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Guillain-Barré syndrome: चंडीगढ़ पीजीआई का शोध... अब बिना छुए हो सकेगा GBS पीड़ित बच्चों का इलाज

Sat, 13 Jul 2024 07:10 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो Updated Sat, 13 Jul 2024 07:10 AM IST
सार

गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस) एक दुर्लभ विकार है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली तंत्रिका को नुकसान पहुंचाती है। तंत्रिकाओं को नुकसान के कारण मांसपेशियों में कमजोरी और कभी-कभी पक्षाघात होता है। हालांकि, इसका कारण पूरी तरह से समझा नहीं गया है, लेकिन यह सिंड्रोम अक्सर वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण के बाद होता है।

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Children suffering from GBS will be treated without touching them
चंडीगढ़ पीजीआई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक ऐसी बीमारी जिससे पीड़ित बच्चे के लिए एक कदम चलना मुश्किल होता है। उसका इलाज और पुनर्वास वर्षों चलता है। ऐसी स्थिति में उस बच्चे को तय समय के अंतराल पर अस्पताल लाना बेहद कठिन होता है। बात हो रही है गिलियन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस) का, जिससे ग्रस्त बच्चों के इलाज की कठिन राह को पीजीआई के विशेषज्ञों ने बेहद आसान बना दिया है। 

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पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर के विशेषज्ञों ने शोध कर इस समस्या का समाधान निकाला है, जिसके अंतर्गत उन बच्चों को हर तीन महीने पर दिए जाने वाले फॉलोअप के लिए उन्हें पीजीआई बुलाने के बजाय टेली कंसल्टेशन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से परामर्श दिया जा रहा है।
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सेंटर के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अरुण बंसल ने बताया कि ऐसे बच्चों का पुनर्वास लंबा चलता है। मानक के अनुसार उन्हें हर तीन महीने पर फॉलोअप के लिए बुलाया जाता है लेकिन उनकी परेशानी को देखकर उसका सरल माध्यम उपलब्ध कराने पर विचार किया गया। इसके लिए ऐसे 66 बच्चों पर शोध किया गया, जिसमें 36-36 के दो ग्रुप बनाए गए। एक ग्रुप में शामिल बच्चों को मानक के अनुसार हर तीन महीने पर पीजीआई बुलाकर फॉलोअप दिया गया, जबकि दूसरे ग्रुप में शामिल बच्चों को टेली कंसल्टेशन और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए परामर्श दिया गया। तय समय सीमा के बाद दोनों ग्रुप में शामिल बच्चों की रिकवरी जांची गई। दोनों ही ग्रुप के बच्चों की रिकवरी बराबर रही।

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अस्पताल आने की अनिवार्यता हुई दूर

इस शोध के परिणाम के आधार पर उन बच्चों को फॉलोअप के लिए तीन महीने पर अस्पताल आने की अनिवार्यता से मुक्ति मिली। अब डॉक्टर बच्चों के माता-पिता के निर्णय पर यह छोड़ देते हैं कि वे अपने बच्चे को अस्पताल लाएंगे या नहीं क्योंकि अब इस शोध के आधार पर उन बच्चों को घर रहते हुए परामर्श दिया जा रहा है। इस शोध को मई 2024 में इंडियन जरनल ऑफ पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित किया गया है।

लक्षणों पर करें गौर

अंगुलियों, पैर की उंगलियों, टखनों या कलाइयों में सुई चुभने जैसा एहसास होना।
पैरों में कमजोरी जो शरीर के ऊपरी हिस्से तक फैल जाती है।
अस्थिर चाल या चलने में असमर्थ होना या सीढ़ियां चढ़ने में असमर्थ होना।
बोलने, चबाने या निगलने सहित चेहरे की गतिविधियों में परेशानी होना।
दोहरी दृष्टि या आंखों को हिलाने में असमर्थता।
तीव्र दर्द, चुभने वाला या ऐंठन जैसा हो सकता है तथा रात में अधिक बढ़ सकता है।
मूत्राशय पर नियंत्रण या आंत्र कार्य में परेशानी।
तेज हृदय गति।
निम्न या उच्च रक्तचाप।
सांस लेने में तकलीफ।

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