पीजीआई में बढ़ रही बाल मृत्यु दर: विशेषज्ञों की राय-इलाज में देरी बन रहा सबसे बड़ा कारण, कमजोर व्यवस्था भी जिम्मेदार
बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण उन्हें त्वरित इलाज की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सलाहकार डॉ. आरएस बेदी का कहना है कि बच्चों की मृत्यु दर बढ़ने की वजह व्यवस्था में खामी है।
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चंडीगढ़ पीजीआई जैसे शीर्ष चिकित्सा संस्थान में बच्चों की मृत्यु दर बढ़ती जा रही है। 2019 में यहां कुल 4972 मौतें हुईं, जिनमें बच्चों की संख्या 1344 थी। वहीं, वर्ष 2020 में हुई कुल 4301 मौतों में बच्चों की संख्या 1588 थी। एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था और विशेषज्ञों की टीम भी बच्चों की मौतों के आंकड़े कम करने में सफल नहीं हो पा रही। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती मृत्यु दर की वजह बच्चों को देरी से मिलने वाला इलाज है। इसके लिए अभिभावकों की अनदेखी और कमजोर व्यवस्था मुख्य कारण के रूप में सामने आ रही है।
बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण उन्हें त्वरित इलाज की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सलाहकार डॉ. आरएस बेदी का कहना है कि बच्चों की मृत्यु दर बढ़ने की वजह व्यवस्था में खामी है।
लचर रेफरल सिस्टम की वजह से बच्चों को समय पर विशेषज्ञों का इलाज नहीं मिल पाता है। एंबुलेंस को केवल यातायात का साधन बनाकर रख दिया गया है। इसमें आईसीयू ऑन व्हील की परिकल्पना साकार होनी चाहिए। सरकारी एंबुलेंस में प्रशिक्षित कर्मचारी और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता जरूरी है। प्रत्येक 100 किमी पर एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित होना चाहिए ताकि कम दूरी तय कर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल सके।
बच्चों के इलाज में अभिभावकों की देरी घातक
पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के सर्जन डा. राम समुझ का कहना है कि बच्चों के इलाज को लेकर अभिभावकों के स्तर पर देरी बेहद खतरनाक साबित हो रही है। उनके मुताबिक बच्चों के इलाज में माता-पिता की रजामंदी अहम होती है। इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं कि पीजीआई में ठोस पदार्थ (चुंबक, लोहा, बैटरी इत्यादि) के खा लेने के बाद बच्चों को तत्काल इलाज मिलना चाहिए, लेकिन अभिभावक इलाज कराने का फैसला देरी से लेते हैं।
इन कारणों का भी मृत्यु दर बढ़ाने में अहम रोल
- डॉक्टरों की कमी
- प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र पर सुविधाओं का अभाव
- संस्थागत प्रसव को लेकर अब भी रुढ़िवादिता
- प्रसव के दौरान संक्रमण
- टीकाकरण को लेकर अनदेखी
- बच्चा दूध न पीए
- उल्टी हो
- वजन कम होता जाए
- सुस्त रहे
- बच्चों का रुटीन टीकाकरण
- कम से कम 6 महीने तक स्तनपान कराना
- स्तनपान कराने वाली मां को लगातार खांसी आए तो टीबी की जांच जरूरी
- परेशानी होने पर अन्य विशेषज्ञों के बजाय बालरोग विशेषज्ञ को दिखाएं
- साफ-सफाई का विशेष ध्यान
पीजीआई में 2019 में हुई कुल मौतें 4972, इसमें बच्चों की संख्या 1344 थी
पीजीआई में 2020 में हुई कुल मौतें 4301, इसमें बच्चों की संख्या 1588 थी
बच्चों को किसी भी तरह की परेशानी होने पर लक्षण देर में सामने आता है। ऐसे में नवजात बच्चों के अभिभावक का बेहद सजग रहना जरूरी है। रेफरल सेंटर होने के कारण पीजीआई में अन्य विभागों के साथ ही एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर को भी लगातार अपडेट करने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे बेहतर इलाज मुहैया कराकर बच्चों की मृत्यु दर कम करने में योगदान दिया जा सके। -प्रो. जगतराम, निदेशक पीजीआई