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मजदूरों का दर्दः सामान पैक कर लिया है, सोचा था कल अपने घर रवाना हो जाएंगे...टूट गई उम्मीद

Wed, 15 Apr 2020 11:06 AM IST
खुशबू गोयल रिशु राज सिंह, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, चंडीगढ़ Published by: खुशबू गोयल Updated Wed, 15 Apr 2020 11:06 AM IST
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Coronavirus, Lockdown, Curfew, Migrant Workers Staying in Shelter Homes Feeling Hopeless
शेल्टर होम में रहते मजदूर - फोटो : अमर उजाला
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को जैसे ही लॉकडाउन को 3 मई तक बढ़ाने की घोषणा की, हजारों मजदूरों का घर जाने का सपना टूट गया। परिवार सहित बद्दी से पैदल चलकर चंडीगढ़ पहुंचे 28 वर्षीय मनमोहन सिंह को उम्मीद थी कि 14 को लॉकडाउन खत्म हो जाएगा। 15 अप्रैल को ट्रेनें चल पड़ेंगी और वह अपने गांव चले जाएंगे। वह पिछले 15 दिनों से मलोया के कम्युनिटी सेंटर में बने शेल्टर होम में रह रहे हैं।यहां ऐसे 47 लोग हैं, जो सुबह 10 बजे बड़ी आस के साथ शेल्टर होम में टकटकी लगाए टीवी को देखते रहे लेकिन उदासी ही हाथ लगी।
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वहीं, 19 वर्षीय ओसियार यूपी के गोरखपुर के रहने वाले हैं और लुधियाना के शेरपुर में दिहाड़ी मजदूरी करते थे। लॉकडाउन के बाद काम बंद हुआ तो पैसों की तंगी हो गई और मकान मालिक ने निकाल दिया। गांव जाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था तो वह पैदल गोरखपुर के लिए चल पड़े। चंडीगढ़ पहुंचने पर उन्हें शेल्टर में लाया गया। अमर उजाला से बातचीत के दौरान जब उन्हें  बताया गया कि लॉकडाउन को बढ़ा दिया गया है, अब वह तीन मई के बाद ही घर जा सकेंगे। इस पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ, उनका जवाब था कि...अभी यह पक्का नहीं है।
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उन्होंने फिर पूछा कि क्या ट्रेनें भी बंद रहेंगी। ओसियार का कहना है कि शेल्टर होम में प्रशासन की तरफ से खाना-पीना सबकुछ मिल रहा है, लेकिन घर जाना है। 20 वर्षीय अमर भी पिछले 15 दिनों से शेल्टर में हैं और 15 अप्रैल का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि बुधवार से ट्रेनें चल जाएंगी, इसके लिए बैग भी पैक कर लिए थे लेकिन लॉकडाउन बढ़ गया है। अब इंतजार करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।
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चाय-बिस्किट, पराठा से लेकर रात के खाने तक की व्यवस्था

प्रवासी मजदूरों के लिए बनाये गए शेल्टर में करीब 100 लोगों के रहने की व्यवस्था है। वर्तमान में 47 मजदूर यहां रह रहे हैं, जिनमें कई परिवार भी हैं। मजदूरों को सुबह 8 बजे चाय बिस्किट, पराठा दिया जाता है। इसके कुछ देर बाद नाश्ते में खिचड़ी और केला दिया जाता है। इसके बाद दोपहर करीब एक बजे समय चावल, दाल और सब्जी दी जाती है।

शाम 4 फिर चाय और बिस्किट दिया जाता है और फिर रात करीब 8 बजे खाना दिया जाता है। इसमें दो रोटी, चावल, दाल और सब्जी होती है। कम्यूनिटी सेंटर में हर समय चार पुलिसकर्मी मौजूद रहते हैं। इसके अलावा यहां पर साफ-सफाई की भी अच्छी व्यवस्था है। दिन में तीन बार पूरे शेल्टर को सैनिटाइज किया जाता है। इसके अलावा मजदूरों के नहाने और कपड़े धोने की भी व्यवस्था की गई है।

मजदूर रोजाना करते हैं योग
शेल्टर होम में रहने वाले मजदूरों के लिए रोजाना सुबह योग क्लास लगाई जाती है। एक्सपर्ट इन्हें योग कराते हैं और मेडिटेशन करना भी सिखाते हैं। योग सभी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। लॉकडाउन के बढ़ने से मजदूरों का मनोबल काफी गिर गया है, ऐसे में इन्हें मोटिवेट करने के लिए मोटिवेशनल सेशन का भी आयोजन किया जा रहा है।

सोचा था 10 दिन में पहुंच जाएंगे घर

यहां खाना तो मिल रहा है लेकिन कब तक अकेले रहेंगे। उम्मीद थी 15 अप्रैल को ट्रेन चलेगी तो 16 को घर में होंगे। हम चार लोग लुधियाना से निकले थे। करीब ढई दिन में लुधियाना से चंडीगढ़ पहुंचे। सोचा था कि साइन बोर्ड के सहारे 10 दिन में गांव पहुंच ही जाएंगे लेकिन चंडीगढ़ में ही रोक लिया गया।
- अमर (20), मजदूर

कोई दिक्कत नहीं लेकिन अच्छा नहीं लग रहा
यहां कोई दिक्कत नहीं है लेकिन अच्छा नहीं लग रहा है। ट्रेन कब चलेगी, हम घर कब जाएंगे। यहां 15 दिन हो गए हैं रहते हुए, फिर ट्रेन बंद कर दिया है तो समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। लेकिन इंतजार करने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है।
- ओसियार (19), मजदूर

इंतजार करेंगे, जब ट्रेन चलेगी तब जाएंगे
इंटरनेट और लोगों से सुना था कि गाड़ियां चल पड़ी हैं लेकिन जब चंडीगढ़ पहुंचे तो पता चला कि ट्रेन नहीं चली है। हम करीब आधा दिन सेक्टर-20 के मंदिर में रहे। चंडीगढ़ में लोग काफी मददगार हैं। यहां पर भी हमें कोई समस्या नहीं है। अब इंतजार करेंगे कि ट्रेन चले तभी घर जा पाएंगे।
- मनमोहन सिंह (28), मजदूर

मौका मिलेगा तो चले जाएंगे
जैसे ही मौका मिलेगा हम यहां से चले जाएंगे। यूपी के बदायूं जाना है, परिवार में 10 लोग हैं। हम सभी बद्दी से पैदल यहां तक पहुंचे हैं इसके बाद इस शेल्टर में लाया गया है। यहां रहते हुए कई दिन हो चुके हैं और और कई दिन रहना है। अन्य कोई रास्ता नहीं है।
-आकाश (18), मजदूर
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