बॉडी डोनेट करने से पहले खबर पढ़ें, कहीं आपके साथ ऐसा न हो जाए
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अगर आप बॉडी डोनेट करने की सोच रहे हैं तो पहले यह खबर जरूर पढ़ लें। कही आपके साथ भी ऐसा न हो जाए, जैसा कपूर सिंह के साथ हुआ।
ये हैं कपूर सिंह। इन्होंने शोध कार्य के लिए देहदान की थी, लेकिन देहदान की औपचारिकताओं के लिए इनके परिवार को कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ी।
सरदार कपूर सिंह ने जिंदा रहते अपना शरीर पीजीआई के नाम कर दिया था। 10 सितंबर को लगभग एक बजे उनकी मौत हो गई। आखिरी इच्छा के मुताबिक उनके बेटे बलजिंदर सिंह ने बॉडी डोनेशन के कार्ड में लिखे नंबर पर पीजीआई को कॉल की।
पीजीआई की ओर से जवाब मिला कि मौत नेचुरल हुई है, इसकी डॉक्टर से पुष्टि करानी होगी। जब कोई डॉक्टर नेचुरल डेथ को प्रमाणित कर दे तो इसकी सूचना पीजीआई को दे दें। उसके बाद बॉडी ले जाएंगे।
कई अस्पताल, पुलिस थाने और पीजीआई के कटवाए चक्कर
पीजीआई का जवाब सुन परिजन हैरान हो गए। उन्होंने एक लोकल डॉक्टर से संपर्क किया तो उन्होंने मना कर दिया। परिजन जीरकपुर के जेपी अस्पताल पहुंचे। अस्पताल ने भी मना कर दिया कि उनका डॉक्टर वेरिफाई नहीं कर पाएगा। इसके बाद परिजन ज्ञान सागर मेडिकल कॉलेज पहुंचे। वहां अस्पताल ने कहा कि वे बॉडी ले लेंगे। लेकिन एक शपथ पत्र और पुलिस से वेरिफाई करवाकर लाना होगा।
11 सितंबर को परिजन जीरकपुर थाने पहुंचे तो उन्होंने कहा कि पहले वे आईपीसी की धारा 174 के तहत कार्रवाई करेंगे। उसके बाद पोस्टमार्टम कराएंगे। पूरी प्रक्रिया में तीन दिन लगेंगे। चारों तरफ दौड़ने के बाद मिली हताशा से परिवार पूरी तरह टूट गया। पीजीआई के व्यवहार से आसपास के लोग भी हैरान हो गए। कोई रास्ता न मिलने पर परिवार, आसपास के लोग और रिश्तेदारों ने एक बार फिर पीजीआई से गुहार लगाने का फैसला लिया।
इस बार उनके साथ वह लोग भी गए, जिन्होंने बॉडी डोनेट करने संबंधी पीजीआई को शपथ पत्र दिया था। उन्होंने पीजीआई के एनेटामी डिपार्टमेंट से कहा कि जो कपूर सिंह की बॉडी के साथ हुआ, उससे वे काफी आहत हैं। अब वे अपनी बॉडी डोनेट नहीं करना चाहते हैं। फॉर्म कैंसल कर दीजिए। दबाव बढ़ता देख पीजीआई ने बिना वेरिफाई किए ही बॉडी ले ली है। लेकिन दो दिन तक कपूर सिंह की फैमिली और बॉडी का जो अपमान हुआ वह असहनीय है।
क्या कहना है पीजीआई का
पीजीआई के एनेटमी डिपार्टमेंट की एचओडी डॉ. डेजी साहनी ने बताया कि नेचुरल मौत की पुष्टि डॉक्टर से कराना जरूरी है। पीजीआई के डॉक्टर यह काम नहीं कर सकते हैं। क्योंकि उन पर पहले ही काम का बोझ अधिक है। शपथ पत्र भरने के दौरान इस बारे में सबको बताया जाता है। मौत को वेरिफाई कराना इस प्रक्रिया का एक चरण है। अगर ऐसा करेंगे तो हम लोग मुश्किल में फंस सकते हैं।
खुद कन्फर्म न करें, डॉक्टर को जरूर बुलाएं
पीजीआई व अन्य विशेषज्ञों से बात करने पर निष्कर्ष निकला कि अगर पीजीआई या किसी अन्य संस्थान को बॉडी डोनेट कर रखी है और डोनर की मौत हो जाती है तो उसे खुद से कन्फर्म न करें। बल्कि डॉक्टर को मौके पर बुलाएं। फैमिली डॉक्टर को भी बुला सकते हैं। उनसे सर्टिफिकेट भी बनवाएं।
ऑर्गन डोनेशन व बॉडी डोनेशन में अंतर
यह बात जानना जरूरी है कि बॉडी व ऑर्गन डोनेशन में अंतर है। ऑर्गन डोनेशन ब्रेन डेड व्यक्ति के दिए जाते हैं। जैसे कि किडनी, लीवर, हार्ट, कोर्निया व पेनक्रियाज। जबकि बॉडी डोनेशन में पूरी बॉडी। बॉडी डोनेशन के डोनर 60 वर्ष से ऊपर के होते हैं।
साथी के शव का अपमान को देखकर आहत हूं
कपूर सिंह के साथ ही उनके पड़ोसी हरमोहिंदर सिंह ने भी बॉडी डोनेट करने का फैसला लिया था। दो दिन तक साथी के शव की बेकद्री देखकर वे काफी आहत हैं। उन्होंने बताया कि एक बार तो मेरा मन हुआ कि फॉर्म कैंसल करा दूं।
दो दिन तक मैं बहुत परेशान हुआ हूं। जीरकपुर के सभी अस्पतालों व डॉक्टरों के चक्कर काटे। पीजीआई से भी कई बार गुहार लगाई। मेरे पिता ने आंखें भी डोनेट कीं थीं। उसे लेने के लिए पीजीआई की टीम आई और उन्होंने कोई भी वेरिफिकेशन नहीं मांगा। जब एक डिपार्टमेंट ऐसा कर सकता है तो दूसरा डिपार्टमेंट क्यों नहीं। पीजीआई को इस बारे में सोचना चाहिए और सरल नियम बनाने चाहिए, तभी कोई बॉडी डोनेट करने के बारे में सोचेगा।
-बलजिंदर सिंह, कपूर सिंह के बेटे