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कांग्रेस की गुटबाजी से निपटने में जुटे बिट्टू

Thu, 27 Mar 2014 03:13 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Thu, 27 Mar 2014 03:13 PM IST
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Bittu faction involved in dealing with Congress

लुधियाना से कांग्रेस उम्मीदवार रवनीत बिट्टू के लिए सबसे बड़ी चुनौती गुटबाजी और भितरघात है। पहले भी बेअंत सिंह परिवार भितरघात का शिकार हो चुका है।

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बेअंत सिंह की शहादत के बाद 1996 में हुए चुनाव में पार्टी ने उनकी पत्नी जसवंत कौर को उतारा था। जबरदस्त सहानुभूति लहर के बावजूद गुटबाजी के चलते वह हार गई थीं।
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2004 के चुनाव में मनीष तिवारी भी गुटबाजी का शिकार होकर हारे थे। बिट्टू को भी यह डर सता रहा है। इसलिए प्रचार से पहले वह सभी कांग्रेसियों को एकजुट करने में जुटे हैं।
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निवर्तमान सांसद मनीष तिवारी को सबसे बड़ा खतरा विधायक भारत भूषण आशू से था। मनीष के चुनाव से हटने की वजहों में आशू का विरोध भी था, लेकिन बिट्टू केलड़ने के ऐलान के बाद सबसे पहले आशू ने ही इसका स्वागत किया। आशू के पिता पंडित नारायण, बेअंत सिंह के करीबी थे।

दोनों परिवारों के बीच अच्छे संबंध हैं। आशू का साथ चलना बिट्टू के लिए सबसे राहत की बात है। विधायक सुरिंदर डाबर को बनाने वाले बेअंत सिंह थे, इसलिए वह भी साथ चलेंगे। राकेश पांडे भी खुलकर मदद करेंगे, लेकिन इन दोनों नेताओं के हलकों के पार्षद व अन्य नेता अपनी-अपनी ढफली बजा रहे हैं।

मनीष तिवारी धड़े, खासकर जिला प्रधान पवन दीवान से नेताओं व वर्करों की नाराजगी एक बड़ी चुनौती है। कम समय में बिट्टू को सभी तक पहुंच कर उन्हें मनाना होगा।


वहीं, तिवारी धड़े के लोगों का स्टैंड अभी तक साफ नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि बिट्टू के राहुल ब्रिगेड के होने के कारण वे भी पाला बदल कर साथ ही चल पड़ेंगे। लुधियाना बेअंत सिंह का गढ़ रहा है। उनके बाद तेजप्रकाश सिंह और गुरकीरत सिंह कोटली के हलके भी इस जिले में हैं। ऐसे में बिट्टू एक मजबूत उम्मीदवार होंगे।

नशा विरोधी मुहिम ने बनाया आधार
रवनीत बिट्टू ने दो साल पहले पंजाब में नशों के खिलाफ मुहिम चलाई थी। इस दौरान उन्होंने लुधियाना में 4-5 धरना दिया था। उस धरने को उन्होंने अपने तौर पर ही आयोजित किया था। इस आंदोलन से लुधियाना में उनकी एक नेता के तौर पर छवि बनी थी। जिसका फायदा उन्हें चुनाव में होगा।

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