत समझाया लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी। गांधारी कहती है कि यह सब तुम्हारा ही षड्यंत्र है। कृष्ण को श्राप देती है कि तुम्हारा वंश भी ऐसे ही पुत्र वियोग में तड़फे जिस तरह मैं तड़फ रही हूं।
इन्होंने निभाई भूमिका
श्री कृष्ण की भूमिका में मयंक सिंह, गांधारी की भूमिका में शुभ्रा सिंह रही जबकि संजय कश्यप ने धृतराष्ट्र, गौरी ने दासी, ज्योति शर्मा ने भीष्म, वेद प्रकाश ने शकुनि, हर्ष ने दुर्योधन, सागर चुघ ने संजय, शीतल ने द्रौपदी, विकास नेगी ने सैनिक की भूमिका निभाई। वेशभूषा अनुष्का तिवारी और किरण की रही जबकि संगीत चिरायु भारद्वाज ने दिया।
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यह संवाद महाभारत पर आधारित नाटक ‘अभिशप्त गांधार’ का है। इसका मंचन सेक्टर-18 के टैगोर थिएटर के मिनी ऑडिटोरियम में हुआ। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला के निदेशक फुरकान खान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। नाटक के लेखक डॉ. शंकर शेष हैं। इसके माध्यम से महिला सशक्तिकरण, सत्ता और राजनीति का दुरुपयोग करने जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
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नाटक में शकुनि को गांधारी कहती है कि तुम गांधार कब लौटोगे। इस पर शकुनि कहते हैं कि मैं हजारों लोगों के प्रश्नों के उत्तर नहीं दे सकता। मुझे यहीं हस्तिनापुर में पड़े रहने दो। गांधारी का यह कहना कि तुम यहां हस्तिनापुर में रह कर करोगे क्या। शकुनि का जवाब कि तुम्हारे हितों की रक्षा। तुम्हारे होने वाले संतानों की पहरेदारी। आखिर कोई हो जो तुम्हारे लिए लड़ सके। इसके बाद गांधारी कहती है कि लोग यह सोचेंगे कि अपने भाई को गांधारी ने रोक लिया। इस पर कहते हैं कि लोगों को कहने दो।
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गांधारी ने कृष्ण को दिया पुत्र वियोग में तड़पने का श्राप
गांधारी के सौ के सौ पुत्र मृत्यु को वरण हो जाते हैं। अंत में जब कृष्ण गांधारी को मिलने आते हैं तो गांधारी कृष्ण से कहती है कि तुम इस युद्ध को रोक सकते थे। कृष्ण कहते हैं कि मैंने दुर्योधन को बहुत समझाया लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी। गांधारी कहती है कि यह सब तुम्हारा ही षड्यंत्र है। कृष्ण को श्राप देती है कि तुम्हारा वंश भी ऐसे ही पुत्र वियोग में तड़फे जिस तरह मैं तड़फ रही हूं।
इन्होंने निभाई भूमिका
श्री कृष्ण की भूमिका में मयंक सिंह, गांधारी की भूमिका में शुभ्रा सिंह रही जबकि संजय कश्यप ने धृतराष्ट्र, गौरी ने दासी, ज्योति शर्मा ने भीष्म, वेद प्रकाश ने शकुनि, हर्ष ने दुर्योधन, सागर चुघ ने संजय, शीतल ने द्रौपदी, विकास नेगी ने सैनिक की भूमिका निभाई। वेशभूषा अनुष्का तिवारी और किरण की रही जबकि संगीत चिरायु भारद्वाज ने दिया।