कैग रिपोर्ट : हरियाणा में कालोनाइजर पर ऐसी मेहरबानी, विकास शुल्क के 15 हजार करोड़ नहीं वसूले
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नगर एवं ग्राम आयोजना विभाग के अफसर हरियाणा में कालोनाइजर पर मेहरबान हैं। बाहरी विकास और बुनियादी ढांचा विकास शुल्क के 15 हजार करोड़ रुपये कालोनाइजर से वसूले ही नहीं गए। 16 साल पुराने मामले तक लंबित हैं। कालोनाइजर से 73 लाइसेंस के लिए बैंक गारंटी तक नहीं ली गई। संशोधित लाइसेंस फीस वसूलने में भी रवैया ढुलमुल रहा। भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी 2028-19 की वार्षिक ऑडिट रिपोर्ट में यह लापरवाही उजागर की है।
विधानसभा में 16 मार्च को प्रस्तुत रिपोर्ट में कैग ने विभाग के बड़े असफरों की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई है। कैग ने निदेशक, ग्राम एवं नगर आयोजना विभाग के कार्यालय में दस्तावेजों की जांच कर पाया कि 601 मामलों में बाहरी विकास शुल्क के 14383 करोड़ और बुनियादी ढांचा विकास शुल्क के 833 करोड़ कालोनाइजर से नहीं वसूले गए हैं।
2009 तक विभाग ने 154 लाइसेंस जारी किए, इनका बाहरी विकास शुल्क 2881 करोड़, बुनियादी ढांचा विकास शुल्क 128 करोड़ रुपये बनता था। जनवरी 2010 से दिसंबर 2014 तक 361 लाइसेंस जारी किए गए, इनसे बाहरी विकास शुल्क 10947 करोड़ व बुनियादी ढांचा विकास शुल्क 548 करोड़ रुपये लिया जाना था।
जनवरी 2015 से मार्च 2019 के बीच 86 कुल लाइसेंस जारी हुए, इनका बाहरी विकास शुल्क 553 करोड़ और बुनियादी ढांचा विकास शुल्क 156 करोड़ रुपये वसूलना था। लंबा समय बीतने के बावजूद यह राशि लंबित थी। इसमें से 154 मामले तो ऐसे हैं, जिनमें 3010 करोड़ रुपये दस साल से अधिक अवधि के बकाया हैं।
विभाग के निदेशक को कालोनाइजर का लाइसेंस रद्द करने का अधिकार था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। न ही दोषियों के खिलाफ पर्याप्त कार्रवाई की। विभाग के निदेशक ने अक्तूबर 2020 में कैग को बताया कि उचित आतंरिक जांच और संतुलन के कारण विभाग को किसी बड़ी राशि के अप्राप्त न होने का जोखिम नहीं उठाना पड़ा। इस पर कैग ने कहा कि वसूली के 16 साल पुराने मामले भी लंबित हैं, राशि प्राप्त करने के लिए लाइसेंस रद्द करने संबंधी कार्रवाई भी नहीं की गई, इसलिए जवाब तर्कसंगत नहीं है।
सरकार अपने स्तर पर करे निगरानी : कैग
बहुत बड़ी राशि बकाया है, इसलिए सरकार अपने स्तर पर निगरानी करे। प्लॉट व अपार्टमेंट के वास्तविक खरीदारों के हित सुरक्षित करने के लिए सरकार को दोषी कालोनाइजर के खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए।
संशोधित लाइसेंस फीस न वसूलने पर 13 करोड़ का नुकसान
सरकार ने अगस्त 2014 व फरवरी 2015 में लाइसेंस फीस को संशोधित किया। ये दरें 1 जून 2012 और 4 अप्रैल 2014 से प्रभावी थीं। दस्तावेजों की जांच में पाया गया कि जुलाई 2012 से जून 2014 के बीच फरीदाबाद, गुरुग्राम, पंचकूला व सोनीपत जिलों में आठ डेवलपर्स से पुरानी लाइसेंस दरें ही वसूली गईं, जिससे सरकार को 13 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई।