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एनडीपीएस से ऊपर अजन्मे बच्चे की गरिमा: कठोर कानून भी मानवता के आगे नरम पड़ सकते हैं, HC ने गर्भवती को दी राहत
Wed, 22 Apr 2026 09:17 AM IST
Nivedita
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: Nivedita
Updated Wed, 22 Apr 2026 09:17 AM IST
सार
हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि गरिमा के साथ जीवन जीना मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है और न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उन लोगों के हितों की रक्षा करे जो स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते खासकर अजन्मे बच्चे।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अजन्मे बच्चे की गरिमा और जीवन का अधिकार एनडीपीएस जैसे सख्त कानूनों से भी ऊपर है। अदालत ने वाणिज्यिक मात्रा में नशीले पदार्थ की बरामदगी के मामले में एक गर्भवती महिला को दो महीने की अंतरिम जमानत दे दी।
जस्टिस सुभाष महला की पीठ के समक्ष महिला की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। आरोप है कि महिला के पास से करीब 3 किलो 120 ग्राम हेरोइन बरामद हुई थी। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि गर्भावस्था एक विशेष परिस्थिति है और ऐसे मामलों में कानून को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला को हिरासत में ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है तो इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ता है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अजन्मे बच्चे की गरिमा को भी शामिल करता है।
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पीठ ने कहा कि गरिमा के साथ जीवन जीना मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है और न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उन लोगों के हितों की रक्षा करे जो स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते खासकर अजन्मे बच्चे।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने महिला को दो महीने की अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत विशेष परिस्थितियों के आधार पर दी गई है और इससे मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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जस्टिस सुभाष महला की पीठ के समक्ष महिला की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। आरोप है कि महिला के पास से करीब 3 किलो 120 ग्राम हेरोइन बरामद हुई थी। इसके बावजूद अदालत ने कहा कि गर्भावस्था एक विशेष परिस्थिति है और ऐसे मामलों में कानून को यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला को हिरासत में ही बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया जाता है तो इसका असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता बल्कि बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ता है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार अजन्मे बच्चे की गरिमा को भी शामिल करता है।
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पीठ ने कहा कि गरिमा के साथ जीवन जीना मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है और न्यायालय का कर्तव्य है कि वह उन लोगों के हितों की रक्षा करे जो स्वयं अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते खासकर अजन्मे बच्चे।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अदालत ने महिला को दो महीने की अंतरिम जमानत देने का आदेश दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह राहत विशेष परिस्थितियों के आधार पर दी गई है और इससे मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।