चंडीगढ़ : पटाखों के जहरीले धुएं से खतरे में बच्चे, बूढ़े और जवान, फेफड़ों को पहुंचाता है नुकसान
- पटाखों से निकलने वाले रसायनिक तत्व भी फेफड़ों पर करेंगे हमला
- बीमार लोग, गर्भवती महिलाओं व दिल के मरीजों पर बेहद घातक होता है असर
- पटाखे में पाए जाने वाले हानिकारक तत्व शरीर के अंदरूनी भाग को पहुंचा सकते हैं नुकसान
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
दिवाली पर की जाने वाली आतिशबाजी से इस बार कोरोना के कारण सांस के मरीजों पर सबसे ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। कोरोना संक्रमण के कारण सबसे ज्यादा फेफड़ों पर ही दुष्प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि इस साल पटाखों के बिना दिवाली मनाई जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि पटाखों में पाए जाने वाले हानिकारक रसायनिक तत्व दिल से दिमाग तक को प्रभावित करते हैं। इनके दुष्प्रभाव से जान भी जा सकती है। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि सेहत को ध्यान में रखते हुए इस बार रोशनी के इस त्योहार पर पटाखों का इस्तेमाल न करें।
पटाखों के धुएं से हार्टअटैक और स्ट्रोक का खतरा भी पैदा हो सकता है। पीजीआई एडवांस कार्डियक सेंटर के प्रभारी डॉ. यशपाल ने बताया कि पटाखों में मौजूद लेड सेहत के लिए खतरनाक है। इस कारण हार्टअटैक और स्ट्रोक की आशंका बढ़ जाती है। जब प्रदूषण वाले पटाखों से निकलने वाला धुआं सांस के साथ शरीर में जाता है तो खून के प्रवाह में रुकावट आने लगती है। दिमाग को पर्याप्त मात्रा में खून न पहुंचने के कारण व्यक्ति स्ट्रोक का शिकार हो सकता है।
मां और नवजात को पहुंचा सकता है नुकसान
निदेशक स्वास्थ्य व स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. अमनदीप कंग का कहना है कि बच्चे और गर्भवती महिलाओं को पटाखों के शोर व धुएं से बचकर रहना चाहिए। पटाखों से निकला गाढ़ा धुआं खासतौर पर छोटे बच्चों में सांस की समस्याएं पैदा करता है।
पटाखों में हानिकारक रसायन होते हैं, जिनके कारण बच्चों के शरीर में टॉक्सिन्स का स्तर बढ़ जाता है और उनके विकास में रुकावट पैदा होती है। पटाखों के धुएं से गर्भपात की संभावना भी बढ़ जाती है, इसलिए गर्भवती महिलाओं को भी ऐसे समय में घर पर ही रहना चाहिए।
पटाखों में पाए जाते खतरनाक तत्व सेहत के लिए नुकसानदायक
पीजीआई कम्युनिटी मेडिसिन के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. रविन्द्र ने बताया कि हर बार दिवाली के बाद धूल के कणों पर कॉपर, जिंक, सोडियम, लेड, मैग्निशियम, कैडमियम, सल्फर ऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जमा हो जाते हैं। इन गैसों के हानिकारक प्रभाव होते हैं। इसमें कॉपर से सांस की समस्याएं, कैडमियम-खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता कम करता है, जिससे व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो सकता है।
जिंक की वजह से उल्टी व बुखार व लेड से तंत्रिका प्रणाली को नुकसान पहुंचता है। मैग्निशियम व सोडियम भी सेहत के लिए हानिकारक है। आंख, नाक और गले की समस्याएं हो सकती हैं। पटाखों का धुआं, सर्दी-जुकाम और एलर्जी का कारण बन सकता है और इस कारण छाती व गले में कन्जेशन भी हो सकता है।
ज्यादा आवाज से सुनने की क्षमता पर पड़ता है असर
