फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Coronavirus, Lockdown, Migrant Workers Facing Problems in Ambala for Transport

प्रवासी मजदूरों का दर्द... ठेकेदारों ने हड़पी मेहनत की कमाई, अब भूखे पेट तो घर की याद आई

Thu, 28 May 2020 01:22 PM IST
खुशबू गोयल संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला
संवाद न्यूज एजेंसी, अंबाला Published by: खुशबू गोयल Updated Thu, 28 May 2020 01:22 PM IST
विज्ञापन
Coronavirus, Lockdown, Migrant Workers Facing Problems in Ambala for Transport
प्रवासी मजदूर - फोटो : अमर उजाला
देश के प्रवासी मजदूर आज भुखमरी का शिकार होकर घरों को वापस लौट रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिनकी बदौलत शहरों में आलीशान इमारतें खड़ी हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों के मालिक महंगी गाड़ियों पर फर्राटा भरते हैं।
विज्ञापन


फैक्ट्री चलाने वालों व ठेकेदारों की शाम रंगीन होती हैं। लेकिन लॉकडाउन के बाद अधिकतर मालिक अपने मजदूरों की ओर देखे तक नहीं रहे। इस कारण लाखों मजदूर अपने घरों को लौटने पर मजबूर है। ज्यादातर ठेकेदारों ने अपनी लेबर को उनके हक के पैसे तक नहीं दिए।
विज्ञापन


घर के रहे न घाट के...
मजदूरों को अपना गांव-घर तब याद आया, जब वह लॉकडाउन के कारण बेघर हो गए, न तो ठेकेदार के रहे और न ही सरकार और प्रशासन ने सहारा दिया। पंजाब-हिमाचल से कई किलोमीटर की यात्रा कर जब पैदल अंबाला पहुंचे तो उनके आंसू निकल पड़े। बस स्टैंड के बाहर डाला डेरा छावनी बस स्टैंड के बाहर बैठे दर्जनों श्रमिक पैदल पहुंचे।
विज्ञापन
विज्ञापन


बुधवार दोपहर भी बस स्टैंड के बाहर भीषण गर्मी के बीच दर्जनों प्रवासी मजदूरों का मेला लगा रहा। इन्हें उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और मध्यप्रदेश जाना है। अमर उजाला टीम ने घर लौट रहे ऐसे दर्जनों मजदूरों से बातचीत की तो वह अपनी किस्मत को कोसने लगे। अधिकतर ने कहा कि जहां काम करते थे, वहां से कुछ मदद नहीं मिली। वेतन तक नहीं दिया गया। मकान मालिक को भी रहम नहीं आया।

दाने-दाने के लिए मोहताज हो गए

हिमाचल के बद्दी से पैदल ही छावनी पहुंचे अनिल, अंशुल, राधे मोहन, रामेश्वर, जाघव, खेमचंद ने बताया कि वो केमिकल फैक्ट्री में काम करते हैं, जब काम बंद हुआ तो जो पैसा उनके पास जमा था, उससे खर्च चलाया लेकिन अब न तो पैसा बचा न खाने को कुछ है। इसलिए अब घर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। राम खिलावन ने बताया कि छह माह पहले बिहार से पैसे कमाने के लिए आए थे। उसके साथ 14 लोग और भी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से पत्थर तराशने  का काम करता था। दोस्तों के साथ सब कुछ ठीक चल रहा था। अचानक कोरोना ने कहर बरपा दिया और दाने-दाने के मोहताज हो गए।

3 दिनों में पहुंचे पंजाब से छावनी
ओवरब्रिज के नीचे बैठे दर्जनों मजदूरों को अमर उजाला टीम ने पूछा-कहां से आ रहे और कहां जाना है? इस पर एक ने कहा की हम पंजाब के मंडी गोबिंदगढ़ से आए हैं। 3 दिन पहले पंजाब से बिहार जाने के लिए साथियों के साथ पैदल निकले थे। तब पास में 900 रुपये थे, साथ में 17 लोग और भी हैं। पैसे तो आते समय खाने पीने में खर्च हो गए। रास्ते में कोई ट्रक वाला बैठा लेता था। विकास, नीतीश, ओमप्रकाश व उसके साथ के दर्जनों मजदूरों ने कहा कि हम यही सोच रहे हैं कि जल्द से जल्द कैसे घर पहुंचे।

ठेकेदार ने नहीं दिया पैसा
मिथलेश, रंजीत, जतिन, चंदन, चेतन आदि श्रमिकों ने बताया कि वे दिहाड़ी मजदूर का काम करते है। बिहार के सहरसा जाना है। रंजीत ने कहा कि वो सभी लोग ठेकेदार के अधीन काम करते थे। काम बंद होने के कारण कुछ दिन तो ठेकेदार ने उन्हें अपने पास रखा लेकिन फिर उसने कहा कि अब घर चले जाओ।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed