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फ्रेंडशिप डे स्पेशल: यारो.. दोस्ती बड़ी ही हसीन है, पढ़ें ये दिलचस्प कहानियां
शबनम कौर/अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Updated Tue, 09 Aug 2016 05:25 PM IST
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friendship day
- फोटो : amar ujala
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आज दोस्तों का दिन है यारो और दोस्ती बड़ी ही हसीन चीज है। दोस्ती वो रिश्ता, जिसके लिए इंसान कुछ भी करता, लेकिन विश्वास नहीं तोड़ता। पढ़ें ये कहानियां, यकीं हो जाएगा। दोस्ती अपनी भी असर रखती है, फराज, बहुत याद आएंगे, जरा भूल कर तो देखो। अहमद फराज का लिखा यह शेर जीवन में दोस्ती के मायने, उसकी अहमियत और महत्व को आसान शब्दों में बयां करता है। पुराने समय में दोस्ती के लिए कोई दिन निर्धारित नहीं था।
अब तो अगस्त का पहला रविवार इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाया जाने लगा है। इस दिन को सभी दोस्त एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फ्रेंडशिप बैंड, फ्लावर, बुके और बाजार में उपलब्ध गिफ्ट आइटम्स देकर मनाते हैं। दोस्ती पर तो हिंदी सिनेमा ने भी काफी हिट सांग दिए हैं जैसे कि- ये दोस्ती हम नहीं छोडे़ंगे, यारो..दोस्ती बड़ी ही हसीन है, तेरे जैसा यार कहां, मेरी दोस्ती मेरा प्यार।
कृष्ण सुदामा की दोस्ती को आज भी याद किया जाता है। हर युग में कहीं न कहीं दोस्ती की मिसाल देखने को मिलती है, उसी तरह इस युग में भी कई दोस्त ऐसे हैं, जिन्होंने दोस्ती निभाकर न केवल मिसाल कायम की है। बल्कि लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बने हैं। पेश है सिटी ब्यूटीफुल में दोस्ती की मिसाल कायम करने वाले कुछ ऐसे दोस्तों से बातचीत।
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अब तो अगस्त का पहला रविवार इंटरनेशनल फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाया जाने लगा है। इस दिन को सभी दोस्त एक दूसरे को ग्रीटिंग कार्ड्स, फ्रेंडशिप बैंड, फ्लावर, बुके और बाजार में उपलब्ध गिफ्ट आइटम्स देकर मनाते हैं। दोस्ती पर तो हिंदी सिनेमा ने भी काफी हिट सांग दिए हैं जैसे कि- ये दोस्ती हम नहीं छोडे़ंगे, यारो..दोस्ती बड़ी ही हसीन है, तेरे जैसा यार कहां, मेरी दोस्ती मेरा प्यार।
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कृष्ण सुदामा की दोस्ती को आज भी याद किया जाता है। हर युग में कहीं न कहीं दोस्ती की मिसाल देखने को मिलती है, उसी तरह इस युग में भी कई दोस्त ऐसे हैं, जिन्होंने दोस्ती निभाकर न केवल मिसाल कायम की है। बल्कि लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बने हैं। पेश है सिटी ब्यूटीफुल में दोस्ती की मिसाल कायम करने वाले कुछ ऐसे दोस्तों से बातचीत।
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'फ्रेंड की मदर के लिए ब्लड डोनेट कर बचाई जान'
friendship day
- फोटो : amar ujala
'फ्रेंड की मदर के लिए ब्लड डोनेट कर बचाई जान'
माही और सुरी चौहान पिछले 15 वर्षों से दोस्त हैं। दोनों हिमाचल के हमीरपुर जिले से हैं। माही (25) चंडीगढ़ के सेक्टर-22 में रहती है। माही अपनी दोस्ती के बारे में बताते हुए भावुक हो गई। उन्होंने बताया कि पिछले साल जब वह चंडीगढ़ में हॉस्टल थी। उस दौरान उनकी मां कुछ समय से बीमार चल रही थीं। एक दिन रात को अचानक उनकी तबीयत अधिक खराब हो गई और उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट कराना पड़ा। मां को देखकर डॉक्टरों ने ऑपरेशन की बात की।
