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चंडीगढ़ प्रशासन को मालूम ही नहीं, कितनी कृषि भूमि पर बन गए अवैध मकान, लोग बोले- सख्ती बरतते तो न होते ये निर्माण

Sun, 21 Feb 2021 06:31 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Sun, 21 Feb 2021 06:31 PM IST
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Chandigarh Administration Have No Actual Data Of Agriculture Land
सांकेतिक तस्वीर।

चंडीगढ़ प्रशासन को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि कितनी कृषि भूमि का उपयोग अब अन्य कामों में हो रहा है। आरटीआई में पूछे गए एक सवाल के जवाब में प्रशासन की तरफ से चंडीगढ़ के सभी गांवों में कृषि योग्य भूमि की जानकारी तो दी गई लेकिन प्रशासन यह नहीं बता पाया कि इनमें से कितनी भूमि पर अभी खेती हो रही है। हालांकि हकीकत यह है कि अब इनमें से काफी जमीन पर अवैध रूप से घर बन चुके हैं।

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बीते कुछ वर्षों में चंडीगढ़ विभिन्न गांवों में कृषि भूमि पर किस कदर अवैध निर्माण हुए हैं, इसका खुलासा अमर उजाला ने सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए किया है। वर्ष 2016 के बाद से अवैध निर्माण ने गांवों की सूरत बदल दी है लेकिन प्रशासन ने यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि कितनी कृषि भूमि खत्म हो गई और कितनी जमीन पर अवैध रूप से मकान बना दिए गए हैं। प्रशासन के रिकॉर्ड में अभी भी वहां खेती ही हो रही है। 
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प्रशासन के रिकॉर्ड के अनुसार, 25 गांवों में कुल 3197.50 एकड़ कृषि भूमि दर्ज है। इसमें सबसे ज्यादा मलोया में 662 एकड़, कैंबवाला में 538 एकड़, मनीमाजरा में 328 एकड़, खुड्डा लाहौरा में 306 एकड़, खुड्डा अलीशेर में 305 एकड़, डड्डूमाजरा में 155 एकड़ कृषि भूमि है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इतनी ही भूमि पर खेती भी की जा रही है, जवाब है नहीं। दरअसल, जिस कृषि भूमि पर मकान बना दिए गए हैं या प्लॉट काट दिए गए हैं, प्रशासन के रिकॉर्ड में वहां अभी भी वह कृषि भूमि के नाम पर ही दर्ज हैं। शहर के लगभग हर गांव में ऐसा ही हुआ है।

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खेती विभाग में सिर्फ सात कर्मचारी, पांच तो बेलदार

शहर में खेती को लेकर यूटी प्रशासन कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रशासन के खेती विभाग में सिर्फ सात कर्मचारियों की तैनाती है। इनमें से पांच बेलदार (माली), एक सुपरवाइजर और एक क्लर्क है। विभाग के कर्मचारी सेवानिवृत्त होते गए लेकिन भर्तियां नहीं हुईं।

कम कर्मचारियों की वजह से केंद्र सरकार की योजनाएं किसानों तक नहीं पहुंच पाती हैं। न ही विभाग की तरफ से किसानों के लिए कोई कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इसकी वजह से खेती कमजोर होती जा रही है। किसानों की आय भी कम हो गई है। आय बढ़ाने के लिए किसान दूसरे व्यवसाय की तरफ रुख कर रहे हैं इसलिए ही वह अपनी कृषि भूमि पर इस्तेमाल मकान बनाने में कर रहे हैं, ताकि उन्हें किराये पर देकर कमाई की जा सके। ऐसा लगभग हर गांव में हो रहा है।

किसानों की आय हुई कम
पेरीफेरी में अवैध निर्माण के पीछे कई कारण हैं। कृषि भूमि कम होने से किसानों की आय काफी कम हो गई है इसलिए वह दूसरे व्यवसाय की तरफ जा रहे हैं। यह चिंता की बात है। जब किसान दूसरे व्यवसाय की तरफ जाएंगे तो खेती की जमीन का इस्तेमाल अन्य कामों में होगा। प्रशासन शहर के किसानों के लिए कुछ नहीं कर रहा है। प्रशासन के पास यह जानकारी भी नहीं है कि कितनी कृषि भूमि का इस्तेमाल अन्य कामों में किया जा रहा है।  - राहुल महाजन, सामाजिक कार्यकर्ता

अवैध निर्माण से पर्यावरण पर पड़ रहा है असर

पेरीफेरी में तेजी से अवैध निर्माण हो रहे हैं लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन आंखें मूंदकर बैठा है। शहर के बीच के सेक्टरों में अगर किसी तरह का अवैध निर्माण होता तो प्रशासन उसे तोड़ने में बड़ी तत्परता दिखाता है। यही तत्परता इन पेरीफेरी और गांव में होने वाले अवैध निर्माण पर भी दिखानी चाहिए, क्योंकि इससे शहर की सूरत बिगड़ रही है और इसका सबसे बड़ा नुकसान चंडीगढ़ के पर्यावरण पर पड़ रहा है। - हितेश पुरी, चेयरमैन, क्राफ्ड।

पहले सख्ती बरतते तो अब नहीं होती समस्या
पेरीफेरी में जो अवैध निर्माण हो रहा है, उसका असर भले ही आज न दिखाई दे लेकिन इसका असर कुछ वर्षों बाद शहर के वातावरण पर जरूर दिखाई देगा। लाल डोरे के बाहर आज बहुत ज्यादा निर्माण हो गए हैं, चंडीगढ़ प्रशासन के अधिकारी अगर पहले ही सख्ती बरतते तो शहर में लाल डोरे की समस्या ही न होती। खेती की जमीन पर हो रहा अवैध निर्माण पर्यावरण के लिए चिंताजनक है। ऐसे में प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। - एनके झींगन, सचिव, एनवायरनमेंट सोसाइटी ऑफ इंडिया।

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