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बरोदा उपचुनाव: योगेश्वर दत्त भाजपा उम्मीदवार, कुश्ती छोड़ राजनीति में उतरे, दूसरे बार लड़ेंगे चुनाव
Thu, 15 Oct 2020 11:26 AM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 15 Oct 2020 11:26 AM IST
सार
- पहलवानों के साथ दमखम दिखाने हरियाणा भवन पहुंचे योगेश्वर
- कांग्रेस के खेमे में सैलजा सुरजेवाला और हुड्डा में घमासान
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योगेश्वर दत्त
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय जनता पार्टी ने बरोदा में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय पहलवान योगेश्वर दत्त को उम्मीदवार बनाया है। वीरवार देर रात भाजपा ने टिकट की घोषणा की। इससे पहले दिनभर टिकट को लेकर मंथन चलता रहा। पहलवान योगेश्वर दत्त ने 100 से ज्यादा पहलवानों के साथ हरियाणा भवन दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन कर अपने टिकट की दावेदारी पेश की है। अनेक नेताओं ने टिकट पाने के लिए दौड़ लगाई, लेकिन अंत में बाजी पूर्व प्रत्याशी योगेश्वर ने ही मारी। योगेश्वर दत्त बीते एक साल से बरोदा में भाजपा के लिए काम कर रहे थे।
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वह शुक्रवार को नामांकन दाखिल करेंगे। भाजपा की तरफ से उसका कार्यक्रम पहले ही जारी किया जा चुका है। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार योगेश्वर दत्त दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें 37,726 मत मिले थे। वहीं स्वर्गीय श्रीकृष्ण हुड्डा कांग्रेस की टिकट पर यहां से विधायक बने, उन्हें 42566 वोट हासिल हुए थे। जजपा के उम्मीदवार रहे भूपेंद्र मलिक ने 32480 वोट हासिल किए थे। बरोदा विधानसभा सीट पर कांग्रेस 2009 से लगातार तीसरी जीत रही है। इससे पहले यह सीट आरक्षित थी, तब यहां इनेलो का काफी दबदबा था।
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2 लाख 70 हजार की जनसंख्या वाले बरोदा हलके में कुल 67 पंचायतें हैं। 1967 में हरियाणा गठन के बाद यहां पहले चुनाव हुआ था। इसके बाद 1967 से 2009 तक बरोदा सीट आरक्षित रही। 2009 में पहली बार अनारक्षित हुई बरोदा सीट पर लगातार कांग्रेस के उम्मीदवार श्रीकृष्ण हुड्डा ने तीन बार जीत हासिल की थी, इससे पहले ये हलका इनेलो का गढ़ माना जाता था।
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76 साल के श्रीकृष्ण हुड्डा मूलत: किलोई विधानसभा क्षेत्र के खिड़वाली गांव के थे। वह 1987 में पहली बार इसी किलोई हलके से विधायक बने। किलोई से ही वह दूसरी बार 1996 और तीसरी बार 2005 में विधायक निर्वाचित हुए। 2005 में जब भूपेंद्र हुड्डा पहली बार सीएम बने, तब श्रीकृष्ण हुड्डा ने किलोई सीट से इस्तीफा दे दिया और उसके बाद इस सीट से हुड्डा चुनाव लड़ कर विधानसभा में पहुंचे।
हुड्डा ने किलोई सीट के त्याग का श्रीकृष्ण हुड्डा को शानदार राजनीतिक इनाम दिया। अपना अटूट गढ़ माने जाने वाले गोहाना के बरोदा हलके से हुड्डा ने लगातार 3 बार श्रीकृष्ण हुड्डा को विधानसभा में प्रवेश दिलवाया। बरोदा विधानसभा जाटलैंड मानी जाती है। इस विधानसभा में कुल 1 लाख 78 हजार 250 कुल मतदाता हैं, जिनमें लगभग जाट 90 से 95 हजार, ब्राह्मण 20 हजार, ओबीसी 30 हजार, एससी-एसटी 18 हजार व अन्य 10 हजार मतदाता हैं।
एक ही साल में दोबारा लड़ेंगे चुनावी दंगल
कुश्ती को छोड़कर राजनीति के अखाड़े में उतरे पहलवान योगेश्वर दत्त पहले ऐसे नेता होंगे, जो बरोदा हल्के से एक ही साल में दोबारा चुनावी दंगल लड़ेंगे। ओलंपिक मेडलिस्ट योगेश्वर दत्त ने वर्ष 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का काफी ग्राफ बढ़ाया था और वह काफी कम अंतर से चुनाव हारे थे। चुनाव हारने के बाद भी वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय रहे तो 54 गांवों से मिला फीडबैक भी योगेश्वर के पक्ष में रहा। इन सभी कारण से भाजपा की कसौटी पर केवल योगेश्वर ही फिट बैठे और उनको ही दोबारा से चुनाव लड़ाने के लिए बरोदा के चुनावी रण में उतारा गया।
