चंडीगढ़ में फैलता नशे का जाल: युवाओं को चंद रुपयों का लालच देकर जुर्म की दुनिया में धकेल रहे तस्कर
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2017-19 के बीच नशा करने से 2300 से ज्यादा लोगों की मौत की हुई है। मरने वालों में 30-45 आयु वर्ग के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।
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विस्तार
चंडीगढ़ जिला अदालत में प्रतिदिन औसतन 30 केस एनडीपीएस एक्ट के आते हैं। इनमें सबसे ज्यादा युवाओं की संख्या होती है जिनकी उम्र 18 से 24 साल के बीच है। पूछताछ में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि तस्कर युवाओं को सिर्फ 500 से एक हजार रुपये के लालच नशे के दलदल में धकेल रहे हैं। एनडीपीएस एक संगीन अपराध है। नशा करने वाला व्यक्ति नशे के बाद चोरी, डकैती, हत्या और रेप जैसे संगीन अपराधों को अंजाम दे सकता है। पुलिस को नशा बेचने वाले तस्करों को पकड़ना चाहिए। युवाओं को स्कूल कॉलेज में कैंप लगाकर जागरूक करना चाहिए।
पांच वर्षों का आंकड़ा देखें तो अदालत में हजारों केस सामने आए हैं। कई केसों में तो मामला निस्तारित हो गया। 52 प्रतिशत मामले अभी भी लंबित हैं। युवाओं में बढ़ते नशे की लत को देखते हुए कोर्ट भी सख्त हो गई है। ऐसे मामलों में अब कोर्ट आसानी से जमानत नहीं मिलती है। जिला कोर्ट के वकील मनोज कुमार ने बताया कि एनडीपीएस एक्ट के लगभग 60 प्रतिशत मामलों में युवा वर्ग ही फंसता है। तस्करी करने वाले तो कभी पकड़े ही नहीं जाते। तस्कर इन्हें अपना मोहरा बनाते हैं।
30 सालों में 3 टन ड्रग्स पकड़ा, 9 दिन पहले किया नष्ट
चंडीगढ़ में नशे का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस ने 30 साल में तीन टन नशीला पदार्थ पकड़ा है। इसमें सबसे ज्यादा मात्रा गांजे की है। 9 दिन पहले 20 अप्रैल को पुलिस ने नशीले पदार्थ को नष्ट किया है। पुलिस ने वर्ष 1992 से लेकर 2022 तक नशे की खेप को अलग-अलग मात्रा में नष्ट किया है। इन सभी केसों में सुनवाई पूरी हो चुकी थी। ड्रग्स डिस्पोजल कमेटी (डीडीसी) के चेयरमैन और यूटी पुलिस के एसएसपी मुख्यालय मनोज मीणा के नेतृत्व में 1341 केसों में छह बार नशे को नष्ट किया गया है। इसकी भी मात्रा तीन टन थी।
हेरोइन की सबसे ज्यादा सप्लाई दिल्ली से हो रही है। नाइजीरियन इस नशे की सप्लाई करते हैं। पाकिस्तान बॉर्डर एरिया से भी हेरोइन की सप्लाई हो रही है। गांजा आंध्रप्रदेश और ओडिसा के बॉर्डर से आता है। चरस हिमाचल के चंबा, कुल्लू, मनानी और नेपाल से आती है। चूरापोस्त राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश से सप्लाई होती है। अफीम राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, असम और नागालैंड से आती है।
42 केसों में जांच के कारण नष्ट नहीं किया गया ड्रग्स
थानों के मालखानों में केवल 42 एनडीपीएस एक्ट के केसों में बरामद किया गया ड्रग्स बचा है। जिसमें सीएफएसएल रिपोर्ट के आने का इंतजार है। वर्ष 2021 के 5 और 2022 के 37 केसों में सीएफएसएल रिपोर्ट आनी बाकी है। इन मामलों में अदालत में सुनवाई पूरी होने के बाद नष्ट किया जाएगा।
