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अमर उजाला अपराजिता: घाटी में महिलाओं ने चलाई साइकिल, बोलीं- कश्मीर सुरक्षित, खूबसूरत अनुभव को साझा किया

Sun, 16 Oct 2022 10:11 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 16 Oct 2022 10:11 PM IST
सार

सेना के जवानों ने paninwath.com नाम से वेबसाइट बनाई है।वहीं twitter.com/awazebaramulla नाम से ट्विटर पर पेज भी बनाया है। जहां कश्मीर की सुंदरता और अमन चैन को देखा जा सकता है और लोगों की मानसिकता को बदला जा सकता है।

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Chandigarh Women ride cycles in Kashmir Valley
अमर उजाला अपराजिता कार्यक्रम में शामिल हुईं साइकिलिस्ट महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

एक ओर झेलम, दूसरी तरफ पहाड़ और बारिश की फुहारों के बीच साइकिल से 56 किमी का सफर। यह यात्रा हमारे जीवन के सबसे यादगार पलों में से एक है। ये कहना है कश्मीर के बारामुला से कमान अमन सेतु तक साइकिल चलाकर घाटी में अमन-चैन और महिला सशक्तीकरण का संदेश देने वाली चंडीगढ़ की महिलाओं का। इन महिलाओं ने रविवार को अमर उजाला अपराजिता कार्यक्रम के तहत कश्मीर यात्रा के अपने अनुभव को साझा किया। 

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उन्होंने कहा कि कश्मीर पूरी तरह सुरक्षित है। लोगों ने आतंकवाद को लेकर मानसिकता बना ली है। सुरक्षित रहना और सुरक्षित करना दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं। लोग सुरक्षित रहना चाहते हैं तो किसी को सुरक्षित करने की जरूरत ही नहीं है। इसके लिए बस सौहार्दपूर्ण माहौल चाहिए। सेना के जवानों ने paninwath.com नाम से वेबसाइट बनाई है। वहीं twitter.com/awazebaramulla नाम से ट्विटर पर पेज भी बनाया है। जहां कश्मीर की सुंदरता और अमन चैन को देखा जा सकता है और लोगों की मानसिकता को बदला जा सकता है।  
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शुक्रिया! आपकी वजह से हमें साइकिल चलाने का मौका मिला
आर्किटेक्ट रुचि लखानी ने कहा कि मेरे साथ 11 साल की एक लड़की भी साइक्लिंग कर रही थी। उसे देखकर उत्साह बढ़ गया। सोशल मीडिया कंसल्टेंट डॉ. अनु दुआ ने कहा कि मैं साइक्लिंग नहीं करती थी लेकिन महिलाओं का ग्रुप मिला तो अब इसे जीवन का हिस्सा बना लिया है। हमने कश्मीर के लोगों को संदेश दिया कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने की जरूरत है। 

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Chandigarh Women ride cycles in Kashmir Valley
साइकिलिस्ट महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला

कश्मीर में सबकुछ ठीक है। सरकारी कर्मचारी रितिका शर्मा ने कहा कि एक दिन पहले वह श्री हेमकुंड साहिब से वापस लौटी थीं। थकान के बावजूद जाने का उत्साह इतना अधिक था कि अगले दिन फ्लाइट पकड़ने पहुंच गईं। शिक्षक नेहा ने कहा कि कश्मीर में एक लड़की ने मुझसे कहा कि आपकी वजह से हमें साइकिल चलाने का मौका मिला। वास्तव में यह क्षण हमारे लिए गर्व करने वाला था। 
 
