भाजपा-अकाली में आठ साल से धीरे-धीरे बढ़ी तल्खियों ने तोड़ा गठबंधन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अकाली-भाजपा गठबंधन 1997 से लेकर 2017 तक हुए पांच विधानसभा चुनाव में तीन चुनाव जीत कर प्रदेश में सत्ता का सुख भोग चुका है। 2012 में जब अकाली-भाजपा गठबंधन को लगातार दूसरी बार प्रदेश में जनादेश मिला तो तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सिख राजनीति का हस्तांतरण अपने बेटे सुखबीर बादल को करना शुरू कर दिया। इसके बाद ही अकाली-भाजपा के बीच वैचारिक मतभेद पैदा होने शुरू हो गए थे।
2017 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच कटुता इतनी बढ़ चुकी थी कि कार्यकर्ताओं ने अपने राजनीतिक आकाओं के आदेश पर एक दूसरे को पराजित करने में कसर नहीं छोड़ी। 2012 से 2017 के दौरान सुखबीर बादल के साले बिक्रम मजीठिया के अकाली दल में उभरने से भाजपा के तत्कालीन मंत्रियों के साथ न केवल उनके राजनीतिक मतभेद पैदा हुए, बल्कि अकाली दल के पदाधिकारियों ने भाजपा के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए।
तत्कालीन भाजपा मंत्री अनिल जोशी के विरुद्ध शिअद के तत्कालीन जिला अध्यक्ष उपकार संधू ने खुली लड़ाई छेड़ी हुई थी। इसमें परदे के पीछे मजीठिया थे। इसी तरह पंजाब के कई भाजपा विधायकों के विरुद्ध भी अकाली दल ने मोर्चा खोला हुआ था। गठबंधन को 2017 में मिली कड़ी हार का एक कारण यह भी था।
पूर्व भाजपा अध्यक्ष दिवंगत कमल शर्मा और सुखबीर बादल ने इन झगड़ों को निपटाने के लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया। चुनाव से एक वर्ष पूर्व दोनों ने निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल पैदा करने के लिए समन्वय कमेटियों का गठन किया, लेकिन उनकी कभी बैठक तक नहीं हुई। दोनों दलों के नेताओं के बीच जब वैचारिक मतभेद पैदा हुए, तो उसका प्रभाव निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा। जिला अध्यक्षों व पार्टी पदाधिकारियों के बीच तालमेल बैठाने के लिए कोई भी बैठक नहीं होती थी।
भाजपाइयों ने अमित शाह से लगाई थी गठबंधन तोड़ने की गुहार
पिछले कुछ साल में दोनों दलों के बीच कटुता इतनी बढ़ गई थी कि भाजपा ने तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से अकाली दल से अलग होने की वकालत करनी शुरू कर दी थी। 2016 में एक कार्यक्रम के दौरान जब अमित शाह अमृतसर पहुंचे थे तो उन्होंने अकाली-भाजपा की वर्तमान स्थिति पर सभी तत्कालीन मंत्रियों व विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों के साथ बंद कमरे में बातचीत की थी।
तत्कालीन मुख्य संसदीय सचिव डॉ. नवजोत सिद्धू ने सुखबीर बादल और बिक्रम सिंह मजीठिया के बारे में लिखित शिकायत दी थी। इसके बाद शाह ने कहा था कि कार्यकर्ताओं की भावना के अनुसार गठबंधन पर फैसला लिया जाएगा, लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं का न केवल मनोबल टूटा, बल्कि 2017 चुनाव में भाजपा ने उन विस सीटों पर अकाली दल का भीतर ही भीतर विरोध किया जहां से उनके विधायक चुनाव लड़ रहे थे। बदले में अकाली दल ने भी इसी नीति पर अमल किया।
13 दिन की वाजपेयी सरकार को दिया था समर्थन
शिअद (बादल) की अगुवाई में 1996 के लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे 13 अकाली उम्मीदवारों में से आठ ने जीत हासिल की थी। इन अकाली सांसदों के साथ प्रकाश सिंह बादल दिल्ली स्थित पंजाब भवन पहुंचे थे। तब केंद्र में एचडी देवगौड़ा की अगुवाई में सरकार बनाने की कवायद हो रही थी। इस सरकार का हिस्सा बनने के लिए एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहरा, पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला और नवनियुक्त सांसद प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने देवगौड़ा से मुलाकात की थी। इस बात की बादल को जानकारी नहीं थी।
इन तीनों अकाली नेताओं की तरफ से देवगौड़ा सरकार का हिस्सा बनने के लिए प्रयास तेज किए जा रहे हैं, इसकी भनक कभी ज्ञानी जैल सिंह के सचिव रहे तरलोचन सिंह को लगी। अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व चेयरमैन रहे तरलोचन सिंह तत्काल पंजाब भवन पहुंचे और बादल को इस बारे में जानकारी दी। इसके बाद बादल ने तरलोचन सिंह से पूछा कि कौन सा रास्ता चुना जाए। तरलोचन सिंह ने बादल से कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी से मेरी अच्छी घनिष्ठता है, उनसे बातचीत की जा सकती है।
तरलोचन सिंह के अनुसार, वह बादल के साथ वाजपेयी के घर गए। वाजपेयी ने बादल से कहा कि वह अकालियों का साथ चाहते हैं, जिसके बाद बादल के समर्थन से वाजपेयी सरकार बनी जो महज 13 दिन चली लेकिन यह साथ 22 साल रहा।