आपरेशन के लिए ब्लड चाहिए था, लेकिन वहां ब्लड बैंक में मां के सैंपल का ब्लड नहीं था। वहां आसपास कहीं ब्लड का इंतजाम नहीं हो पाया। पापा का ब्लड भी मां के ब्लड ग्रुप से मैच नहीं हो पा रहा था। रात को उसे भी हॉस्टल से छुट्टी नहीं मिल रही थी। उस समय सुरी अपने घर से हॉस्पिटल गया और मां को ब्लड दिया। सुरी हमेशा ब्लड डोनेट करता था। ऑपरेशन के 10 दिन पहले ही उसने एक कैंप में ब्लड डोनेट किया था। उसने मां की जान बचाने के लिए दोबारा ब्लड डोनेट किया। उसके बाद वह काफी बीमार हो गया। लेकिन परिवार लिए जो किया उसे वह पूरी जिंदगी नहीं भूल सकती।
जो परमिंद्र ने मेरे लिए किया शायद सगी बहन भी न करती
पीजीआई की दो नर्सें शोभना पठानिया (48) और परमिंदरजीत कौर की दोस्ती 10 वर्ष पुरानी है। सेक्टर-22 में रहने वाली शोभना बताती हैं कि इसी वर्ष 9 मई को उनकी हेड इंजरी हुई थी और एक महीना अस्पताल में एडमिट रही। इस दौरान परमिंदर ने सगी बहन की तरह उनका साथ दिया। वह घर संभालती साथ ही हॉस्पिटल में देखने आती। जितना उसने मेरे लिए किया शायद कोई भी नहीं कर पाता। शोभना और परमिंदरजीत में इतनी गहरी दोस्ती है कि फेसबुक और व्हाट्सएप पर एकसाथ अपनी फोटो लगाती हैं।
माही और सुरी चौहान पिछले 15 वर्षों से दोस्त हैं। दोनों हिमाचल के हमीरपुर जिले से हैं। माही (25) चंडीगढ़ के सेक्टर-22 में रहती है। माही अपनी दोस्ती के बारे में बताते हुए भावुक हो गई। उन्होंने बताया कि पिछले साल जब वह चंडीगढ़ में हॉस्टल थी। उस दौरान उनकी मां कुछ समय से बीमार चल रही थीं। एक दिन रात को अचानक उनकी तबीयत अधिक खराब हो गई और उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट कराना पड़ा। मां को देखकर डॉक्टरों ने ऑपरेशन की बात की।
आपरेशन के लिए ब्लड चाहिए था, लेकिन वहां ब्लड बैंक में मां के सैंपल का ब्लड नहीं था। वहां आसपास कहीं ब्लड का इंतजाम नहीं हो पाया। पापा का ब्लड भी मां के ब्लड ग्रुप से मैच नहीं हो पा रहा था। रात को उसे भी हॉस्टल से छुट्टी नहीं मिल रही थी। उस समय सुरी अपने घर से हॉस्पिटल गया और मां को ब्लड दिया। सुरी हमेशा ब्लड डोनेट करता था। ऑपरेशन के 10 दिन पहले ही उसने एक कैंप में ब्लड डोनेट किया था। उसने मां की जान बचाने के लिए दोबारा ब्लड डोनेट किया। उसके बाद वह काफी बीमार हो गया। लेकिन परिवार लिए जो किया उसे वह पूरी जिंदगी नहीं भूल सकती।
जो परमिंद्र ने मेरे लिए किया शायद सगी बहन भी न करती
पीजीआई की दो नर्सें शोभना पठानिया (48) और परमिंदरजीत कौर की दोस्ती 10 वर्ष पुरानी है। सेक्टर-22 में रहने वाली शोभना बताती हैं कि इसी वर्ष 9 मई को उनकी हेड इंजरी हुई थी और एक महीना अस्पताल में एडमिट रही। इस दौरान परमिंदर ने सगी बहन की तरह उनका साथ दिया। वह घर संभालती साथ ही हॉस्पिटल में देखने आती। जितना उसने मेरे लिए किया शायद कोई भी नहीं कर पाता। शोभना और परमिंदरजीत में इतनी गहरी दोस्ती है कि फेसबुक और व्हाट्सएप पर एकसाथ अपनी फोटो लगाती हैं।
'जब भगवान बनकर पहुंचा दोस्त'
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- फोटो : amar ujala
'जब भगवान बनकर पहुंचा दोस्त'
मौलीजागरां निवासी सोनू (21) ने बताया कि वह दिन उनकी जिंदगी का सबसे बुरा और सबसे बढ़िया भी था। घर की आर्थिक स्थिति और लोगों को तानों के कारण वह इतना तंग आ चुका था कि सुसाइड करने की सोचने लगा। पता नहीं पवन को कहां से पता चला कि वह कुछ गलत सोच रहा है। उसके कदम ट्रेन की लाइनों पर बढ़े जा रहे थे और सामने से एक ट्रेन आ रही थी।
कुछ ही कदमों का फासला था, लेकिन ऐन वक्त पर पवन दूसरी ओर धक्का देकर उसे सुसाइड करने से रोक दिया। उसने मुझे समझाया और आज जिंदा हू तो शायद उसी की बदौलत। हमारी दोस्ती इतनी गहरी है कि बिना कुछ कहे एक दूसरे की बात समझ जाते हैं।
दोस्त की मौत हो गई तो उसकी फैमिली को दिया सहारा
सुरजीत सिंह और गगन (दोनों काल्पनिक नाम) की दोस्ती एक मिसाल है। सुरजीत ने बताया कि दोनों की बचपन से दोस्ती थी। वह साथ ही पढ़े लिखे। कुछ समय बाद सुरजीत को मोहाली में जॉब मिल गई। वह यहां रहने लगे। गगन गांव में अपना काम करता रहा। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली और कुछ समय बाद दोनों के बच्चे भी हो गए।