भैंसवाल कलां गांव के रहने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त ने 2012 में देश के लिए ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। योगेश्वर हरियाणा के ऐसे पहले पहलवान थे, जिन्होंने देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीता। उस मेडल के आधार पर उनको हरियाणा सरकार ने उस समय डीएसपी बनाया था। लेकिन योगेश्वर ने खाकी की जगह खादी पहनकर सेवा करने की इच्छा जताते हुए सितंबर 2019 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा का दामन थाम लिया। उस समय यह तय था कि योगेश्वर को चुनावी दंगल में उतारा जाएगा।
और भाजपा ने उनपर भरोसा जताते हुए बरोदा से चुनावी दंगल में उतार भी दिया। लेकिन कांग्रेस के गढ़ बरोदा में योगेश्वर दत्त अपना पहला ही चुनाव हार गए। यह जरूर रहा कि राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी होने के बावजूद श्रीकृष्ण हुड्डा बड़े अंतर से नहीं जीत सके और योगेश्वर को केवल चार प्रतिशत वोट कम मिले। योगेश्वर के लिए यह सुखद था कि वह बरोदा जैसी सीट पर भाजपा का ग्राफ काफी ऊपर उठाने में कामयाब रहे। योगेश्वर ने हारने के बाद साफ कहा था कि वह जनता की सेवा लगातार करते रहेंगे और वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय भी रहे।
इसी बीच श्रीकृष्ण हुड्डा का निधन हुआ तो बरोदा हल्के में चुनावी सरगर्मी फिर से शुरू हो गई और हर कोई टिकट की जुगत में लग गया। लेकिन इसमें भी आखिर में योगेश्वर दत्त ही बाजी मार गए, क्योंकि भाजपा ने एक दिन पहले ही हल्के के 54 गांवों में 28 नेताओं को उतार था। उन 28 नेताओं का फीडबैक योगेश्वर के पक्ष में रहा और उसको देखते हुए ही योगेश्वर को चुनावी दंगल में उतारना तय कर दिया गया। जिससे योगेश्वर ऐसे पहले नेता होंगे जो एक ही साल में दोबारा चुनावी दंगल में उतरेंगे।
भैंसवाल कलां गांव के रहने वाले पहलवान योगेश्वर दत्त ने 2012 में देश के लिए ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। योगेश्वर हरियाणा के ऐसे पहले पहलवान थे, जिन्होंने देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीता। उस मेडल के आधार पर उनको हरियाणा सरकार ने उस समय डीएसपी बनाया था। लेकिन योगेश्वर ने खाकी की जगह खादी पहनकर सेवा करने की इच्छा जताते हुए सितंबर 2019 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा का दामन थाम लिया। उस समय यह तय था कि योगेश्वर को चुनावी दंगल में उतारा जाएगा।
और भाजपा ने उनपर भरोसा जताते हुए बरोदा से चुनावी दंगल में उतार भी दिया। लेकिन कांग्रेस के गढ़ बरोदा में योगेश्वर दत्त अपना पहला ही चुनाव हार गए। यह जरूर रहा कि राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी होने के बावजूद श्रीकृष्ण हुड्डा बड़े अंतर से नहीं जीत सके और योगेश्वर को केवल चार प्रतिशत वोट कम मिले। योगेश्वर के लिए यह सुखद था कि वह बरोदा जैसी सीट पर भाजपा का ग्राफ काफी ऊपर उठाने में कामयाब रहे। योगेश्वर ने हारने के बाद साफ कहा था कि वह जनता की सेवा लगातार करते रहेंगे और वह लगातार क्षेत्र में सक्रिय भी रहे।
इसी बीच श्रीकृष्ण हुड्डा का निधन हुआ तो बरोदा हल्के में चुनावी सरगर्मी फिर से शुरू हो गई और हर कोई टिकट की जुगत में लग गया। लेकिन इसमें भी आखिर में योगेश्वर दत्त ही बाजी मार गए, क्योंकि भाजपा ने एक दिन पहले ही हल्के के 54 गांवों में 28 नेताओं को उतार था। उन 28 नेताओं का फीडबैक योगेश्वर के पक्ष में रहा और उसको देखते हुए ही योगेश्वर को चुनावी दंगल में उतारना तय कर दिया गया। जिससे योगेश्वर ऐसे पहले नेता होंगे जो एक ही साल में दोबारा चुनावी दंगल में उतरेंगे।