Punjab Election 2022: इस बार चुनावी मुद्दा बनेगा मिलबंदी, 11 साल से परेशान मिलर्स ने किया फैसला
मिलें बंद होने के कारण मिलर्स के साथ ही सरकार को भी अब तक हजारों करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हो चुका है। मिल बंद होने की शुरुआत वर्ष 2007-08 से हुई थी।
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पंजाब में 2022 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस बार इन चुनावों में बेअदबी, नशा और अवैध खनन के अलावा एक ओर चुनावी मुद्दा बनने की तैयारी में है। 11 साल पहले हुई 400 मिल बंदी से परेशान मिलर्स जोर शोर से इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी कर रहे हैं। 2007-08 में आई धान की पीएयू 201 किस्म के कारण ये मिलें सरकार के द्वारा बंद की गई थीं। सरकारें आती रही जाती रहीं लेकिन सुनवाई नहीं हुई। अब चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर से मिलर्स ने मोर्चा संभाल लिया है। मिलें बंद होने के कारण मिलर्स के साथ ही सरकार को भी अब तक हजारों करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हो चुका है।
मिल बंद होने की शुरुआत वर्ष 2007-08 से हुई थी। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित पीएयू 201 की काश्त के लिए किसानों को बडे़ पैमाने पर उत्साहित किया गया था। पीएयू के वैज्ञानिकों के अनुसार धान की यह किस्म प्रचलित किस्मों में बेहतर पैदावार देने वाली थी, लेकिन इस किस्म के साथ सबसे बड़ी समस्या इसकी अन्य किस्मों की तुलना में अधिक ब्राकेज तथा डैमेज डिस्कलर की मात्रा अधिक होना था।
खरीद एजेंसियों ने धान की इस किस्म को पंजाब के राइस मिलर्स को भंडारण करने के लिए दे दिया। लेकिन इसमें से चावल भारतीय खाद्य निगम के मानदंडों के अनुसार नहीं निकला और खरीद नहीं की गई। यह सारा धान मिलों में ही पड़ा रहा। समय के साथ ही अधिकांश धान खराब हो गया। जिसके कारण धान के वजन में कमी आ गई। इसका सारा घाटा मिलर्स के सिर पर मढ़ दिया गया। एफसीआई ने इसके लिए मिलर्स को जिम्मेदार ठहराते हुए मिलर्स को ब्लैक लिस्ट कर दिया और मिलों पर ताला लगवा दिया। तब से लेकर आज तक इस मामले में कोई फैसला नहीं किया गया है। अब नई सरकार से मिलर्स को कुछ उम्मीद जगी है कि उनकी मांगों पर अमल किया जाएगा। मिलर्स के अनुसार यदि यह सरकार भी उनकी मांगों पर अमल नहीं करेगी तो 2022 में होने वाले चुनाव में यह चुनावी मुद्दा बनकर उभरेगा।
सीओएस ने दिया था समाधान
इस मामले में केंद्र सरकार के द्वारा उच्च स्तरीय कमेटी आफ सेक्रेटीज (सीओएस) ने भी अपनी सिफारिशों में कहा था कि पीएयू 201 के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई केंद्र और राज्य सरकार आपस में मिलकर वहन करें। राइस मिलर्स पर इस नुकसान को पूरा करने का भार नहीं डाला जा सकता।
इस पूरे मामले में एजेंसियों की गलती है। धान की पीएयू 201 की कमियां जानते हुए भी उन्होंने इसकी खरीद की। हैरानी की बात है कि खरीद से पहले न तो इसकी सैंपलिंग की गई और न ही लैब टेस्ट किया गया। यदि यह सब हुआ होता तो इस किस्म की खरीद ही नहीं शुरू हो पाती। - देवेंद्र बंसल, प्रोपराइटर, गोल्डन राइस एंड एग्रो प्रोडक्ट्स, मलेरकोटला यह पूरा मामला सीओएस की सिफारिशों के अनुसार निपटाया जाना चाहिए। 11 सालों से जो उनके साथ अन्याय हो रहा है उसकी भरपाई करनी चाहिए। इस मामले में जिन मिलर्स को ब्लैक लिस्टेड किया गया है, उन्हें दोबारा काम करने की अनुमति मिलनी चाहिए। साथ ही जिन मिलर्स पर झूठे केस किए गए हैं, वे भी सरकार को वापस लेने चाहिए। - राजपाल, प्रोपराइटर, श्री दुर्गा राइस मिल, बठिंडा, रामामंडी