डॉ. रविन्द्र का कहना है कि 100 डेसिबल से ज्यादा आवाज का बुरा असर हमारी सुनने की क्षमता पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शहरों के लिए 45 डेसिबल की आवाज अनुकूल है लेकिन भारत के बड़े शहरों में शोर का स्तर 90 डेसिबल से भी अधिक है। मनुष्य के लिए उचित स्तर 85 डेसिबल तक ही माना गया है। अनचाही आवाज मनुष्य पर मनोवैज्ञानिक असर पैदा करती है।
तेज आवाज दिल से दिमाग तक कर देगी प्रभावित
डॉ. रविन्द्र ने बताया कि शोर तनाव, अवसाद, उच्च रक्तपचाप, सुनने में परेशानी, टिन्नीटस, नींद में परेशानी आदि का कारण बन सकता है। तनाव और उच्च रक्तचाप सेहत के लिए घातक है। वहीं टिन्नीटस के कारण व्यक्ति की याददाश्त जा सकती है, वह अवसाद का शिकार हो सकता है। ज्यादा शोर दिल की सेहत के लिए अच्छा नहीं। शोर में रहने से रक्तचाप पांच से दस गुना बढ़ जाता है और तनाव बढ़ता है। ये सभी कारक उच्च रक्तचाप और कोरोनरी आर्टरी रोगों का कारण बन सकते हैं।
पटाखे दमा मरीजों के लिए सबसे खतरनाक
जीएमएसएच-16 के पल्मोनरी मेडिसिन के डॉ. हनी सैनी का कहना है कि ये स्थिति अस्थमा के मरीजों के लिए बेहद घातक सिद्ध हो सकती है। इससे बचाव के लिए कोशिश रहे कि पटाखें न जलाएं या कम पटाखे फोड़ें। पटाखों के जलने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर ऑक्साइड जैसी गैसें निकलती हैं जो दमा के मरीजों के लिए खतरनाक हैं।
हवा में मौजूदा धुआं बच्चों और बुजुर्गों के लिए घातक हो सकता है। इस तरह से पटाखों के धुएं से फेफड़ों में सूजन आ सकती है, जिससे फेफड़े अपना काम ठीक से नहीं कर पाते और हालात यहां तक भी पहुंच सकते हैं कि अंग काम करना बंद कर सकते हैं और इससे मौत तक हो सकती है।
उन्होंने सलाह दी कि प्रदूषित हवा से बचें, क्योंकि यह तनाव और एलर्जी का कारण बन सकती है। एलर्जी से बचने के लिए अपने मुंह को रूमाल या कपड़े से ढक लें। दमा आदि के मरीज अपना इन्हेलर अपने साथ रखें। अगर सांस लेने में परेशानी हो तो तुरंत इसका इस्तेमाल करें और इसके बाद डॉक्टर की सलाह लें।
पटाखे न फोड़ने की ली शपथ
पर्यावरण को सुरक्षित बनाने के लिए पटाखों के विरुद्ध एक युद्ध की शुरुआत हुई है। अमर उजाला के इस अभियान को शहरवासियों की ओर से जनसमर्थन मिलने लगा है। विद्यार्थी और जिम्मेदार नागरिक शपथ ले रहे हैं कि वे इस बार पटाखे नहीं फोड़ेंगे। प्रदूषण को रोकने के लिए अपनी ओर से पहल करने के साथ वे लोगों को जागरूक भी करेंगे। आप भी शपथ लेकर पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकते हैं। अपना शपथ पत्र chd-cityreporter@chd.amarujala.com पर भेज सकते हैं। पंचकूला की वंशिका, प्राची और मानिक सैनी ने भी ली शपथ (फोटो )
दिवाली का मतलब दीयों का त्योहार
मैं आज ही संकल्प लेता हूं कि दिवाली पर पटाखे नहीं फोड़ेंगे। दिवाली को धूमधाम से मनाएंगे लेकिन प्रदूषण नहीं फैलाएंगे। वातावरण को स्वच्छ बनाने के लिए मैं पूरा सहयोग दूंगा। लोगों को भी जागरूक करूंगा। - जगजीत सिंह (सिंह सीसीटीवी)
15 परिवारों को जागरूक करूंगा
मेरा परिवार दीपावली पर पटाखे नहीं फोड़ता है। इस साल भी शपथ लेता हूं कि दिवाली पर आतिशबाजी नहीं करूंगा। साथ ही 15 परिवार को भी इस बात के लिए जागरूक करूंगा। मलविंदर पाल सिंह लाडी पन्नू, समाजसेवी मलोया कॉलोनी
सभी के प्रयास से होगा पर्यावरण सुरक्षित
जब दीयों से हो सकता है उजियारा तो क्यों लें हम पटाखों का सहारा। दिवाली को बिना प्रदूषण के मनाना चाहिए। इसके लिए हम सभी को सहयोग करना होगा। सभी के प्रयास से ही पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। - बाली राम मिश्रा, मनीमाजरा