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Chandigarh News: फ्लैट के कब्जे में देरी होने पर उपभोक्ता आयोग ने खरीदार को एक लाख अदा करने के दिए आदेश
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चंडीगढ़। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने तय समय पर फ्लैट का कब्जा न देने पर ओमेक्स चंडीगढ़ एक्सटेंशन डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड पर एक लाख रुपये याचिकाकर्ता ग्राहक को अदा करने के आदेश दिए हैं। आयोग ने यह आदेश शहर की रहने वाली डॉ. रेणुका शर्मा और रत्ती शर्मा की ओर से दायर की गई शिकायत पर सुनाया है। साथ ही आयोग ने 45 दिन के भीतर कंपनी को भौतिक रूप से फ्लैट का कब्जा याचिकाकर्ता ग्राहक को देने के आदेश दिए हैं।
पीड़ित पक्ष ने वकील करण सिंगला के माध्यम से आयोग के समक्ष दायर शिकायत में बताया कि उन्होंने उक्त बिल्डर से उसके ‘द लेक’ प्रोजेक्ट के तहत एक फ्लैट खरीदा था। फ्लैट की कुल कीमत 82.05 लाख रुपये तय की गई थी। पीड़ित ग्राहक के आरोपों के तहत बिल्डर (विपक्षी पक्ष) ने उन्हें आश्वासन दिया था कि बुकिंग की तारीख (6 सितंबर, 2014) के 42 महीने (6 सितंबर, 2018 तक) के भीतर फ्लैट का कब्जा दे दिया जाएगा। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आरोपी पक्ष ने प्रोजेक्ट के निर्माण को जारी रखने में विफल रहा और अगस्त 2019 के बाद लगभग चार वर्षों तक कोई और मांग नहीं की। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से आगे कहा गया कि भले ही और कोई मांग नहीं की गई हो, लेकिन उनकी तरफ से पहले ही फ्लैट के लिए 68 लाख 21 हजार 482 रुपये की राशि चुका दी गई थी। इसके बाद भी लगभग आठ साल और नौ महीने से अधिक समय निकलने के बाद भी आरोपी बिल्डर की ओर से उन्हें फ्लैट का कब्जा सौंपने में विफल रहा। वहीं, आरोपी बिल्डर की ओर से आयोग में आरोपों से इनकार किया गया। आरोपी पक्ष की ओर से दिए गए तर्क में कहा गया कि यूनिट का कब्जा देने में देरी कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण हुई। मामले में सामने आए तथ्यों को जांचने और दलीलों को सुनने के बाद आयोग ने याचिकाकर्ता ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बिल्डर को सेवा में कोताही बरतने का दोषी मानते हुए हर्जाना लगाया है।
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पीड़ित पक्ष ने वकील करण सिंगला के माध्यम से आयोग के समक्ष दायर शिकायत में बताया कि उन्होंने उक्त बिल्डर से उसके ‘द लेक’ प्रोजेक्ट के तहत एक फ्लैट खरीदा था। फ्लैट की कुल कीमत 82.05 लाख रुपये तय की गई थी। पीड़ित ग्राहक के आरोपों के तहत बिल्डर (विपक्षी पक्ष) ने उन्हें आश्वासन दिया था कि बुकिंग की तारीख (6 सितंबर, 2014) के 42 महीने (6 सितंबर, 2018 तक) के भीतर फ्लैट का कब्जा दे दिया जाएगा। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि आरोपी पक्ष ने प्रोजेक्ट के निर्माण को जारी रखने में विफल रहा और अगस्त 2019 के बाद लगभग चार वर्षों तक कोई और मांग नहीं की। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से आगे कहा गया कि भले ही और कोई मांग नहीं की गई हो, लेकिन उनकी तरफ से पहले ही फ्लैट के लिए 68 लाख 21 हजार 482 रुपये की राशि चुका दी गई थी। इसके बाद भी लगभग आठ साल और नौ महीने से अधिक समय निकलने के बाद भी आरोपी बिल्डर की ओर से उन्हें फ्लैट का कब्जा सौंपने में विफल रहा। वहीं, आरोपी बिल्डर की ओर से आयोग में आरोपों से इनकार किया गया। आरोपी पक्ष की ओर से दिए गए तर्क में कहा गया कि यूनिट का कब्जा देने में देरी कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न अप्रत्याशित परिस्थितियों के कारण हुई। मामले में सामने आए तथ्यों को जांचने और दलीलों को सुनने के बाद आयोग ने याचिकाकर्ता ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बिल्डर को सेवा में कोताही बरतने का दोषी मानते हुए हर्जाना लगाया है।
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