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Hindi News ›   Chandigarh ›   Four Generations of Panchkula Businessman Family Defeated Corona with Positive Mindset

#Ladengecoronase: चार पीढ़ियों को एक साथ हुआ कोरोना, पंचकूला के कारोबारी परिवार ने मिलकर दी मात  

Sun, 02 May 2021 09:14 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sun, 02 May 2021 09:14 AM IST
सार

उनके लिए अप्रैल का महीना बहुत ही कष्टदायक रहा। घर पर चार पीढ़ी एक साथ रहती हैं। उनकी मां की उम्र 77 साल है। उनकी पत्नी, दो बेटे-बहु और उनके दो-दो बच्चे हैं। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था।

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Four Generations of Panchkula Businessman Family Defeated Corona with Positive Mindset
संजय बूथरा का परिवार। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मन में दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो आदमी बड़ी से बड़ी परेशानी से पार पा सकता है। ऐसी ही इच्छाशक्ति पंचकूला के सेक्टर 15 में रहने वाले कारोबारी संजय बूथरा के परिवार ने दिखाई। उनके परिवार में चार पीढ़ियों को एक साथ कोरोना हुआ। सभी ने मिलकर इससे जग लड़ी और जीत ली। 

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बूथरा बताते हैं कि उनके लिए अप्रैल का महीना बहुत ही कष्टदायक रहा। घर पर चार पीढ़ी एक साथ रहती हैं। उनकी मां की उम्र 77 साल है। उनकी पत्नी, दो बेटे-बहु और उनके दो-दो बच्चे हैं। सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था। दो अप्रैल को अचानक से बड़े बेटे हर्ष को बुखार आ गया। पहला शक कोरोना का हुआ और उसे पहली मंजिल पर क्वारंटीन कर दिया। अगले ही दिन रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। 
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डॉक्टर के परामर्श के मुताबिक वह दवा लेता रहा। उसे गंभीर लक्षण नहीं थे। 11 अप्रैल को उन्होंने अपनी मां को कोविड का इंजेक्शन लगवाया जबकि उन्होंने मार्च में ही लगवा लिया था। टीकाकरण कराने के तीन घंटे बाद ही उनकी मां को बुखार आने लगा। सबको लगा कि कोरोना का टीका करवाया है, इसलिए बुखार आ रहा है। लेकिन अगले ही दिन पत्नी को बुखार आने लगा।

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मां ने कहा, जंग लड़नी पड़ेगी

उनकी तीन साल की पोती में भी बुखार के लक्षण दिखने लगे। इसके बाद तुरंत उन्होंने अपना, मां, पत्नी, पोती और बड़ी बहू का टेस्ट कराया। अगले दिन रिपोर्ट आते ही सबके होश उड़ गए। सभी पॉजिटिव आ गए। इस पर उनकी मां ने सभी का हौसला बढ़ाया और कहा कि अब इससे जंग लड़नी है। मां के कहते ही शरीर में ऊर्जा आ गई। सबसे पहले घर पर जो तीन पोते-पोतियां, छोटा बेटा व छोटी बहू निगेटिव थे, उन्हें अलग कर दिया। सबसे ज्यादा चिंता मां व पोती सांझ को लेकर थी। स्थिति ऐसी आ गई थी कि कोई किसी की मदद नहीं कर सकता था।  

बूथरा बताते हैं कि 20 अप्रैल से उनकी मां की तबियत खराब होने लगी। ऑक्सीजन का स्तर 78 और शुगर 60 पहुंच गई। डॉक्टरों ने कहा कि उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाना होगा। कहीं भी बेड नहीं मिल रहा था। काफी कोशिश करने के बाद सेक्टर- 26 स्थित एक प्राइवेट हास्पिटल में बेड मिल गया। इस दौरान उनका बेटा निगेटिव आ चुका था। अपने भाइयों व भतीजे की मदद से उन्होंने मां को अस्पताल में दाखिल कराया। 

इस दौरान मां ने कहा कि अस्पताल में दाखिल कराने से अच्छा है कि संथारा करवा दो। संथारा जैन धर्म की एक मान्यता है। इसमें जब कोई व्यक्ति या जैन मुनि अपनी जिंदगी पूरी तरह से जी लेता है और शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है तो उस वक्त वो संथारा ले सकता है। यह एक धार्मिक संकल्प होता है। इसके बाद व्यक्ति अन्न त्याग करता है और मृत्यु का सामना करता है।

बूथरा ने बताया कि मां को पता था कि अस्पतालों में बेड नहीं मिल रहे हैं। काफी मुश्किलों के बाद एक बेड मिला था। वे चाहती थी कि उनके बजाय किसी जरूरतमंद को बेड दे दिया जाए। वे तो अपनी पूरी जिंदगी जी चुकी हैं। लेकिन उन्होंने अपनी मां को एडमिट कराया। चार दिन बाद वे कोरोना को हराकर वापस आ गई। इसी दौरान उनकी पोती सांझ काफी बीमार हो गई। उसे बेहोशी की हालत में हॉस्पिटल में एडमिट करवाना पड़ा। हालांकि उसे रात में ही छुट्टी मिल गई। इतना सब कुछ होने के बावजूद हम न कभी घबराए। न कोई जल्दबाजी या आपाधापी की। चिंता जरूर थी। लेकिन ऊपर वाले पर विश्वास था कि सबकुछ ठीक हो जाएगा और सब ठीक हो भी गया  
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