सेक्टर-11 में शहर का एक ही मालखाना बनेगा
अभी तक जिस थाने की पुलिस ड्रग्स बरामद करती थी उसे मालखाने में रखती थी, लेकिन अब चंडीगढ़ में एक ही मालखाने में ड्रग्स रखे जाने की योजना है। यह मालखाना डीएसपी अपराध के नेतृत्व में रहेगा। एसएसपी अपराध मनोज मीणा ने बताया कि सेक्टर-11 पुलिस थाने के अंदर मालखाना बनेगा। इसके लिए नक्शा भी बनकर तैयार हो चुका है।
21 दिन तक कोर्स पूरा करना जरूरी, बीच में ही भाग जाते हैं मरीज
मनोरोग विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार पीजीआई में 21 दिन तक भर्ती रहकर इलाज पूरा कराना होता है, लेकिन ज्यादातर मरीज रुकना नहीं चाहते। इलाज के दौरान ही भाग जाते हैं। यूनिट में उनके मनोरंजन की पूरी व्यवस्था है। उनके लिए स्पोर्ट्स ग्राउंड में बैडमिंटन, क्रिकेट खेलने के साथ ही जिम, कैरम और टीवी उपलब्ध कराया गया है। पीजीआई के नशा मुक्ति केंद्र में 25865 मरीजों का इलाज चल रहा है, जिसमें 20275 पुराने और 5590 नए मरीज शामिल हैं।
पीजीआई में मरीजों की संख्या
साल ओपीडी इमरजेंसी भर्ती
2018-19 1874 1242 68
2019-20 5590 3525 279
2020-21 4532 2313 132
ये लक्षण न करें नजरअंदाज
- नशे का आदी होने पर व्यवहार में परिवर्तन होना
- परिवार के बीच न रहकर चुपचाप सबसे अलग रहना
- बात-बात पर झूठ बोलना और रुपयों की मांग बढ़ जाना
- आंखों में लालिमा बने रहना और चेहरा शांत दिखना
- पढ़ाई में अचानक कमजोर होना।
मौजूदा समय में खुद को जमाने के साथ बदलने की इच्छा और टीवी, इंटरनेट व मनोरंजन के अन्य साधनों के माध्यम से युवाओं के सामने परोसे जाने वाले नशे के बाजार घातक सिद्ध हो रहे हैं। इन चीजों को देखकर युवा यह समझने लगा है कि उनकी जिंदगी इसके बिना अधूरी है। जिस कारण शुरुआती दौर में वह दोस्तों के साथ समय गुजारने के लिए थोड़ा नशा करना शुरू करता है और ना चाहते हुए भी उसका आदी बन जाता है। इससे बचाव के लिए सबसे पहले जरूरी है मनोरंजन के माध्यमों में नशा संबंधी विज्ञापनों पर रोक लगाया जाए। स्कूल स्तर पर नशा के दुष्प्रभाव को लेकर विस्तृत जानकारी प्रदान करने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। स्कूल के बाद कॉलेज में जाने वाले युवा इस खतरे को समझते हुए नशा करने की गलती ना कर सकें। - डॉ. राहुल चक्रवर्ती, पीजीआई मनोरोग विभाग पीजीआई
इनका नशे के चक्कर में पड़कर जीवन हुआ बर्बाद
केस-1
पिछले साल से एनडीपीएस एक्ट के मामले में फंसे सेक्टर-25 निवासी 22 वर्षीय सोनू (परिवर्तित नाम) के परिजनों ने बताया कि सोनू कॉलेज में प्रथम वर्ष का छात्र है। उसे झूठे तरीके से मामले में फंसाया गया है। सोनू अकेला बेटा है। उसके साथ जो भी हो रहा है इससे हम सब का जीवन रुक गया है। ऐसा लगता है कि हमारा परिवार समाज से 10 साल पिछड़ गया है।
केस-2
मलोया निवासी 24 वर्षीय रोहित (परिवर्तित नाम) को 3 वर्ष पहले पुलिस ने चरस के साथ गिरफ्तार किया था। मामला कोर्ट में चला। इसके बाद उसे ढाई साल की जेल हो गई। रोहित के पिता बताते हैं कि इसका सब का असर परिवार पर पड़ा है। इस एक मामले ने रोहित का भविष्य खत्म कर दिया है।
