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ब्लड बैंक में खून की कमी.. थैलेसीमिया के मरीजों पर मंडराने लगा खतरा

Sat, 08 May 2021 02:31 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sat, 08 May 2021 02:31 AM IST
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Anemia in blood bank .. Thalassemia patients are under threat
चंडीगढ़। महामारी के दौर में जहां एक तरफ संक्रमण से बचाव के लिए अस्पतालों की ओपीडी बंद कर दी गई है, वहीं दूसरी तरफ थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों पर भी खतरा मंडराने लगा है। इन मरीजों की जान महीने में दो से तीन बार रक्त देकर बचाई जाती है, लेकिन महामारी के कारण ब्लड बैंकों में हो रही खून की कमी से इनकी जान जोखिम में पड़ने लगी है। ऐसे में डॉक्टर व रक्तदाता संस्थाएं युवाओं से रक्तदान कर इन मरीजों की जान बचाने की अपील कर रहे हैं।
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लोगों का कहना है कि खून ही एकमात्र इन मरीजों की जान बचाने का आसान तरीका है, क्योंकि बोन मैरो ट्रांसप्लांट सभी मरीजों के लिए संभव नहीं हो सकता। ऐसे में रक्तदान की रफ्तार कम पड़ने से मरीजों का इलाज प्रभावित होने लगा है। रक्तदान शिविर आयोजित करने वाली संस्थाएं भी युवाओं से ज्यादा से ज्यादा रक्तदान करने की अपील कर रही है।
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थैलेसिमिक चैरिटेबल ट्रस्ट जुटा जान बचाने में
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए शहर में 1989 से थैलेसीमिया चैरिटेबल ट्रस्ट काम कर रहा है। मौजूदा समय में ट्रस्ट में अलग-अलग राज्यों के 427 बच्चे पंजीकृत हैं। इनमें से पीजीआई में 304 व जीएमसीएच- 32 में 123 बच्चों का इलाज चल रहा है। ट्रस्ट के सदस्य सचिव राजिंदर कालरा ने बताया कि 427 बच्चों में यूटी के 82, पंजाब के 173, हरियाणा के 115 और अन्य प्रदेशों के 57 बच्चे पंजीकृत हैं। उन बच्चों को दो से तीन हफ्ते के बीच खून की जरूरत पड़ती है। इसके लिए ट्रस्ट लगातार रक्तदान शिविरों का आयोजन करता रहता है। शिविर से प्राप्त खून को इन बच्चों के इलाज के लिए पीजीआई और जीएमसीएच 32 के ब्लड बैंक को दिया जाता है।
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ये लक्षण हैं खतरनाक
इस बीमारी के शिकार बच्चों में रोग के लक्षण जन्म से 4 या 6 महीने में ही नजर आने लगते हैं। बच्चे की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है। आंख और जीभ भी पीली पड़ने लगती हैं। उसके ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है। आंतों में भी परेशानी होने लगती हैं। दांत निकलने में काफी परेशानी होने लगती हैं। बच्चे की त्वचा पीली पड़ने लगती है। यकृत और प्लीहा की लंबाई बढ़ने लगती है तथा बच्चे का विकास रुक जाता है।
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सावधानी से बचाव संभव
- अगर माता-पिता थैलेसीमिया माइनर रोग से ग्रस्त हैं, तब बच्चों को इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है। अगर माता-पिता में किसी एक को यह रोग है तो उनके बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने की आशंका नहीं रहती। माइनर का शिकार व्यक्ति सामान्य जीवन जीता है और उसे कभी इस बात का आभास तक नहीं होता कि उसके खून में कोई दोष है।
- शादी के पहले अगर पति-पत्नी के खून की जांच हो जाए तो शायद इस आनुवांशिक रोगग्रस्त बच्चों का जन्म टाला जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस रोग से ग्रसित बच्चे को बचाने के लिए औसतन तीन सप्ताह में एक बोतल खून देना अनिवार्य हो जाता है।

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थैलेसीमिया से बचने के उपाय
- खून की जांच से इस रोग की पहचान की जा सकती है
- शादी से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण अवश्य करवा लेना चाहिए।
- नजदीकी रिश्ते में शादी-विवाह करने से परहेज रखना चाहिए।
-गर्भधारण के चार महीने के अंदर भ्रूण का परीक्षण कराना चाहिए।
कोट- थैलेसीमिया जैसी बीमारी से जूझ रहे मरीजों की जान बचाने के लिए युवा रक्तदान को अपना शौक बनाएं, क्योंकि इस बीमारी के इलाज की दवा अब तक ईजाद नहीं हो सकी है। इसका इलाज खून देकर ही किया जा सकता है। जहां तक बोन मैरो ट्रांसप्लांट की बात है तो 10 साल से ज्यादा उम्र के बाद इसका परिणाम भी अच्छा नहीं आता।
-प्रो. रति राम शर्मा, पीजीआई ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के प्रमुख
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