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26 साल पुराने फर्जी एनकाउंटर मामले में आया सीबीआई कोर्ट का बड़ा फैसला, एसएचओ को उम्रकैद

Thu, 28 Feb 2019 02:35 PM IST
खुशबू गोयल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मोहाली Published by: खुशबू गोयल Updated Thu, 28 Feb 2019 02:35 PM IST
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cbi court decision in 26 years old fake encounter case, life imprisonment to three people
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26 साल पुराने फर्जी एनकाउंटर मामले में बुधवार को मोहाली की सीबीआई कोर्ट ने तत्कालीन सीआईए इंचार्ज सहित तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। तत्कालीन डीएसपी सहित तीन आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। फर्जी एनकाउंटर में मारे गए गुरमेल सिंह के परिवार ने कहा कि उन्हें सही न्याय नहीं मिला, इसलिए वे हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
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सीबीआई अदालत ने वर्ष 1993 में रोपड़ पुलिस द्वारा झूठे पुलिस एनकाउंटर में दो नौजवानों को आतंकवादी बता कर मारने वाले उस समय के एसएचओ हरजिन्दरपाल सिंह को उम्रकैद की सजा सुनाई है। उसे पांच लाख रुपये जुर्माना भी किया गया है। उसे यह सजा आईपीसी की धारा 302 और 218 में सुनाई गई है। अदालत ने इसी केस के तीन आरोपियों डीएसपी जसपाल सिंह, कांस्टेबल करनैल सिंह और हवलदार हरजी राम को बरी कर दिया है।
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दो और आरोपियों डीएसपी अवतार सिंह तथा एएसआई बचनदास को अदालत ने दो-दो वर्ष कैद की सजा सुना दी लेकिन इन दोनों को अदालत ने एक वर्ष के प्रोबेशन पर छोड़ दिया है। इसके अलावा दोनों दोषियों को 20-20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। दोषियों को यह सजा सीबीआई के जज एनएस गिल की अदालत ने सुनाई। बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट राजविंदर सिंह बैंस, सतनाम सिंह बैंस, पुश्पिंदर सिंह व सर्वजीत सिंह विर्क ने जिरह की।
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3 महीने हुई थे कुलदीप की शादी को
जिला रोपड़ के गांव लोदीमाजरा निवासी कुलदीप सिंह की उम्र घटना के समय 21 साल थी और वह थर्मल प्लांट घनौली में टेलीफोन आपरेटर था। जब उसकी मौत हुई तब उसकी शादी को महज तीन महीने हुए थे। वहीं गांव कोटला निहंग निवासी गुरमेल सिंह इंदौर में ट्रक ड्राइवर था। इन दोनों को आतंकवादी बता कर रोपड़ पुलिस ने 1 फरवरी 1993 की आधी रात करीब 1 बजे गांव भद्दल के नजदीक से गुजरती संगराओ नदी में पुलिस मुकाबला दिखाकर मार दिया था।

पत्नी व भाई की जुबानी पुरी कहानी

फर्जी एनकाउंटर में मारे गए गुरमेल सिंह की पत्नी सुखविंदर कौर कहती हैं कि वो दौर बहुत बुरा था। तीन गाड़ियों में पुलिस वाले अचानक ही उनके घर आ धमके। उस समय वह 8 माह की गर्भवती थी। उन्हें उसी हालत में दो छोटे बच्चों के साथ घसीटते हुए गाड़ी में डाल कर पुलिस वाले अपने साथ ले गए। सुखविंदर कौर के ससुर हरी सिंह सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे। उन्हें भी पुलिस उठा लाई।

गुरमेल के भाई गुरदेव सिंह ने एक स्थानीय नेता के जरिए पुलिस को संपर्क किया तो पुलिस ने गुरमेल सिंह को पेश करने के लिए दबाव डाला। गुरमेल सिंह इंदौर में ट्रक ड्राइवर का काम करते थे। स्थानीय नेता ने 400 रुपए देकर गुरदेव को इंदौर भेजा ताकि वह अपने भाई को रोपड़ लेकर आ सके। गुरदेव अपने भाई गुरमेल को लेकर रोपड़ आया। 

बकौल गुरदेव सिंह उसने उक्त स्थानीय नेता के जरिए तत्कालीन डीएसपी जसपाल सिंह के सामने अपने भाई को पेश किया। इसके बाद उनके परिवार को तो छोड़ दिया गया, लेकिन 6 जनवरी 1993 को गुरदेव सिंह को सीआईए रोपड़ ने उठा लिया। गुरदेव सिंह ने बताया कि दोनों भाइयों को सीआईए पुलिस ने अमानवीय ढंग से टॉर्चर किया।

कुछ दिन बाद गुरदेव सिंह को थाना सिटी रोपड़ भेज दिया गया। यहां से उसे लोहड़ी वाले दिन छोड़ा गया। इसके बाद 31 जनवरी और एक फरवरी की मध्य रात्रि को गांव भद्दल में संगराउ नदी जिसे भद्दल की नदी भी कहा जाता है, के पास एक फर्जी पुलिस मुकाबला दिखा कर गुरमेल सिंह और कुलदीप सिंह को मार दिया गया।

पुलिस ने बताई थी जो कहानी

पुलिस ने उस समय कहानी बनाई थी कि गुरमेल सिंह और कुलदीप सिंह को आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के चलते गिरफ्तार किया गया था। दोनों से पुलिस गांव भद्दल के पास संगराउ नदी में छुपा कर रखे हुए हथियार बरामद करवाने गई थी। जिस दौरान अज्ञात हमलावरों ने पुलिस पर हमला कर दिया। उस हमले में दोनों की मौत हो गई।  

पुलिस की कहानी में थे कई पेच
पुलिस उस हमले संबंधी अपनी ओर से गई फायरिंग में इस्तेमाल कारतूसों के खोल सबूत के तौर पर पेश नहीं कर सकी। पुलिस ने उस समय 160 फायर किए जाने की रिकार्ड में एंट्री नहीं की थी। पुलिस स्टेशन सदर रोपड़ में उक्त दोनों नौजवानों के खिलाफ 1993 में एफआईआर नंबर 8 दर्ज की गई थी।

उस उपरांत जब पुलिस ने संगराओ नदी में पुलिस मुकाबला दिखाया तो हथियार बरामदगी संबंधी अज्ञात हमलावरों खिलाफ 1 फरवरी 1993 को एफआईआर नंबर 9 दर्ज कर दी गई थी। हैरानी की बात यह रही कि पहले तो पुलिस उक्त दोनों नौजवानों की गिरफ्तारी संबंधी अपने रिकार्ड में नाम और पते दर्ज करती रही लेकिन मुकाबले में दोनों की मौत दिखाने के बाद लाशें परिवारों को देने के बजाय पुलिस ने अज्ञात बता कर खुद ही अंतिम संस्कार कर दिया था।

सजायाफ्ता को भी वीआईपी ट्रीटमेंट
अदालत द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद दोषी एसएचओ हरजिन्द्रपाल सिंह को पटियाला जेल भेज दिया गया। उसे जेल भेजने के लिए पुलिस द्वारा वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया। उसे जेल भेजने के लिए पुलिस की अलग विशेष गाड़ी मंगवाई गई। दोषी को गाड़ी तक पहुंचाने के लिए पुलिस ने मीडिया से छुपा कर दूसरे रास्ते से निकाल कर उसे गाड़ी में बिठाया।
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