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Chandigarh News: इम्यून डिफिशिएंसी वाले बच्चों के लिए पीजीआई में बने बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर
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चंडीगढ़। इम्यून डिफिशियंसी वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन उसके अनुपात में इलाज की सुविधा बेहद कम है। बच्चे इलाज की कमी के कारण मर रहे हैं। अगर पीजीआई की बात की जाए तो मौजूदा समय में ऐसे 25 बच्चों का इलाज चल रहा है। उन बच्चों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट कर सामान्य जीवन प्रदान किया जा सकता है। लेकिन बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट में वयस्क मरीजों की वेटिंग लंबी है। ऐसे में संस्थान में बच्चों के लिए अलग बोन मैरो ट्रांसप्लांट सेंटर बनाया जाना चाहिए। यह बात इंडियन सोसाइटी फॉर प्राइमरीज इम्यून डिफिशिएंसी के अध्यक्ष डॉ. बिमान साकिया ने इन बोर्न एरर ऑफ इम्यूनिटी पर संस्थान के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन शनिवार को कही।
डॉ. बिमान ने बताया कि यह संक्रमण बच्चे में माता-पिता से हस्तांतरित होता है। जन्म के एक साल के दौरान तब बच्चा अपनी मां से मिले एंटीबॉडी के बल पर जीवित रहता है। इसके बाद उसे संक्रमण होने लगता है क्योंकि उस बच्चे में एंटीबॉडी बनाने वाले बी सेल के न होने से वे एंटीबॉडी रहित हो जाता है। ऐसे बच्चों की जान बचाने के लिए उन्हें हर महीने इम्यूनोग्लोबीन इंजेक्शन लगाया जाता है। काफी महंगा होने के कारण गरीब परिवार के लिए इसे खरीदना संभव नहीं। पंजाब सरकार ने इस समस्या को समझते हुए इसे स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल तो कर लिया है लेकिन अब तक सुविधा मिलनी शुरू नहीं हुई है। इसलिए अब भी स्थिति गंभीर है।
इनसेट-
10 बच्चों को दे रहे इलाज
फांउडेशन फॉर प्राइमरी इम्यूनोडिफिशिएंसी डिजीज यूएसए के अध्यक्ष डॉ. सुधीर गुप्ता ने इस मर्ज से ग्रस्त 10 बच्चों को गोद ले रखा है। वे पिछले कई वर्षों से उन बच्चों के इलाज पर आने वाला खर्च वहन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1200 में से एक बच्चा इस मर्ज से ग्रस्त है। इस मर्ज से संक्रमित बच्चों की जान बचाने के लिए डाइग्नोसिस के साथ ही इलाज की समुचित व्यवस्था बेहद जरूरी है।
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डॉ. बिमान ने बताया कि यह संक्रमण बच्चे में माता-पिता से हस्तांतरित होता है। जन्म के एक साल के दौरान तब बच्चा अपनी मां से मिले एंटीबॉडी के बल पर जीवित रहता है। इसके बाद उसे संक्रमण होने लगता है क्योंकि उस बच्चे में एंटीबॉडी बनाने वाले बी सेल के न होने से वे एंटीबॉडी रहित हो जाता है। ऐसे बच्चों की जान बचाने के लिए उन्हें हर महीने इम्यूनोग्लोबीन इंजेक्शन लगाया जाता है। काफी महंगा होने के कारण गरीब परिवार के लिए इसे खरीदना संभव नहीं। पंजाब सरकार ने इस समस्या को समझते हुए इसे स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल तो कर लिया है लेकिन अब तक सुविधा मिलनी शुरू नहीं हुई है। इसलिए अब भी स्थिति गंभीर है।
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10 बच्चों को दे रहे इलाज
फांउडेशन फॉर प्राइमरी इम्यूनोडिफिशिएंसी डिजीज यूएसए के अध्यक्ष डॉ. सुधीर गुप्ता ने इस मर्ज से ग्रस्त 10 बच्चों को गोद ले रखा है। वे पिछले कई वर्षों से उन बच्चों के इलाज पर आने वाला खर्च वहन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 1200 में से एक बच्चा इस मर्ज से ग्रस्त है। इस मर्ज से संक्रमित बच्चों की जान बचाने के लिए डाइग्नोसिस के साथ ही इलाज की समुचित व्यवस्था बेहद जरूरी है।
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