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एक ओर चिता तो दूसरी तरफ जलती है भक्ति की ज्योत
ब्यूरा/अमर उजाला/ यमुनानगर।
Updated Mon, 29 Sep 2014 12:38 AM IST
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अग्नि में जलती चिताएं देख हर किसी की रूह कांप उठती है, किंतु श्रीयमुना श्मशान घाट पर कुछ अलग ही दृश्य देखने को मिलता है।
यहां जलती चिताओं के पास भक्तगण आराधना करते देखे जा सकते हैं। क्षेत्रवासी 40 बरसों से आस्था की यह अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। यहां बने श्रीशिव हनुमान मंदिर में न केवल लोग सुबह-शाम पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, बल्कि पिछले 37 वर्षों से यहां दोपहर बाद भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
बता दें कि श्रीयमुना श्मशान घाट सिटी सेंटर रोड पर पश्चिमी यमुना नहर के किनारे पर स्थित है, जो आजादी के पहले से ही अस्तित्व में है। तब पूरे शहर का यह एक मात्र श्मशान हुआ करता था। यहां 45 वर्ष पहले श्रीशिव-हनुमान मंदिर का निर्माण कराने के बाद विधिवत हनुमान की मूर्ति और शिवलिंग स्थापित की गई थी।
इसके करीब पांच वर्ष बाद श्मशान घाट प्रबंधन कमेटी व क्षेत्रवासियों द्वारा सुबह-शाम मंदिर में पूजा-पाठ शुरू करवाया गया। मौजूदा समय में प्रबंधन कमेटी के प्रधान मदन लाल जैन, उपप्रधान विजय बब्बर, सचिव भूषण गोयल सहित शहर के अन्य समाजसेवी श्मशान भूमि की सेवा में जुटे हैं।
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श्मशान के प्रति भय व भ्रांतियां दूर करना मकसद
श्मशान घाट प्रबंधन कमेटी के कोषाध्यक्ष पुरुषोत्तम पारुथी ने बताया कि श्मशान भूमि के प्रति लोगों के मन में भय और तरह-तरह की भ्रांतियां होती हैं, जबकि श्मशान भूमि ही जीवन के वास्तविक सच को बयां करती हैं। लोगों के श्मशान भूमि के प्रति भय और मन में उपजी भ्रांतियों को दूर करने के मकसद से ही श्मशान भूमि पर मंदिर का निर्माण और सुबह-शाम पूजा-पाठ करने का फैसला लिया गया था। उन्हाेंने बताया कि इस कवायद का असर काफी हद तक दिखाई भी दिया। जहां पहले श्मशान भूमि के पास से गुजरने से भी लोग कतराते थे, लेकिन यहां नित्य सुबह-शाम पूजा-पाठ से उनकी धारणा बदली है।
35 फुट ऊंचा गेट बयां कर रहा जीवन की सचाई
श्मशान घाट के प्रमुख द्वार की ऊंचाई करीब 35 फुट है। इस पर सत्यवादी राजा हरीशचंद्र उनकी पत्नी तारामती और उनके मृत पड़े पुत्र रोहताश की मूर्तियां बनी हैं। इस दृश्य से जुड़ी कथा का सार जीवन की सचाई को बयां करता है। पुरुषोत्तम पारुर्थी ने बताया कि दृश्य बताता है कि राजा हरीशचंद्र सच की मिसाल थे, जिनका इम्तेहान लेने के लिए विश्वामित्र ब्राह्मण का रूप धारण कर आए। उन्हाेंने हरीशचंद्र से संकल्प लेकर दान का में उनका सारा राज्य मांग लिया। इस पर राजा हरीशचंद्र बाजार में खुद को बेचने चले गए, ताकि परिवार को पेट भर सकें। तब उन्हें एक डोम (श्मशान भूमि में मुर्दे जलाने वाला) ने खरीद लिया और हरीशचंद्र को श्मशान भूमि में मुर्दे जलाने का काम दे दिया। तब उनके बेटे रोहताश की सांप काटने से मृत्यु हो गई और पत्नी तारामती उसे लेकर श्मशान भूमि पहुंच गईं। जहां हरीशचंद्र ने अपनी पत्नी तारामती से संस्कार करने के लिए तय कर देने को कहा। तारामती ने कर के रूप में साड़ी का एक टुकड़ा देकर पुत्र का अंतिम संस्कार करवाया।
श्रीयमुना श्मशान घाट की दीवारें भी बोलती हैं
श्रीयमुना श्मशान घाट के संरक्षक डॉ. केएन कपूर के मुताबिक श्रीयमुना श्मशान घाट में हर दीवार पर मानव जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी पर बहुमूल्य बातें अंकित हैं, जिन्हें आज इंसान भागदौड़ भरी जिंदगी में भूलता जा रहा है। इसी को मद्देनजर रख जीवन के सार को बतलाते चित्रों व संदेश को हर दीवार पर अंकित किया गया है। इनमें से एक जगह ‘माली आवत देख कर कलियां करन पुकार, फूल-फूल सब चुन लिए कल हमारी बार’ द्वार लिखा है, जिसके ठीक साथ में कलियाें पर फूल खिले हुए हैं। मानों यह बात कलियां खुद बोल रही हों।
