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Chandigarh News: ईएसआईसी का रिकॉर्ड नहीं दिया, कंपनी और दोनों निदेशक दोषी
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चंडीगढ़। कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) के निरीक्षण के दौरान जरूरी रिकॉर्ड पेश नहीं करना मोगा की पारस न्यूट्रिशंस प्राइवेट लिमिटेड और उसके दोनों निदेशकों को भारी पड़ गया। चंडीगढ़ की चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट सचिन यादव की अदालत ने कंपनी और उसके निदेशक पारस बुधिराजा व विनय बुधिराजा को कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 की धारा 85 (जी) के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने तीनों पर जुर्माना लगाया है।
ईएसआईसी ने दर्ज कराया था मामला
मामले में ईएसआई चंडीगढ़ के डिप्टी डायरेक्टर के माध्यम से अदालत में शिकायत दायर की गई थी। आरोप था कि कंपनी के निदेशकों ने निरीक्षण के दौरान जरूरी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया। शिकायत पर अदालत ने आरोपियों को समन जारी किए। सुनवाई के दौरान अदालत को प्रथम दृष्टया अपराध बनता नजर आया। इसके बाद आरोपियों को नोटिस जारी किया गया। दोनों निदेशकों ने अदालत के समक्ष अपना अपराध स्वीकार कर ट्रायल का सामना नहीं करने का फैसला लिया। अदालत ने उन्हें अपराध स्वीकार करने के परिणामों के बारे में समझाया। इसके बावजूद दोनों अपने बयान पर कायम रहे। कोर्ट ने माना कि उनका अपराध स्वीकार करना स्वैच्छिक और बिना किसी दबाव के था।
अदालत ने दोनों निदेशकों को चार-चार हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना नहीं भरने पर प्रत्येक को 10 दिन की साधारण कैद भुगतनी होगी। कंपनी पर भी चार हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसका भुगतान दोनों निदेशकों को करना होगा। अदालत के आदेश के बाद जुर्माने की राशि जमा करा दी गई।
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बचाव पक्ष ने मांगी नरमी, ईएसआईसी ने की कड़ी सजा की मांग
सजा की मात्रा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने नरम रुख अपनाने की अपील की। आरोपियों की ओर से कहा गया कि वे पहली बार कानून का उल्लंघन करने वाले हैं और परिवार की जिम्मेदारियां भी हैं। उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करने का आश्वासन दिया। वहीं, ईएसआईसी ने अधिकतम सजा देने की मांग की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दोषियों की उम्र, चरित्र, पूर्ववृत्त और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखा।
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ईएसआईसी ने दर्ज कराया था मामला
मामले में ईएसआई चंडीगढ़ के डिप्टी डायरेक्टर के माध्यम से अदालत में शिकायत दायर की गई थी। आरोप था कि कंपनी के निदेशकों ने निरीक्षण के दौरान जरूरी रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया। शिकायत पर अदालत ने आरोपियों को समन जारी किए। सुनवाई के दौरान अदालत को प्रथम दृष्टया अपराध बनता नजर आया। इसके बाद आरोपियों को नोटिस जारी किया गया। दोनों निदेशकों ने अदालत के समक्ष अपना अपराध स्वीकार कर ट्रायल का सामना नहीं करने का फैसला लिया। अदालत ने उन्हें अपराध स्वीकार करने के परिणामों के बारे में समझाया। इसके बावजूद दोनों अपने बयान पर कायम रहे। कोर्ट ने माना कि उनका अपराध स्वीकार करना स्वैच्छिक और बिना किसी दबाव के था।
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अदालत ने दोनों निदेशकों को चार-चार हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना नहीं भरने पर प्रत्येक को 10 दिन की साधारण कैद भुगतनी होगी। कंपनी पर भी चार हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया, जिसका भुगतान दोनों निदेशकों को करना होगा। अदालत के आदेश के बाद जुर्माने की राशि जमा करा दी गई।
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बचाव पक्ष ने मांगी नरमी, ईएसआईसी ने की कड़ी सजा की मांग
सजा की मात्रा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने नरम रुख अपनाने की अपील की। आरोपियों की ओर से कहा गया कि वे पहली बार कानून का उल्लंघन करने वाले हैं और परिवार की जिम्मेदारियां भी हैं। उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं करने का आश्वासन दिया। वहीं, ईएसआईसी ने अधिकतम सजा देने की मांग की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दोषियों की उम्र, चरित्र, पूर्ववृत्त और मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखा।