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वोटों का गणित: पंजाब में राजनीति और खेती के बीच है गहरा संबंध, सियासत की दिशा तय कर देते हैं खेत

Mon, 29 Apr 2024 02:34 PM IST
निवेदिता वर्मा सुशील कुमार, संवाद, सुनाम ऊधम सिंह वाला (पंजाब)
सुशील कुमार, संवाद, सुनाम ऊधम सिंह वाला (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 29 Apr 2024 02:34 PM IST
सार

पंजाब में इस बार गेहूं की फसल ने किसानों को मालामाल कर दिया है। मालवा में 24 से 28 क्विंटल प्रति एकड़ जमीन से गेहूं की फसल प्राप्त हो रही है।

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Connection between politics and agriculture in Punjab
पंजाब में खेती और राजनीति में गहरा कनेक्शन - फोटो : फाइल

विस्तार

पंजाब में खेती व सियासत के दरमियान गहरा कनेक्शन है। यहां के खेतों में केवल फसल के बीज नहीं बोए जाते हैं, बल्कि यहां के खेतों में राजनीति के बीज भी अंकुरित होते हैं। मालवा की खेती जमीन सूबे की आर्थिकता के अलावा पंजाब की सियासी तस्वीर भी तय करती है। इन्हीं खेतों में फसलें लहलहाती हैं और इन्हीं खेतों से सियासी लहरें उठती हैं। 
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इस बार गेहूं की फसल ने किसानों (कुछ इलाकों को छोड़कर) को मालामाल कर दिया है। ऐसे में उम्मीद बंधी है कि लोकतंत्र के महापर्व के दौरान ज्यादा से ज्यादा मतदान करके मालवा के लोग पिछले रिकॉर्ड को जरूर तोड़ेंगे।
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मालवा क्षेत्र में इस बार मौसम के मेहरबान रहने के चलते गेहूं की बंपर पैदावार हुई है। लंबी अवधि तक सर्दी रहने से पंजाब कृषि विभाग ने इस बार प्रदेश में कुल 162 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया है। इन अनुमानों के आधार पर, राज्य खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग ने खरीद लक्ष्य 132 लाख टन तय किया है, लेकिन इस बार गेहूं का उत्पादन 182.57 लाख के सर्वकालिक उच्च स्तर के पास पहुंच सकता है। 
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हालांकि, कुछ खास इलाकों में ओलावृष्टि की वजह से नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन औसतन फसल की पैदावार में बीस फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है।  नीलोवाल के किसान दर्शन सिंह, छाजली के दीदार सिंह व छाजला के दरबारा सिंह ने बताया कि गेहूं की क्वालिटी भी उच्च स्तर की है और निजी खरीददार भी गेहूं को हाथों हाथ ले रहे हैं।

मालवा में इस बार गेहूं के सीजन में खेती की दशा सुधरी हुई दिखाई दे रही है, तो ऐसे में सियासत का रुख भी सकारात्मक दिशा की ओर मुड़ सकता है। भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के प्रदेश अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि सियासत, खेती की दशा करती आ रही है। फिर खेती व किसान भी सियासत का रुख मोड़ने से पीछे नहीं हटेंगे।


बढ़ सकता है मतदान
चुनाव आयोग लगातार मतदाताओं को जागरूक कर ज्यादा से ज्यादा मतदान करने के प्रेरित कर रहा है। पहले दो चरणों में कम मतदान होने से आयोग की चिंता बढ़ी है, लेकिन पंजाब में इस बार मतदान बढ़ने की आस है। संगरूर संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव में मात्र 45.3% मतदान हुआ था। यहां सबसे कम मतदान 1991 में हुआ था, जब राज्य में आतंकवाद का दौर था और केवल 11% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। उसके बाद हुए सात आम चुनावों और उपचुनावों में मतदान प्रतिशत 62.5% और 77.2% के बीच रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 72.4% मतदान हुआ था।
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