सुरजीत ने बताया कि एक दिन गांव के ही एक दोस्त का फोन आया और उसने बताया कि एक्सीडेंट में गगन की मौत हो गई है। वह दोस्त की मौत से पूरी तरह टूट गया। क्योंकि उसके परिवार को संभालने वाला कोई नहीं था। उसका दो साल का एक बेटा भी था। उनमें इतनी गहरी दोस्ती थी कि दोनों एक दूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे। जब गगन की मौत के बारे में पता चला तो सुरजीत ने खुद को संभाला और उसके परिवार की जिम्मेदारी ले ली। सुरजीत गगन की वाइफ और बच्चे को मोहाली ले आया। आज सभी एक ही छत के नीचे रहते हैं।
मौलीजागरां निवासी सोनू (21) ने बताया कि वह दिन उनकी जिंदगी का सबसे बुरा और सबसे बढ़िया भी था। घर की आर्थिक स्थिति और लोगों को तानों के कारण वह इतना तंग आ चुका था कि सुसाइड करने की सोचने लगा। पता नहीं पवन को कहां से पता चला कि वह कुछ गलत सोच रहा है। उसके कदम ट्रेन की लाइनों पर बढ़े जा रहे थे और सामने से एक ट्रेन आ रही थी।
कुछ ही कदमों का फासला था, लेकिन ऐन वक्त पर पवन दूसरी ओर धक्का देकर उसे सुसाइड करने से रोक दिया। उसने मुझे समझाया और आज जिंदा हू तो शायद उसी की बदौलत। हमारी दोस्ती इतनी गहरी है कि बिना कुछ कहे एक दूसरे की बात समझ जाते हैं।
दोस्त की मौत हो गई तो उसकी फैमिली को दिया सहारा
सुरजीत सिंह और गगन (दोनों काल्पनिक नाम) की दोस्ती एक मिसाल है। सुरजीत ने बताया कि दोनों की बचपन से दोस्ती थी। वह साथ ही पढ़े लिखे। कुछ समय बाद सुरजीत को मोहाली में जॉब मिल गई। वह यहां रहने लगे। गगन गांव में अपना काम करता रहा। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली और कुछ समय बाद दोनों के बच्चे भी हो गए।
सुरजीत ने बताया कि एक दिन गांव के ही एक दोस्त का फोन आया और उसने बताया कि एक्सीडेंट में गगन की मौत हो गई है। वह दोस्त की मौत से पूरी तरह टूट गया। क्योंकि उसके परिवार को संभालने वाला कोई नहीं था। उसका दो साल का एक बेटा भी था। उनमें इतनी गहरी दोस्ती थी कि दोनों एक दूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे। जब गगन की मौत के बारे में पता चला तो सुरजीत ने खुद को संभाला और उसके परिवार की जिम्मेदारी ले ली। सुरजीत गगन की वाइफ और बच्चे को मोहाली ले आया। आज सभी एक ही छत के नीचे रहते हैं।
क्या होता है फ्रेंडशिप डे?
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- फोटो : file photo
क्या होता है फ्रेंडशिप डे?
पहली बार फ्रेंडशिप डे मनाए जाने का निर्णय 'यूएस कांग्रेस' ने 1935 में लिया था। फ्रेंडशिप डे मनाने के पीछे का कारण प्रथम विश्व युद्ध के कारण पैदा हुए डर, अविश्वास का माहौल था। उस समय दोस्ती की जरूरत केवल विभिन्न देशों में ही नहीं, बल्कि हर इंसान में थी।
इसीलिए 'यूएस कांग्रेस' ने 1935 में अगस्त के पहले संडे को फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे यूएस को देखकर अन्य देशों ने भी फ्रेंडशिप डे मनाना शुरू कर दिया।
यह नेशनल फ्रेंडशिप डे से इंटरनेशनल फ्रेंडशिप में बदल गया। 1997 में प्रसिद्ध कार्टून कैरेक्टर 'पू' को यूनाइटेड नेशंस ने फ्रेंडशिप एंबेसडर बनाया।
पहली बार फ्रेंडशिप डे मनाए जाने का निर्णय 'यूएस कांग्रेस' ने 1935 में लिया था। फ्रेंडशिप डे मनाने के पीछे का कारण प्रथम विश्व युद्ध के कारण पैदा हुए डर, अविश्वास का माहौल था। उस समय दोस्ती की जरूरत केवल विभिन्न देशों में ही नहीं, बल्कि हर इंसान में थी।
इसीलिए 'यूएस कांग्रेस' ने 1935 में अगस्त के पहले संडे को फ्रेंडशिप डे के रूप में मनाने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे यूएस को देखकर अन्य देशों ने भी फ्रेंडशिप डे मनाना शुरू कर दिया।
यह नेशनल फ्रेंडशिप डे से इंटरनेशनल फ्रेंडशिप में बदल गया। 1997 में प्रसिद्ध कार्टून कैरेक्टर 'पू' को यूनाइटेड नेशंस ने फ्रेंडशिप एंबेसडर बनाया।