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PGI में केमिस्ट शॉप सबसे महंगी, असर मरीजों पर

Thu, 31 Dec 2015 03:24 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Thu, 31 Dec 2015 03:24 PM IST
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expensive rent of chemist shop of PGI

एक बार अनुमान लगाइए कि पीजीआई की एक केमिस्ट शॉप का किराया कितना होगा। ज्यादा से ज्यादा 40 से 50 लाख।

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यदि इस बारे में पहले से ही वाकिफ हैं तो आपका अंदाजा 60 लाख से ज्यादा ऊपर नहीं जाएगा, लेकिन नया किराया सुनेंगे तो आपके सभी अंदाज और अनुमान धरे रह जाएंगे। मंगलवार को नेहरू हास्पिटल की एक केमिस्ट शॉप फाइनल की गई, जिसका किराया करीब 68 लाख रुपये है।

14.5 प्रतिशत टैक्स के हिसाब से केमिस्ट शॉप का किराया करीब 78 लाख 76 हजार रुपये पड़ता है। यदि इसमें काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन और बिजली बिल जोड़ दिया जाए तो करीब पांच से छह लाख अतिरिक्त खर्च भी आता है।
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इस हिसाब से एक केमिस्ट शॉप का किराया कम से कम 83 लाख रुपये बैठता है। विशेषज्ञों का दावा है कि पीजीआई के इतिहास में पहले कभी इतनी महंगी दुकान नहीं उठी है। इससे पहले इसी केमिस्ट शॉप का किराया 62 लाख रुपये था। बताया गया है कि दिल्ली की एक कंपनी ने दुकान को किराए पर लिया है।
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किराया मरीजों की जेब से निकाला जाएगा
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी महंगी दुकान का किराया केमिस्ट शॉप मालिक कैसे और कहां से भरेगा। पीजीआई में आने वाले मरीजों की संख्या उतनी ही रहेगी। शॉप मालिक किराया और मुनाफा इन्हीं मरीजों से ही निकालेगा। यानी यहां पर दवाएं मरीजों को महंगी मिलेंगी।

इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है। जो दवाएं सस्ती मिल रही थी, अब उनके रेट ज्यादा लिए जाएंगे। यह केमिस्ट शॉप मरीजों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि पूरे नेहरू हास्पिटल में सिर्फ दो ही दुकानें हैं।

क्या कर सकता था पीजीआई
पीजीआई चाहे तो सब कुछ कर सकती है, लेकिन वह कुछ करना नहीं चाहती। कभी इसके समाधान के बारे में नहीं सोचा गया। विशेषज्ञ कहते हैं कि भले ही इसका किराया बढ़ गया हो, लेकिन दवाओं के डिस्काउंट बदले जा सकते थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया। पीजीआई चाहे तो दवाओं पर मिल रहे डिस्काउंट पर दस प्रतिशत और बढ़ा सकता था। पीजीआई अपनी भी दुकान खोल सकता है। इस दिशा में काम चल रहा है।

सारा खेल एमआरपी का है
दवाओं पर सारा खेल एमआरपी (मैक्सिमम रिटेल प्राइस) का है। दवा कंपनी अपनी मर्जी से एमआरपी तय करती है। दवा पर खर्च 200 रुपये का होगा, लेकिन उसका एमआरपी रेट पांच हजार रुपये का होगा। एमआरपी से ज्यादा वे बेच नहीं सकते हैं, लेकिन एमआरपी से कम में बेच सकते हैं।

डिस्काउंट का लालच दिखाकर मरीजों को 200 वाली दवाएं तीन से चार हजार में बेच देंगे। ऐसा नहीं है कि सरकार इसे कंट्रोल नहीं कर सकती। सरकार चाहे तो कई जरूरी दवाओं को ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) के तहत ला सकती है। ऐसा करने से दवाओं के रेट तय हो जाते हैं। उसके बाद कोई भी कंपनी उस रेट से ज्यादा में दवाएं नहीं बेच सकती।


अमर उजाला कर चुका है खुलासा
अमर उजाला ने पिछले साल एक पड़ताल के दौरान दिखाया था कि जिस दुकान का किराया अधिक है, उस दुकान पर दवा की कीमत उतनी ज्यादा है। उसके बाद हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर हुई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

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