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यहां जलती चिताओं के पास भक्तगण आराधना करते देखे जा सकते हैं। क्षेत्रवासी 40 बरसों से आस्था की यह अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। यहां बने श्रीशिव हनुमान मंदिर में न केवल लोग सुबह-शाम पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं, बल्कि पिछले 37 वर्षों से यहां दोपहर बाद भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।
बता दें कि श्रीयमुना श्मशान घाट सिटी सेंटर रोड पर पश्चिमी यमुना नहर के किनारे पर स्थित है, जो आजादी के पहले से ही अस्तित्व में है। तब पूरे शहर का यह एक मात्र श्मशान हुआ करता था। यहां 45 वर्ष पहले श्रीशिव-हनुमान मंदिर का निर्माण कराने के बाद विधिवत हनुमान की मूर्ति और शिवलिंग स्थापित की गई थी।
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इसके करीब पांच वर्ष बाद श्मशान घाट प्रबंधन कमेटी व क्षेत्रवासियों द्वारा सुबह-शाम मंदिर में पूजा-पाठ शुरू करवाया गया। मौजूदा समय में प्रबंधन कमेटी के प्रधान मदन लाल जैन, उपप्रधान विजय बब्बर, सचिव भूषण गोयल सहित शहर के अन्य समाजसेवी श्मशान भूमि की सेवा में जुटे हैं।
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श्मशान के प्रति भय व भ्रांतियां दूर करना मकसद
श्मशान घाट प्रबंधन कमेटी के कोषाध्यक्ष पुरुषोत्तम पारुथी ने बताया कि श्मशान भूमि के प्रति लोगों के मन में भय और तरह-तरह की भ्रांतियां होती हैं, जबकि श्मशान भूमि ही जीवन के वास्तविक सच को बयां करती हैं। लोगों के श्मशान भूमि के प्रति भय और मन में उपजी भ्रांतियों को दूर करने के मकसद से ही श्मशान भूमि पर मंदिर का निर्माण और सुबह-शाम पूजा-पाठ करने का फैसला लिया गया था। उन्हाेंने बताया कि इस कवायद का असर काफी हद तक दिखाई भी दिया। जहां पहले श्मशान भूमि के पास से गुजरने से भी लोग कतराते थे, लेकिन यहां नित्य सुबह-शाम पूजा-पाठ से उनकी धारणा बदली है।
35 फुट ऊंचा गेट बयां कर रहा जीवन की सचाई
श्मशान घाट के प्रमुख द्वार की ऊंचाई करीब 35 फुट है। इस पर सत्यवादी राजा हरीशचंद्र उनकी पत्नी तारामती और उनके मृत पड़े पुत्र रोहताश की मूर्तियां बनी हैं। इस दृश्य से जुड़ी कथा का सार जीवन की सचाई को बयां करता है। पुरुषोत्तम पारुर्थी ने बताया कि दृश्य बताता है कि राजा हरीशचंद्र सच की मिसाल थे, जिनका इम्तेहान लेने के लिए विश्वामित्र ब्राह्मण का रूप धारण कर आए। उन्हाेंने हरीशचंद्र से संकल्प लेकर दान का में उनका सारा राज्य मांग लिया। इस पर राजा हरीशचंद्र बाजार में खुद को बेचने चले गए, ताकि परिवार को पेट भर सकें। तब उन्हें एक डोम (श्मशान भूमि में मुर्दे जलाने वाला) ने खरीद लिया और हरीशचंद्र को श्मशान भूमि में मुर्दे जलाने का काम दे दिया। तब उनके बेटे रोहताश की सांप काटने से मृत्यु हो गई और पत्नी तारामती उसे लेकर श्मशान भूमि पहुंच गईं। जहां हरीशचंद्र ने अपनी पत्नी तारामती से संस्कार करने के लिए तय कर देने को कहा। तारामती ने कर के रूप में साड़ी का एक टुकड़ा देकर पुत्र का अंतिम संस्कार करवाया।
श्रीयमुना श्मशान घाट की दीवारें भी बोलती हैं
श्रीयमुना श्मशान घाट के संरक्षक डॉ. केएन कपूर के मुताबिक श्रीयमुना श्मशान घाट में हर दीवार पर मानव जीवन से जुड़ी छोटी-छोटी पर बहुमूल्य बातें अंकित हैं, जिन्हें आज इंसान भागदौड़ भरी जिंदगी में भूलता जा रहा है। इसी को मद्देनजर रख जीवन के सार को बतलाते चित्रों व संदेश को हर दीवार पर अंकित किया गया है। इनमें से एक जगह ‘माली आवत देख कर कलियां करन पुकार, फूल-फूल सब चुन लिए कल हमारी बार’ द्वार लिखा है, जिसके ठीक साथ में कलियाें पर फूल खिले हुए हैं। मानों यह बात कलियां खुद बोल रही हों।