केस-3
हिमाचल निवासी 19 साल के विकास (बदला हुआ नाम) इंजीनियरिंग कॉलेज का छात्र है। 6 महीने पहले विकास ने दोस्तों के साथ पार्टी में पहली बार इंजेक्शन के जरिए हेरोइन लिया था। धीरे-धीरे यह उसकी आदत में शामिल होता गया। विकास को नए दोस्त बनाने के लिए यह करना पड़ा था। मौजूदा समय में विकास का इलाज पीजीआई के नशा उन्मूलन केंद्र में चल रहा है। इलाज के दौरान वह कुछ महीने तक नशे से दूर रहा, लेकिन हॉस्टल में जाने के बाद उसने इंजेक्शन के जरिए नशा ले लिया। जिस कारण उसे ओवरडोज हो गया और हालत बिगड़ गई। परिजनों ने उसे पीजीआई में भर्ती करवाया है।
केस-4
लुधियाना निवासी मनजीत कौर (बदला हुआ नाम) को पता भी नहीं था कि उसके पति देवेंदर (बदला हुआ नाम) धीरे-धीरे नशे के आदी हो गए हैं। मनजीत ने काम के दबाव को कारण माना, लेकिन जब धीरे-धीरे स्थिति मारपीट और कीमती चीजों को बेचने तक पहुंच गई तो मनजीत ने इसकी जानकारी परिजनों को दी। जिसके बाद पता चला कि उसका पति नशे का आदी हो चुका है। पति की मर्जी के खिलाफ मनजीत और उसके परिजन देवेंदर को लेकर पीजीआई पहुंचे, जहां उसे भर्ती कर इलाज किया जा रहा है।
इन्होंने दी नशे को मात, आज जी रहे सिर उठाकर
सेक्टर-37 निवासी 30 वर्षीय दीपू (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वह पहले शराब पीता था। उसके दोस्त हेरोइन पीते थे। दोस्तों ने कहा कि एक लाइन लगाकर देख। उसने शराब के नशे में एक लाइन लगाई। इसके बाद हेरोइन पीने लग गया। दोस्त उसे बोलने लगे कि हेरोइन पीनी है तो पैसे भी शेयर कर। तब उसका दो साल का बच्चा भी था। वह पूरी तरह से हेरोइन के नशे में डूब गया। उसने सोचा कि अब हेरोइन पीनी है तो हेरोइन बेचना ही शुरू कर देते हैं। जितना मुनाफा आएगा उससे वह नशा कर लेगा। वह हेरोइन बेचने के साथ उससे होने वाले मुनाफे से खुद नशा करने लगा। घर परिवार और समाज में लोगों ने उसे बुलाना छोड़ दिया और उसकी इज्जत कम हो गई। इसके बाद उसने नशा छोड़ने की ठानी। फिर दो साल तक नशा छोड़ने की दवाई ली। दीपू ने कहा कि लॉकडाउन के कारण मजबूरन उसका नशा छूट गया। दीपू का कहना है कि नशे की लत दोस्ती के चक्कर में ही लगती है।
बाउंसर की ड्यूटी के दौरान पीने लगा चरस
सेक्टर-56 निवासी 28 वर्षीय बाउंसर गुरी (बदला हुआ नाम) ने कहा कि वह क्लबों में बाउंसर का काम करता था। क्लब में पार्टी करने आने वाले युवा उसके भी अच्छे दोस्त बन गए। उन्होंने कहा कि ले सिगरेट पीकर देख। पहले वह मना करता रहा, लेकिन धीरे धीरे उसने सिगरेट पीना शुरू कर दिया। इसके बाद क्लब में ही आने वाले कुछ युवकों ने उसे सिगरेट में चरस डालकर पीने के लिए कहा। उसने चरस भी पीना शुरू कर दिया। वह चरस के लिए रात भर दोस्तों को फोन कर पूछता रहता था कि क्या चरस पड़ी है। धीरे धीरे घर के आसपास के लोगों ने उसे नशेड़ी कहना शुरू कर दिया। उसे अपनी बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपनी इस बुरी आदत को छोड़ने के लिए फिर से जिम जाना शुरू किया। धीरे-धीरे उसकी नशे की लत कम होती गई।