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चंडीगढ़ का गार्जियन चाहिए ः प्रो. एके ग्रोवर
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चंडीगढ़। केंद्रीय विद्यालय मेरठ से हायर सेकेंडरी की पढ़ाई करने के बाद वर्ष 1968 में मैं चंडीगढ़ आया। तब यहां चीफ कमिश्नर एमएस रंधावा हुआ करते थे। उस दौरान पंजाब व हरियाणा में पढ़ाई के लिए उच्च संस्थान नहीं थे। तब कॉलेज पंजाब विश्वविद्यालय से जुड़े थे। मैंने भी इसी में एडमिशन लिया था। उस दौरान ट्राइसिटी की आबादी महज तीन लाख थी।
पढ़ाई के बाद वर्ष 1991 से 94 तक यहां आतंकवाद काफी हावी रहा। अच्छे टीचर विश्वविद्यालय व अन्य संस्थानों को चाहिए थे लेकिन डर के कारण वह यहां नौकरी नहीं कर पा रहे थे। दो शिक्षकों की हत्या तो उनके घर में घुसकर कर दी गई। आतंकवाद चरम पर था, जो 1994 के आखिरी महीनों में कम हुआ। उसके बाद यहां के विद्यार्थी पढ़ाई के लिए बाहर जाने लगे। कुछ समय बीता तो स्थितियां सामान्य होना शुरू हुईं और लोग यहां नौकरी के लिए आने लगे और जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। आज ट्राइसिटी की आबादी 15 लाख से अधिक हो गई है। नौकरी करने जो लोग यहां आ रहे हैं, उन्हें रहने के लिए जगह तक नहीं मिल रही। ऐसे में लोगों को पंचकूला व मोहाली या अन्य जगह शरण लेनी पड़ रही है। मैं खुद पंचकूला में रह रहा हूं। चंडीगढ़ के स्थानीय लोग बाहर हैं, जो नौकरी पूरी होने के बाद यहां आते हैं। इस शहर का गार्जियन कोई नहीं रहा। आज इसकी जरूरत है। बढ़ रहे ट्रैफिक को कम करने की जरूरत है। शहर से हमदर्दी रखने वालों की जरूरत है। अधिकारी भी इस ओर कदम नहीं उठाते। वह भी आते हैं और चले जाते हैं। इस शहर से प्यार करना होगा।
- प्रो. एके ग्रोवर, पूर्व वीसी पंजाब विश्वविद्यालय
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पढ़ाई के बाद वर्ष 1991 से 94 तक यहां आतंकवाद काफी हावी रहा। अच्छे टीचर विश्वविद्यालय व अन्य संस्थानों को चाहिए थे लेकिन डर के कारण वह यहां नौकरी नहीं कर पा रहे थे। दो शिक्षकों की हत्या तो उनके घर में घुसकर कर दी गई। आतंकवाद चरम पर था, जो 1994 के आखिरी महीनों में कम हुआ। उसके बाद यहां के विद्यार्थी पढ़ाई के लिए बाहर जाने लगे। कुछ समय बीता तो स्थितियां सामान्य होना शुरू हुईं और लोग यहां नौकरी के लिए आने लगे और जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। आज ट्राइसिटी की आबादी 15 लाख से अधिक हो गई है। नौकरी करने जो लोग यहां आ रहे हैं, उन्हें रहने के लिए जगह तक नहीं मिल रही। ऐसे में लोगों को पंचकूला व मोहाली या अन्य जगह शरण लेनी पड़ रही है। मैं खुद पंचकूला में रह रहा हूं। चंडीगढ़ के स्थानीय लोग बाहर हैं, जो नौकरी पूरी होने के बाद यहां आते हैं। इस शहर का गार्जियन कोई नहीं रहा। आज इसकी जरूरत है। बढ़ रहे ट्रैफिक को कम करने की जरूरत है। शहर से हमदर्दी रखने वालों की जरूरत है। अधिकारी भी इस ओर कदम नहीं उठाते। वह भी आते हैं और चले जाते हैं। इस शहर से प्यार करना होगा।
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- प्रो. एके ग्रोवर, पूर्व वीसी पंजाब विश्वविद्यालय