सीने में अब भारत, सेना और कश्मीर धड़क रहे 
मोहाली से आईं कोमलप्रीत ने बताया कि वह न्यूजीलैंड में रहती हैं। इस यात्रा के बाद दिल में बस भारत, सेना और कश्मीर धड़क रहे हैं। शिक्षक अंकिता पासी ने बताया कि यह मेरी पहली इतनी लंबी यात्रा थी। यात्रा के 15 किमी बाद तेज बारिश होने लगी। सेना की ओर से इतना सहयोग था कि हम लक्ष्य पर जाकर ही रुके। हमारे साथ बुर्के में भी लड़कियां साइकिल चला रहीं थीं। थिएटर की शिक्षक अर्पिता गुप्ता ने कहा कि घर के बड़ों से जब अनुमति मिली तो लगा कि अब कश्मीर की महिलाओं के लिए कुछ संदेश देना है। जब वापस लौटकर आई तो स्कूल की ओर से सम्मानित किया गया जो गर्व का क्षण था।

दो बच्चियों को छोड़कर गई, पति ने किया पूरा सहयोग  
निजी कंपनी में सलाहकार अनु ने बताया कि मैं फ्लाइट में पहली बार बैठी थी। अपनी दो बच्चियों को छोड़कर जाना मेरे लिए चुनौती भरा था। पति ने पूरा सहयोग किया। आर्ट प्रोफेसर अदिति ने बताया कि रात को साढ़े 12 बजे हमें साइकिलें मिली थीं। 10 किमी की यात्रा काफी चैलेंजिंग थी फिर राह आसान हो गई। शिक्षक मनप्रीत कौर ने कहा मेरा यह पहला अनुभव था। कई महिलाएं तो डेढ़ लाख तक की साइकिल लेकर आईं थीं। इससे लग रहा था कि महिला सशक्तीकरण को लेकर उनका जज्बा कितना अधिक है। कश्मीरियों के साथ बारिश में भंगड़ा भी किया। हरियाणा में सरकारी कर्मचारी निलिमा ने कहा कि मैं इतनी उत्साहित थी कि मैंने बारिश में जय हो गाने पर प्रस्तुति भी दी।  

Chandigarh Women ride cycles in Kashmir Valley
अमर उजाला अपराजिता कार्यक्रम में शामिल हुईं साइकिलिस्ट महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला

63 साल की उम्र में भी जोश हाई 
63 वर्षीय वीनू पासी और 54 वर्षीय रेखा मित्तल ने राइड पूरी करके बताया कि उम्र बस एक नंबर है। दिल में बस कुछ करने का उत्साह होना चाहिए। वीनू पासी ने बताया कि यात्रा के दौरान तीन बार उनकी साइकिल खराब हुई। सेना के जवानों ने कहा कि ट्रक में बैठ जाएं लेकिन हिम्मत नहीं हारी। रेखा मित्तल ने कहा कि चंडीगढ़ की सड़कों और कश्मीर की सड़कों में अंतर है फिर भी एक भी बार बिना रुके यात्रा पूरी की।

परिवार ने मना किया तो जबरदस्ती गई
पंजाब में निजी कंपनी में कार्यरत कविता अरोड़ा ने कहा कि पिछली बार परिवार ने टूर पर जाने से मना किया। मुझे डॉक्टर ने भी कम साइकिल चलाने को कहा है लेकिन मैं जबरदस्ती गई। वहां लोगों के समर्थन से यात्रा पूरी कर मैंने अपना आत्मविश्वास बढ़ाया। भेल में काम करने वालीं दीपा वाजपेयी ने कहा कि पूरे क्षेत्र में सुरक्षा के लिए तैनात जवान तालियां बजाकर हमारा उत्साह बढ़ा रहे थे। बच्चे कहा रहे थे हमारे घर आइए। यह अनुभव कभी नहीं भूल सकती। प्रोफेसर एकता चौहान ने कहा कि मेरे पिता वर्ष 1987-88 में कश्मीर में पदस्थ थे। उनके स्थानांतरण के बाद वहां कभी नहीं गए। इस बार गए तो लगा कि वापस बचपन लौट आया। वहां के लोग भी हमें देखकर काफी उत्साहित थे।

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