{"_id":"682a453f4b4bfa9a77025f96","slug":"arya-sanyasis-should-be-completely-devoted-to-arya-samaj-omkaranand-chandigarh-news-c-16-pkl1043-713277-2025-05-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"आर्य संन्यासी आर्य समाज के प्रति पूर्ण समर्पित हो : ओंकारानंद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आर्य संन्यासी आर्य समाज के प्रति पूर्ण समर्पित हो : ओंकारानंद
Mon, 19 May 2025 02:08 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, चंडीगढ़
Updated Mon, 19 May 2025 02:08 AM IST
विज्ञापन
चंडीगढ़। सेक्टर 19 स्थित आर्य समाज में रविवार को अंतरराष्ट्रीय वैदिक प्रवक्ता स्वामी ओंकारानंद सरस्वती ने अपने प्रवचन में आर्य संन्यासियों के कर्तव्य और आर्य समाज के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आर्य संन्यासी को आर्य समाज के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होना चाहिए। महर्षि दयानंद के बताए मार्ग पर चलने के लिए कठिन तपस्या और गंभीर स्वाध्याय की आवश्यकता है।
स्वामी ओंकारानंद सरस्वती ने गृहस्थ आश्रम को अच्छा बताते हुए कहा कि संन्यासियों की व्यवस्था करना गृहस्थों का कर्तव्य है, परंतु संन्यास आश्रम कठिन तपस्या से परिपूर्ण है और यह केवल परमात्मा की विशेष कृपा और निरंतर पुरुषार्थ से ही संभव है।
उन्होंने समाज में संन्यासी के स्थान की तुलना सिर से करते हुए कहा कि जिस प्रकार सिर के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार ज्ञान विहीन समाज अंधकार में रहता है। उन्होंने महर्षि दयानंद को एक तपस्वी, योगी, ज्ञानी और समाज सुधारक बताते हुए कहा कि उन्होंने वेदों के आधार पर मनुष्य को जीना सिखाया और वेदों को सर्वोपरि ज्ञान बताया। कहा कि वेदों के ज्ञान के आधार पर ही एक संतुलित और सभ्य समाज की कल्पना की जा सकती है। इसी उद्देश्य से महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर दुनिया में एक वैचारिक क्रांति आंदोलन खड़ा किया, जो आज भी एक क्रांतिकारी संगठन के रूप में पूरे विश्व में कार्यरत है। उन्होंने आर्य समाज के गहरे विचारों को समझने के लिए गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता पर जोर दिया और सभी से स्वाध्याय एवं साधना पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
स्वामी ओंकारानंद सरस्वती ने गृहस्थ आश्रम को अच्छा बताते हुए कहा कि संन्यासियों की व्यवस्था करना गृहस्थों का कर्तव्य है, परंतु संन्यास आश्रम कठिन तपस्या से परिपूर्ण है और यह केवल परमात्मा की विशेष कृपा और निरंतर पुरुषार्थ से ही संभव है।
विज्ञापन
उन्होंने समाज में संन्यासी के स्थान की तुलना सिर से करते हुए कहा कि जिस प्रकार सिर के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार ज्ञान विहीन समाज अंधकार में रहता है। उन्होंने महर्षि दयानंद को एक तपस्वी, योगी, ज्ञानी और समाज सुधारक बताते हुए कहा कि उन्होंने वेदों के आधार पर मनुष्य को जीना सिखाया और वेदों को सर्वोपरि ज्ञान बताया। कहा कि वेदों के ज्ञान के आधार पर ही एक संतुलित और सभ्य समाज की कल्पना की जा सकती है। इसी उद्देश्य से महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर दुनिया में एक वैचारिक क्रांति आंदोलन खड़ा किया, जो आज भी एक क्रांतिकारी संगठन के रूप में पूरे विश्व में कार्यरत है। उन्होंने आर्य समाज के गहरे विचारों को समझने के लिए गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने की आवश्यकता पर जोर दिया और सभी से स्वाध्याय एवं साधना पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।
विज्ञापन