अमृतसर आंतकी हमले के बाद बड़ा खुलासा, इन दो आतंकी संगठनों की बीच हो गया है गठजोड़
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कश्मीर में पाक समर्थित और पंजाब के खालिस्तान समर्थित आतंकी संगठनों का गठजोड़ हो चुका है। इन आतंकियों का टारगेट पंजाब में फिर से आतंकवाद का माहौल पैदा करना है। इसके लिए इन संगठनों की समय-समय पर बैठकें भी होती है और दोनों संगठनों के ये आतंकी पंजाब में अपनी सक्रियता बढ़ाने को बेताब हैं। इस इनपुट के बाद आतंकी संगठनों के नेटवर्क पर सेना के साथ-साथ पंजाब और जम्मू एंड कश्मीर पुलिस व केंद्रीय खुफिया एजेंसियों ने काम करना शुरू कर दिया है।
सूत्रों के अनुसार जम्मू एवं कश्मीर में पाक समर्थित आतंकी संगठनों का टारगेट कश्मीर को भारत से अलग करना रहता है। इनके खिलाफ एक अघोषित युद्ध पहले ही सेना घाटी में लगातार लड़ रही है। उधर, पंजाब में भी खालिस्तान की मांग मुखर करने वाले आतंकी संगठनों को आईएसआई समर्थन करता रहा है।
लेकिन अब इन कश्मीरी-पंजाबी आतंकी संगठनों का गठजोड़ इसलिए हुआ है कि कश्मीर की तरह पंजाब में भी खालिस्तान की मांग को और मुखर किया जा सके। सूत्रों के अनुसार साल में कश्मीरी और पंजाबी आतंकी संगठन दो बार बड़ी बैठकें भी करते हैं। इन संगठनों की एक बैठक पंजाब में होती है, तो दूसरी बैठक कश्मीर में। इसी के मद्देनजर सेना, पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां पूरी तरह से सतर्क और चौकस हैं।
इंग्लैंड कांफ्रेंस के बाद से सक्रियता बढ़ी
इंग्लैंड में पंजाबी अलगाववादियों की रेफरेंडम 20-20 कांफ्रेस के बाद भी कश्मीर के अलगाववादी संगठनों ने पंजाब के खालिस्तान समर्थकों का खुलकर समर्थन करने का एलान किया था। इस एलान के बाद से दोनों सूबों के इन संगठनों ने अपनी सक्रियता बढ़ाते हुए पंजाब का माहौल खराब करने की तैयार कर ली है। अमृतसर के निरंकारी सत्संग भवन में आतंकी हमला भी पुलिस और केंद्रीय खुफिया एजेंसियां इसी सक्रियता का परिणाम मान रही हैं।
विस्फोटक सामग्री की क्षमता जांच रहे फोरेंसिक एक्सपर्ट
उधर, अमृतसर के निरंकारी भवन पर हुए आतंकी हमले में किस तरह की विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल किया गया था, उसकी क्षमता और तीव्रता की जांच स्पेशल फोरेंसिक एक्सपर्ट की टीम कर रही है। सूत्रों ने बताया कि ये जांच की जा रही है कि निरंकारी भवन में जिस विस्फोटक सामग्री से ब्लास्ट किया गया क्या वे सचमुच ग्रेनेड था या किसी अन्य तरह के बम का इस्तेमाल इस घटना में किया गया था। दरअसल, इस जांच के बाद एजेंसियां ये जानना चाहती हैं कि इस तरह के विस्फोटक सामग्री का इस्तेमाल पहले कौन आतंकी संगठन कर चुके हैं। इससे हमला करने वाले आतंकी संगठनों की पहचान होने में बड़ी मदद मिल सकती है।