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पुटा चुनाव में चिट्ठीवार शुरू, खालिद-सिद्धू व मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने एक-दूसरे पर दागे सवाल
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चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (पुटा) के चुनाव को लेकर खालिद-सिद्धू व मृत्युंजय-नौरा ग्रुप में में चिट्ठी वार शुरू हो गया है। मैदान में उतरे दोनों ग्रुप एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने कहा है कि मृत्युंजय को पुटा में तीन साल के बेहतर प्रदर्शन के आधार पर अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया है। उन्होंने पुटा की सेवा की है। वहीं खालिद-सिद्धू ग्रुप का कहना है कि मृत्युंजय ने यदि कार्य करवाए हैं तो उनको शिक्षकों के सामने लाया जाए। खुले रूप से वेब संवाद का आमंत्रण दिया, उसको क्यों नहीं स्वीकारा गया। अब शिक्षकों को तय करना है कि उन्हें शिक्षकों की सेवा के लिए शिक्षक नेता चाहिए या फिर कोई और।
मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने किया वार
मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने कहा कि इससे पहले कभी भी पुटा के चुनाव को इतना नीचा नहीं किया गया। कुछ लोग अपने सम्मानित सहयोगियों पर व्यक्तिगत हमले करने लगें और वह वायदे दूसरे शिक्षकों की सेवा का कर रहे हैं। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। यह चुनावी लाभ के लिए इतने विषैले हो सकते हैं, यह सोचा भी नहीं जा सकता। कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान मृत्युंजय कुमार के शानदार प्रदर्शन के आधार पर अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारने का फैसला किया। पुटा के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने सभी प्रकार के मुद्दों पर साथ दिया। कोविड के दौरान भी शिक्षकों के कहने पर उन्होंने सभी का सहयोग किया। उन्होंने कहा कि उनका बायोडाटा मजबूत है और 15 साल से उनको कोई भी किसी प्रकार की पदोन्नति नहीं मिली है। हालांकि यूजीसी में प्रकरण की सिफारिश जरूर की गई थी। कहा कि एक टीम ने डॉ. मृत्युंजय कुमार को बदनाम करने के लिए एक पत्र जारी किया गया। यह पत्र उस टीम की मानसिकता को दर्शाता है।
खालिद-सिद्धू ग्रुप का पलटवार
खालिद-सिद्दू ग्रुप ने मृत्युंजय-नौरा ग्रुप के पत्र पर पलटवार किया है। इसमें कहा है कि क्या अध्यक्ष पद के उम्मीदवार मृत्युंजय कुमार ने अकेले काम किया जो उन्हें ही आगे बढ़ाया गया। पुटा में शामिल अन्य शिक्षक सदस्यों ने काम नहीं किया। यदि मृत्युंजय की ओर से कार्य किए गए हैं तो उनको शिक्षकों के सामने लाया जाए। पुटा की ओर से खुद मृत्युंजय के प्रमोशन का केस सिंडिकेट में ले जाया गया। उसके सुबूत हमारे पास हैं जो शिक्षकों को उपलब्ध कराएंगे। कहा कि मृत्युंजय कुमार का केस सिंडिकेट तक पहुंचा, लेकिन पास्ट सर्विस काउंट का लाभ शिक्षकों को आज तक नहीं दिलाया गया। पीयू में होने वाली नियुक्तियों पर लगी रोक को हटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। सातवें वेतनमान पर कोई काम नहीं किया गया। पेंशन, शिक्षक आवास के मुद्दे ठंडे बस्ते में फेंक दिए गए। शिक्षकों के प्रमोशन डेढ़ साल से अटके हुए हैं, लेकिन उसकी चिंता पूर्व पुटा के पदाधिकारियों ने नहीं की। केवल उपाध्यक्ष रहे डॉ. मृत्युंजय कुमार का केस सिंडिकेट में ले जाया गया और सपोर्ट की गई। यह शिक्षक समाज सब कुछ जानता है। वह जानता है कि उनको कैसे नेता चाहिए।
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मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने किया वार
मृत्युंजय-नौरा ग्रुप ने कहा कि इससे पहले कभी भी पुटा के चुनाव को इतना नीचा नहीं किया गया। कुछ लोग अपने सम्मानित सहयोगियों पर व्यक्तिगत हमले करने लगें और वह वायदे दूसरे शिक्षकों की सेवा का कर रहे हैं। ऐसे लोगों से बचना चाहिए। यह चुनावी लाभ के लिए इतने विषैले हो सकते हैं, यह सोचा भी नहीं जा सकता। कहा कि पिछले तीन वर्षों के दौरान मृत्युंजय कुमार के शानदार प्रदर्शन के आधार पर अध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतारने का फैसला किया। पुटा के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने सभी प्रकार के मुद्दों पर साथ दिया। कोविड के दौरान भी शिक्षकों के कहने पर उन्होंने सभी का सहयोग किया। उन्होंने कहा कि उनका बायोडाटा मजबूत है और 15 साल से उनको कोई भी किसी प्रकार की पदोन्नति नहीं मिली है। हालांकि यूजीसी में प्रकरण की सिफारिश जरूर की गई थी। कहा कि एक टीम ने डॉ. मृत्युंजय कुमार को बदनाम करने के लिए एक पत्र जारी किया गया। यह पत्र उस टीम की मानसिकता को दर्शाता है।
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खालिद-सिद्धू ग्रुप का पलटवार
खालिद-सिद्दू ग्रुप ने मृत्युंजय-नौरा ग्रुप के पत्र पर पलटवार किया है। इसमें कहा है कि क्या अध्यक्ष पद के उम्मीदवार मृत्युंजय कुमार ने अकेले काम किया जो उन्हें ही आगे बढ़ाया गया। पुटा में शामिल अन्य शिक्षक सदस्यों ने काम नहीं किया। यदि मृत्युंजय की ओर से कार्य किए गए हैं तो उनको शिक्षकों के सामने लाया जाए। पुटा की ओर से खुद मृत्युंजय के प्रमोशन का केस सिंडिकेट में ले जाया गया। उसके सुबूत हमारे पास हैं जो शिक्षकों को उपलब्ध कराएंगे। कहा कि मृत्युंजय कुमार का केस सिंडिकेट तक पहुंचा, लेकिन पास्ट सर्विस काउंट का लाभ शिक्षकों को आज तक नहीं दिलाया गया। पीयू में होने वाली नियुक्तियों पर लगी रोक को हटाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। सातवें वेतनमान पर कोई काम नहीं किया गया। पेंशन, शिक्षक आवास के मुद्दे ठंडे बस्ते में फेंक दिए गए। शिक्षकों के प्रमोशन डेढ़ साल से अटके हुए हैं, लेकिन उसकी चिंता पूर्व पुटा के पदाधिकारियों ने नहीं की। केवल उपाध्यक्ष रहे डॉ. मृत्युंजय कुमार का केस सिंडिकेट में ले जाया गया और सपोर्ट की गई। यह शिक्षक समाज सब कुछ जानता है। वह जानता है कि उनको कैसे नेता चाहिए।
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