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Chandigarh News: कबाड़ से खड़ा किया विज्ञान का संसार, अब राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार
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चंडीगढ़। स्कूल के पास बड़ा बजट नहीं था, महंगे उपकरण खरीदने की गुंजाइश नहीं थी लेकिन बच्चों को विज्ञान किताबों से बाहर दिखाना था। फिर मलोया के सरकारी स्कूल के शिक्षक रवि जायसवाल ने कबाड़ में ही विज्ञान की प्रयोगशाला तलाश ली। लोहे के तार, थर्माकोल, रद्दी कागज और पीवीसी शीट से ऐसा डोम थिएटर तैयार किया कि बच्चे पृथ्वी से अंतरिक्ष और शरीर के भीतर की दुनिया को अपनी आंखों के सामने देखने लगे। दो लाख रुपये से भी कम के अनुदान में तैयार यह प्रयोग अब चंडीगढ़ के दूसरे सरकारी स्कूलों तक पहुंच चुका है। इसी नवाचार और शिक्षण के अलग अंदाज के लिए मलोया कॉलोनी के गवर्नमेंट मॉडल हाई स्कूल के टीजीटी साइंस शिक्षक रवि जायसवाल का चयन राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार-2026 के लिए हुआ है। देशभर से चुने गए 48 शिक्षकों में वह चंडीगढ़ का प्रतिनिधित्व करेंगे।
रवि पिछले 16 वर्षों से विज्ञान पढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूल के बच्चों को संसाधनों की कमी के कारण प्रयोगात्मक शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। वर्ष 2018 में स्कूल को साइंस पार्क के लिए अनुदान मिला तो उन्होंने अन्य शिक्षकों के साथ मिलकर उसी में डोम थिएटर बनाने की पहल की। महंगे निर्माण की जगह कबाड़ से थर्माकोल लिया गया। लोहे के तारों का गुंबद बनाया, उस पर रद्दी कागज चिपकाया, दीवारों पर थर्माकोल की परत चढ़ाई और पीवीसी शीट लगाकर थिएटर तैयार किया। मजदूरी का खर्च बचाने के लिए शिक्षकों ने खुद फर्श पर प्लास्टर किया।
अंतरिक्ष से आंख के भीतर तक दिखा विज्ञान
डोम थिएटर में प्रोजेक्टर के जरिये गोलाकार स्क्रीन पर 3डी दृश्य दिखाए जाते हैं। बच्चे रॉकेट के अंतरिक्ष में जाने की प्रक्रिया, पृथ्वी की परतों, हिमालय के बनने और जीव विज्ञान के जटिल विषयों को देखकर समझते हैं। विद्यार्थियों ने यहां आंख के भीतर के तत्वों से लेकर प्रोटोन-न्यूट्रॉन तक को 3डी में देखने का अनुभव किया है। इस पहल का असर एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा विभाग ने मॉडल को सराहा और दूसरे सरकारी स्कूलों में भी डोम थिएटर बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ। छह स्कूलों में मॉडल तैयार हो चुका था जबकि तीन अन्य स्कूलों में निर्माण प्रस्तावित था।
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कबाड़ से साइंस पार्क तक
मलोया स्कूल में इंडिजिनस साइंस एंड नॉलेज पार्क भी तैयार किया गया है। यहां मौसम केंद्र, सोलर वाटर हीटर, पानी का पंप और ऊर्जा चक्र जैसे मॉडल विद्यार्थियों को विज्ञान के सिद्धांतों को व्यवहार में समझाते हैं। स्कूल ने दीक्षा पोर्टल पर 149 से अधिक डिजिटल लर्निंग मॉड्यूल तैयार किए हैं और पीएम ई-विद्या के लिए वीडियो लेसन भी रिकॉर्ड किए हैं। रवि के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने भी उपलब्धियां हासिल कीं। 2025 में एक छात्र ने जापान के साकुरा साइंस कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अन्य विद्यार्थियों का चयन राष्ट्रपति भवन और इसरो के युवा वैज्ञानिक कार्यक्रम के लिए हुआ। यानी पुरस्कार सिर्फ एक शिक्षक को नहीं, उस सोच को मिला है जिसने सरकारी स्कूल में संसाधन नहीं हैं को बहाना बनाने के बजाय कबाड़ को ही संसाधन बना दिया।
रवि पिछले 16 वर्षों से विज्ञान पढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकारी स्कूल के बच्चों को संसाधनों की कमी के कारण प्रयोगात्मक शिक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। वर्ष 2018 में स्कूल को साइंस पार्क के लिए अनुदान मिला तो उन्होंने अन्य शिक्षकों के साथ मिलकर उसी में डोम थिएटर बनाने की पहल की। महंगे निर्माण की जगह कबाड़ से थर्माकोल लिया गया। लोहे के तारों का गुंबद बनाया, उस पर रद्दी कागज चिपकाया, दीवारों पर थर्माकोल की परत चढ़ाई और पीवीसी शीट लगाकर थिएटर तैयार किया। मजदूरी का खर्च बचाने के लिए शिक्षकों ने खुद फर्श पर प्लास्टर किया।
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अंतरिक्ष से आंख के भीतर तक दिखा विज्ञान
डोम थिएटर में प्रोजेक्टर के जरिये गोलाकार स्क्रीन पर 3डी दृश्य दिखाए जाते हैं। बच्चे रॉकेट के अंतरिक्ष में जाने की प्रक्रिया, पृथ्वी की परतों, हिमालय के बनने और जीव विज्ञान के जटिल विषयों को देखकर समझते हैं। विद्यार्थियों ने यहां आंख के भीतर के तत्वों से लेकर प्रोटोन-न्यूट्रॉन तक को 3डी में देखने का अनुभव किया है। इस पहल का असर एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा विभाग ने मॉडल को सराहा और दूसरे सरकारी स्कूलों में भी डोम थिएटर बनाने की दिशा में काम शुरू हुआ। छह स्कूलों में मॉडल तैयार हो चुका था जबकि तीन अन्य स्कूलों में निर्माण प्रस्तावित था।
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कबाड़ से साइंस पार्क तक
मलोया स्कूल में इंडिजिनस साइंस एंड नॉलेज पार्क भी तैयार किया गया है। यहां मौसम केंद्र, सोलर वाटर हीटर, पानी का पंप और ऊर्जा चक्र जैसे मॉडल विद्यार्थियों को विज्ञान के सिद्धांतों को व्यवहार में समझाते हैं। स्कूल ने दीक्षा पोर्टल पर 149 से अधिक डिजिटल लर्निंग मॉड्यूल तैयार किए हैं और पीएम ई-विद्या के लिए वीडियो लेसन भी रिकॉर्ड किए हैं। रवि के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने भी उपलब्धियां हासिल कीं। 2025 में एक छात्र ने जापान के साकुरा साइंस कार्यक्रम में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अन्य विद्यार्थियों का चयन राष्ट्रपति भवन और इसरो के युवा वैज्ञानिक कार्यक्रम के लिए हुआ। यानी पुरस्कार सिर्फ एक शिक्षक को नहीं, उस सोच को मिला है जिसने सरकारी स्कूल में संसाधन नहीं हैं को बहाना बनाने के बजाय कबाड़ को ही संसाधन बना दिया।